Saturday, October 8, 2011

बाद मैं हिसाब करते हैं... अभी उन्हें देखिये ......

     नीलम जा जरा रामभरोसे की दूकान से थोडा जा जामन ले आना ... कल के लिए दही जमानी है ....!  जी हाँ ये और कुछ वाक्य मिले जुले वाक्य हम सबने अपने बचपन में सुने होंगे बस नाम बदल दीजिये अपने लिए ही लगते हैं..... !

     आपके पड़ोस मैं खुली छोटी सी दूकान जिस पर वो हर सामन मिलता है जो हमारे लिए कभी कभी बेहद कीमती और आवयशक हो जाते हैं ....  रात हो या दिन . ... तपती दोपहर हो या फिर सर्दी की ठिठुरती रात ....और सुबह सुबह का वक़्त ... जब जब छोटी किन्तु अतिआवय्श्यक चीजों के लिए हम रामभरोसे की दूकान पर आश्रित होते हैं... एक तरीके से हमें घर को समय समय पर इसकी ज़रूर्तात होती है और वो काम आता है ..... ! हर ज़रूरत... कभी कभी तो हम अपनी ज़रूरत उसको बता करके उसको पूरा करने की अपील करते हैं ...और वो करता है....!!

      रामभरोसे अब छुपने लगा है... या ये कहें की रामभरोसे की दूकान धीरे धीरे उनकी दूकान बंद होने लगी है ... जी हाँ एक समय ये आ जायेगा की वो विलुप्त हो जाने वाला है ... क्यों की ....बस उसकी दूकान के बस थोड़ी ही दुरी पर एक " माल " बनाने की योजना बन रही है...  बिलकुल नई पीढ़ी छोटी दूकान पर जाने को शर्म महसूस करती है ... हाँ माल मैं जाती है... और उसको ही मूल मानती है जिसे सहारे जीवन चलेगा ... मोटी तनख्वाह पर खर्चा करना उनको आता है... किन्तु ...कुछ और बहुत कुछ इन माल के ज़रिये पूरा नहीं हो सकता है .... ....याद कीजिये कभी एसा समय आया होगा आपके भी घर पर ...अचानक मेहमान आ गए हो और घर पर नकद पैसे नहीं .. क्यों की आज कल तो डेबिट और क्रेडिट कार्ड का चलन है ना...  रामभरोसे से ही नमकीन बिस्किट ले कर आये होने और ...उसने बिना पैसे के दिया होगा सब.... ये कह कर की आपके मेहमान मेरे मेहमान ... बाद मैं हिसाब करते हैं... अभी उन्हें देखिये ......

ये " माल " मैं संभव नहीं...... सब ज़रूरी है , रामभरोसे भी और माल भी बस दोनों को सहेजने की ज़रुरत है ..... आधुनिकता के सहारे के बिना चला भी नहीं जा सकता किन्तु अपने मूल छोड़ कर भी सांस लेना भी संभव नहीं ... आइये सहजें दोनों को ....और जी सकें !!
                                                                                             - मनीष सिंह

Saturday, October 1, 2011

मौकापरस्ती और सुरक्षित ही चलने वाले कुछ समय बाद अकेले रह जाते हैं....कटु सत्य है !!

" आज एक मदारी को देखा ...... कुछ अटपटा सा लगा ... उसके पास गया और पुछा क्या हुआ , आज उत्साहित नहीं हो ... सब ठीक तो है ना....? उसका जवाब मुझे अन्दर तक परेशान और सोचने को मजबूर कर गया ! 

उसके शब्द थे : " आज मेरा बेटा बीमार है ... और में अपने पिता को ले कर तमाशा दिखाने आया हूँ लेकिन मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा .... मैंने कहा " क्यों ? वो बोला ...

" मैंने हमेशा से अपने लोगो को अपने हिसाब से चलाया है ...और वो चले ... लेकिन आज एसा लगता है की मैंने जिंदगी सिर्फ अपने को अच्छा रखने के लिए जी... और मेरे परिवार ने मुझे खुश रखने को जिंदगी जी..... आज जब मेरा बेटा ( मेरा बंदर ) बीमार पड़ा तो मैंने उसके बाप को मन लिया तमाशे के लिए ...और वो आ गए ...लिकिन जब एक बरस पहले मैंने खुद तमाशा दिखने की कोशिश की थी तो मालूम चला था की .... बहुत मुश्किल काम है ... !! मैंने हर बार अपनी बात को सही ठहराया और अपने को खुश रखा ... आज इतनी आत्मग्लानी है की पानी भी सीसे की तरह लग रहा है... हलक से नीचे नहीं उतर रहा ....!!

  कुछ रौशनी के साथ चले और , दिए हो गए .
        कुछ अंधियारों में रहे और , दिए हो गए.!
              आज अफ़सोस करने की पहल करी जब उसने  ,
                       फिर से अपनों से ,  जीने को झूठ बोला जो उसने ,  
                             सबने पहचान लिया और , मुह सिले रह गए !!
मौकापरस्ती और सुरक्षित ही  चलने वाले कुछ समय बाद अकेले रह जाते हैं....कटु सत्य है !!

Saturday, September 24, 2011

समय की ओस की बूंदों से बंधन शिथिल होते हैं !

    " सवेरा रोज़ होता हो ,सलोनी किरणें आती हों ,
             अनोखी रात तारों संग ,कहीं गुमसुम हो जाती है !
                     हज़ारों मीत मिलते हैं ,नए अंकुर सजाने को ,
                            पलों को थाम लेते हम , ये ही सपने संजोते हैं !!
                                   समय की ओस की बूंदों से बंधन शिथिल होते हैं,
                                             चाहे कितनी सजाई हों , वो शामें ढल ही जाती हैं !! "

                                         
                     

Thursday, September 22, 2011

रीज़र्वशन से कामयाबी नही उमर भर की एहसान का तमगा मिलता है !

रिज़र्वेशन की बैसाखी के सहारे चलने वालों को कभी भी अचीवमेंट की बात नही करनी चाहिए ! 
की वो कामयाब नही होते, उनको किसी काबिल का हक मार कर आगे धक्का दिया जाता है .... ! 
उन्हे चाहिए की शर्मिंदा हों और पूरी उमर उन सब का एहसान मंद रहें जिन्होने उनके लिए अपनी जगह छोड़ दी .... ! 
सहारे और बैसाखी में अंतर है ... उतना ही जितना किसी छोटे बालक को चलना सिख़ाओ और वो चलने लगे  वो सहारा है ...
लेकिन कोई लकवा मारे इंसान को आप पल पल ढोते रहे वो है बैसाखी ..... !!  
रीज़र्वशन से कामयाबी नही उमर भर की एहसान का तमगा मिलता है जो कभी भी जस्तीफाई नही किया जेया सकता ... !  
अगर कभी कोई समूह उनको बोलने का मौका देता है का ये मतलब नही की लायक हैं ... उनको इस लायक किया गया है ... खुद में कोई काबिलियत नही !!!     

Tuesday, September 20, 2011

माँ की अंगुली छूटी , मन पतंग हो गया !

" लाल पीली हरी , सुर्ख नारंगी रंग ,
        घिस गयी पेन्सिलें , शब्द आलेखो संग ,
              माँ की अंगुली छूटी , मन पतंग हो गया ,
                    तन मे बजने लगे , गीत और जल तरंग !!

                             व्योम जग बन गया , हम वरुण हो गये ,
                                      बीते बचपन के दिन , अब सघन हो गये ,
                                                  आइए मान ले , हम बड़े हो गये !! "
                                                                   ............... हम बड़े हो गये !!

Saturday, September 17, 2011

...जुगनुओं की थैलियाँ !!


       " मौन के संसार मैं अब गुनगुनाहट चाहिए,
              आइये कुछ बोलिए की कम पड़े सब बोलियाँ !
                    कई सदी  से  रोशनी  इन    आँगनो   से   दूर  है ,
                              आइये मिल बाँटते हैं जुगनुओं  की थैलियाँ !! "

Tuesday, September 13, 2011

तेरे होने पर ही मेरे होने की ये सारी नीवें !

               रोज़ रोज़ जिस इंसान से आप दूर रहने की कोशिश करते हैं ....दर असल आप सबसे करीब उसी इंसान के ही होते हैं ...... सही है ....!  वैसे हमें ये जीवन जुड़ने के लिए मिला है ... बस जुडे रहिये .... टूटन तो सब के साथ है .. मजा तो जुडे रहने मैं है ...हाँ थोडे समर्पण के साथ ... तब ही आनंद है !!

" मैं सागर हूँ , तुम हो तब ही ,
       मैं पर्वत हूँ , तुम हो तब ही !
            मैं अम्बर हूँ , तुम हो तब ही ,
                 मैं सुगंध हूँ , तुम हो तब ही !! "
                        
" तेरे होने पर ही मेरे होने की ,ये सारी नीवें  !! "

" तेरे होने पर ही पल-पल गहरी हो जाती हैं ,
         सब अतीत की , वर्त्तमान की भाग्य लकीरें !! "
हम सब ये जानते हैं ... हम तब ही हम है जब कोई कहे की आप आप हैं ...और आपको औरों का होने को प्रेरित करे !!
                                              बस आपका ही ..... मनीष सिंह