Saturday, September 7, 2013

आशाएं , भ्रमित रखती हैं !!

आशाएँ, 
आकांक्षाएँ,
अभिलाषाएँ , 
रोके रहती हैं,
अनगिनत,
सिन्धु एवं गंगाएं,
पलकों पर !

निर्बाध,
बह निकलती हैं,
आँसू बन,
अवसरों पर, 
दोनों के , 
पूरा होने ,
और, ना होने पर भी  !

आशाएं , 
भ्रमित रखती हैं !
सिन्धु ,
रुके रहते हैं,
निरंतर,
अचेत , होने तक ,
बहने के लिए !

Friday, September 6, 2013

एक कहानी : रिश्ते - जाने अन्जाने !!

          श्रीकांत शिमला की मॉल रोड पर शाम की नारंगी मलमली धूप में टहल रहा था ! हलकी ठण्ड और होठो पर सुर्खी लाने वाली हवाएं इस कोने से उस कोने पर घूम रही थीं, जिनके सहारे वातावरण में खुशबुएं फ़ैल जाती थीं !

     पास के गिरिजाघर में शाम की प्रार्थना की घंटी बजी ! श्रीकांत तेज क़दमों से गिरिजाघर की और बढ़ गया ! 

          स्कूल के दिनों से ही वो गिरिजाघर में प्रार्थना करता आया था ! माँ और पिता के चले जाने के बाद , गाँव में जब कोई सहारा नहीं रहा तो पंचों ने उसे शहर के ही एक मिशनरी स्कूल में दाखिल कर दिया था ! वहां ही उसकी पूरी पढाई हुई और जीवन में कुछ बन जाने की दिशा मिली ! स्कूल में सिस्टर नेंसी के ज्यादा करीब था वो ! सिस्टर नेंसी यहीं शिमला से १५ किलोमीटर दूर के एक गाँव की ही रहने वाली हैं ! काम से रिटायर होने के बाद आजकल सिस्टर नेंसी अपने एक रिश्तेदार के पास यहीं पर ही रह रही हैं ! स्वस्थ नहीं हैं ! उन्ही से मिलने के लिए वो अक्सर अपने काम से छुट्टी ले कर शिमला आता रहता है ! 

        प्रार्थना ख़तम हुई !  सब एक दुसरे के साथ हाल - चाल पूछने लगे ! 

       श्रीकांत चुपचाप गिरिजाघर की सजावट को निहार रहा था ! सुन्दर काँच के रंबिरंगे झरोखे ! शीशम और साल की लकड़ियों से बने ऊंचे ऊंचे दरवाज़े ! मोमबत्तियों को जलाने के लिए सोबर मजबूत स्टैंड ! प्रार्थना के लिए खड़े होने और बैठने के लिए सालों पुरानी सीटें और बेंच ! अदभुद और अनोखा शांत वातावरण ! सब तो था यहाँ ! कमी क्या थी ! एक कमी थी - कोई साथी नहीं जिस से वो अपनी जिंदगी की बातें कहे ! उसपर सलाह ले या कैसे आगे की ज़िन्दगी को जिया जाये , के बारे में सोचे !  

सबकुछ तो मिल गया था उसको , सिर्फ ३० साल की उम्र में ! 

       अच्छी पढाई , जो उसने विदेश में ली , १२वीं के बाद मिशनरी के माध्यम से , मेडिकल की पढ़ाई ! ३ साल आस्ट्रेलिया में बिताने के बाद वापस भारत आया अपनी मिशनरी में , शहर में एक सुन्दर बड़ा सा मकान और पास में ही अपना क्लिनिक ! जिसमे  लोग विशवास के साथ आते हैं और श्रीकांत की ख्याति दूर दूर तक फैल रही है !  सब था , बस कोई भी अपना साथी नहीं था ! आज गिरिजाघर में भी इतने लोगों के बीच वो किसी का हाल ना तो पूछ पा रहा था और ना ही कोई उसकी तरफ बढ़ा , उसका दिल समझने के लिए !  भीड़ के बीच अकेला - अकेला सा बैठा था ! 

 धीरे धीरे गिरिजाघर के सभी आगंतुक चले गए !

श्रीकांत अब भी  बैठा था ! गिरिजाघर के पादरी और सेवादार अपना अपना काम करने में लगे थे !

रात हो चली थी !

भगवान् का घर भी बंद करना होता है रात में ! 

      एक १० से ११ साल का सुन्दर सा बच्चा अपने हाथों में सफ़ेद कपड़ा लिए सभी कुर्सियों , बेंचों को बारी बारी से साफ़ करता हुआ श्रीकांत की कुर्सी की तरफ बढ़ रहा था !  मन में सोचते हुए की श्रीकांत खुद उठ जाएँ अपनी कुर्सी से तो अच्छा हो  ! आखिर उस बच्चे के आने तक श्रीकांत नहीं उठा ! 

बच्चा : सर, आप इस वाली कुर्सी पर बैठ जाइये , मुझे वो कुर्सी साफ़ करनी है !

श्रीकांत के ध्यान टूटा और SURE बोलते हुए दूसरी कुर्सी पर जा बैठा ! बच्चा पुरे मन से सभी कुर्सियों को एक एक कर के साफ़ करता हुआ आखिरी कुर्सी तक जा पंहुचा , तब श्रीकांत ने आवाज लगाईं !

HELLO FRIEND !!

बच्चा : यस सर , कहिये ?

श्रीकांत : कुछ देर मेरे पास बैठो , दोस्त !

बच्चा : बस , २ मिनट सर !

कुछ देर बाद वो बच्चा श्रीकांत के पास की कुर्सी पर बैठ गया !

श्रीकांत : कहाँ रहते हो ? तुम्हारा नाम क्या है ?

बच्चा : पास के ही स्कूल में मैं पढता हूँ ,  वहीँ रहता हूँ  और मेरा नाम " समीर " है !

श्रीकांत : समीर , बहुत ही अच्छा नाम है ! किसने रखा !

समीर : माँ ने !!

श्रीकांत : माँ कहाँ रहती हैं ?

समीर : उसी स्कूल में जहाँ में पढता हूँ , वहीँ हो भी काम करती हैं ! वही के स्टाफ क्वाटर में हम रहते हैं !

श्रीकांत : और तुम्हारे पापा ?

समीर : मुझे नहीं पता , वो कोन हैं और कहाँ हैं !!

श्रीकांत ने विषय बदल कर पुछा : किस क्लास में पढ़ते हो ?

समीर :  8th में !

श्रीकांत : अच्छा , यहाँ पर रोज़ आते हो ?

समीर : हाँ जी , रोज़ शाम को आता हूँ !

श्रीकांत : क्यों ?

समीर : बस अच्छा लगता है ! मेरी स्कूल में कोई फीस नहीं जाती ! ड्रेस भी मुझे स्कूल से ही मिलती है ! खाना भी वहीँ  खा लेता हूँ ! ये सब इनकी ( ईसामसीह की की तरफ इशारा करते हुए ) ही दया से हो रहा है ! इस लिए अपनी तरफ से मैं इनकी सेवा इस तरह से करता हूँ !

        श्रीकांत इतने छोटे समीर के ये सब बातें सुन कर स्त्भ्द था ! हालाँकि उसने भी मिशनरी स्कूल में ही पढ़ाई करी और सहयोग के सहारे यहाँ पहुँच है , लेकिन समीर जैसा सेवा का कदम उसको कभी याद नहीं की किया हो !

कहाँ खो गए सर ? श्रीकांत की चुप्पी को तोड़ते हुए समीर ने पुछा !

श्रीकांत : कहीं नहीं , बस कुछ सोचने लगा था !

श्रीकांत ने अपनी दीवार की बड़ी घडी की तरफ देखा , रात के साढ़े सात बजने को थे ! 

समीर ने चलने के लिए अपने जुटे के फीते कसे और कमीज को अपनी नेकर में खोसते हुए श्रीकांत की और अपना हाथ मिलाने के लिए बढ़ा दिया !

श्रीकांत : अरे भाई , मैं भी चलूँगा ज़रा रुको !

समीर : नहीं सर , आज माँ ने खीर बनाई होगी और मुझे कहा है की समय से आने के लिए ! अब मैं चलता हूँ !

श्रीकांत : अच्छा ठीक है !

समीर : ओ के बाय ,सर ! फिर मुलाकात होगी !

श्रीकांत : बाय दोस्त !

समीर अपनी राह हो लिया !

श्रीकांत समीर को जाते देखता रहा !

         कुछ ही मिनटों की लिए ही सही समीर का साथ श्रीकांत के लिए ऐसा था ,जैसे सुर्ख सर्द हवाओं में नरम मुलायम रुई की रजाई ! ठण्ड से कपकपाते हाथों में इलायची वाली गरम चाय का प्याला , जिसे खूब कस कर पकड़ कर देर तक  अपने करीब रखने का मन करे , आखिरी घूँट तक !

        खालीपन मन में होता है जिसकी उपस्थिति को हम भीड़ के बीच महसूस करते हैं , अन्यथा चिठ्ठियाँ लिखने के लिए एड्रेस / पतों से भरी डायरी , फ़ोन करने के लिए लम्बी लिस्ट मोबाइल फ़ोन में और मोहल्ले में हर सामाजिक काम में दिए जाने वाले चंदे की पर्ची में तो आपका नाम रहता है , फिर भी आप अकेले ! आपका खालीपन भीड़ बताती है - जब आपके पास कोई ऐसा ना हो जो हर बात पर आपसे बात करे ! बड़ी बातें तो हो ही जाती हैं , छोटी बातों को बड़ा बनाने के लिए भावनाओं के करीबी सांचों की ज़रुरत आपके अपने ही पूरा करते हैं , जो गर्माहट दे कर ठंड से ठंडी होती सोच को , समर्पित रहने के लिए !

         श्रीकांत कुर्सी से उठा और गिरजाघर से अपने होटल की तरफ बढ़ने लगा ! गिरिजाघर की बाहरी दीवार के सहारे से श्रीकांत खड़ा हो कर , सड़क की कम होती चहल पहल को देखने लगा ! रंगीन बल्बों में चमकता पूरा ,बाज़ार  इतने सारे लोग सब अपनों अपनों में व्यस्त !

         श्रीकांत अपने होटल की तरफ बढ़ने लगा ! सड़क के किनारे किनारे दुकानों में रखे सामानों को निहारता हुआ ! हिमाचली टोपियाँ , ऊनी जेकेट , चूड़ीदार पारंपरिक पायजामे , हिमाचल के ही पारंपरिक सजावट के सामान ! चटक रंगों से बने , अनगिनत कपड़ों के स्टाल सब था ! पूरा हिमाचल माल रोड पर था ! जो चाहे ले लीजिये !

          मौसम बदलने लगा था ! हलकी बारिश होने लगी थी ! सर्दी बढ़ गयी थी ! हवाओं ने चलना मुश्किल कर दिया था सैलानियों का ! सब इधर उधर किनारे की दुकानों के अन्दर जाने लगे थे ! श्रीकांत ने भी एक चाय वाले के पास एक चाय का  आर्डर किया और पास पड़ी बेंच पर बैठने लगा की अचानक एक आठ साल के बच्चे ने उसे रोक दिया !

बच्चा : बस एक मिनट सर  ज़रा बारिश का पानी साफ़ कर देता हूँ नहीं तो आपकी महंगी पेंट खराब हो  जाएगी  !

श्रीकांत अवाक हो कर खड़ा रह गया , अँधेरे में बेंच पर पड़ा पानी उसको  नहीं दिखाई दिया था !

बच्चा : अब बैठिये सैर, मैंने साफ़ कर दी !

श्रीकांत : क्या करते हो ?

बच्चा कुछ नहीं बोला !

चायवाला बोला : सर , आपकी चाय !

श्रीकांत ने चाय पकड़ते हुए फिर से पुछा : ये बच्चा आपका है ?

चायवाला : नहीं सर , मुझे तो ये यहीं बस अड्डे पर मिला था २ साल पहले , अकेले , तभी से मेरे पास है ! मैं और ये दोनों मिल कर दूकान चलाते हैं !

श्रीकांत : आपने कभी इसके घर वालों की तलाश नहीं करी ?

चायवाला : करी थी सर, लेकिन अब काम छोड़ कर कितना ढूंढ सकता हूँ ! पास के सरकारी स्कूल में भेजता हूँ ! पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखा दी है , कोई आयगा तो ले जाएगा !

श्रीकांत ने दो पल कुछ सोचा और बोला : अगर मैं इसको अपने साथ ले जाना चाहूँ तो ?

चायवाला : सर , एक बार आप थाने में बात कर लीजिये !

श्रीकांत : नहीं , थाने से पहले मैं इस बच्चे से बात करेंगे !

बच्चे ने हामी में सर हिल दिया !

         बारिश थम चुकी थी ! ठंडक और कोहरे ने चाय की दूकान को घेर लिया था !  भीड़ बढ़ गयी थी चाय की दूकान के आस पास ! चर्चा थी ! कोई शहर का डाक्टर विष्णु को ले जा रहा है ! थाने में बात करी ! श्रीकांत ने सब सरकारी कागजात और ज़रूरात पूरी करीं ! और विष्णु को अपने साथ ले जाने लगा !

तभी विष्णु ने श्रीकांत का हाथ छुड़ा कर चाय की दूकान की तरफ भागा और एक छोटी से हाथ से बनाई हुई टोकरी सी ले आया !

श्रीकांत : ये क्या है ?

चायवाला : सर , बस ये ही एक चीज़ थी उस दिन इस के पास जब ये मुझे २ साल पहले मिला था ! इसे "कांगड़ी" कहते हैं ! इस में गर्म कोयले रख कर कश्मीरी लोग अपने कोट के अन्दर रखते हैं और हाथ तापते रहते हैं !

विष्णु : मैं इसे अपने साथ ले चलूँगा आपके घर !

श्रीकांत ने विष्णु को अपनी गोद में उठा लिया और विष्णु ने अपने अपनी कांगड़ी को !

       खालीपन और सहारे की खोज में एक दुसरे का सहारा बने दो लोग चल पड़े शिमला की माल रोड से होते हुए शांत और भीड़ से दूर गाँव में जहाँ मिशनरी के स्कूल में विष्णु अपन पढ़ने जाता है , लेकिन शाम को वो श्रीकांत के पास ही आता है , अपने घर पर !

                अजनबी , किन्तु एक ही प्रष्टभूमि के लोग खालीपन दूर कर के साथ साथ रहते हैं !

                                                    विष्णु , श्रीकांत और कांगड़ी !!

                                                                                                          :: मनीष सिंह ::

Tuesday, September 3, 2013

बच्चों की हथेलियों में !!

बचपन ,
चला गया,
जैसे हरश्रिंगार,
बिखर जाता है ,
ओस संग,
धरती पर !

महक रह जाती है,
देर तक ,
स्कूल जाते,
बच्चों की हथेलियों में !

वो रास्ते पर,
खड़ा पेड़,
याद रहता है,
दिन बा दिन,
वयस्क होते हुए !