Saturday, January 21, 2012

धीरे - धीरे आंच बने, अनुवान्छित सा ताप मिले !

" लकड़ी - कोयले का धुआं, मेरा तेरा अपनापन,
  हौले - हौले से उठती, अभिलाषाओं की सिहरन !
  धीरे - धीरे आंच बने,  अनुवान्छित सा ताप मिले,
  जिससे अनुकृत होता है, अनुबंधित ,पर नव जीवन !!"


Friday, January 20, 2012

आरक्षण के सहारे ऊचे पदों पर जाना आसान है किन्तु पहचान और भी मुश्किल हो जाती है !

" सोने के बर्तन मैं रखे जाने के बावजूद कोयला , कोयला ही होता है ....और दाग लगने के डर से दस्ताने पहन कर ही उसको छुआ जाता  है ! आरक्षण के सहारे ऊचे पदों पर जाना आसान है  किन्तु पहचान और भी मुश्किल हो जाती है ...क्यों की एक ठप्पा लग जाता है की ये स्थान आरक्षण से मिला है ...जिसके लायक कोई और था !!  जो जरूरतमंद था लेकिन आरक्षण वालो के कारण एक सही और जानकार व्यक्ति देश की सेवा से चूक गया .... ये आरक्षण के सहारे से बढती जा रही कम और अनुपयुक्त लोगो की फ़ौज देश को खोखला बनाए जाने मैं सबसे प्रबल दावेदार होगी !! " सरकार को आरक्षण दिए जाने के सिस्टम पर पुनर्विचार करना चाहिए !! देश हित और आगे आने वाली पीढ़ी के हित मैं ...! "
" धुंध मैं खो गए सारे खवाबों के झुण्ड,
  सब यथार्थ हो गया !!
  जब चला छोड़ कर अंगुलियाँ औरों की,
  सब यथार्थ हो गया !!
  सहारे-सहारे जो भी मिलता रहा ,
  उपलब्धियां नहीं, चरितार्थ हो गया !! "


Thursday, January 19, 2012

........... मेरे आंगन का शीशम !

" मेरी आशा , सा बढ़ता है,
   मेरे आंगन का शीशम !
   जिसकी छालों मैं पलती हैं,
   अनुमानों की सब कलियाँ !

  इसके - उसके संपर्कों से ,
  अनुभव - डाली , फूल खिलें !
  जिसकी छाया ऐसी  जैसे ,
  महका - महका सा चन्दन !!

  मेरी आशा , सा बढ़ता है,
  मेरे आंगन का शीशम !! "
 
   *****  सुप्रभात *****

Wednesday, January 18, 2012

जैसे जीवन को मिलती परिभाषाएं सी !!

" तीर्थ सा हो गया,जब मैं उस से मिला ,
  जिनसे मिलने की सदियों से आशाएं थीं  !
  स्नेह - करुणा भरा उसका  हल्का स्पर्श ,
  जैसे जीवन को मिलती परिभाषाएं सी !! "
सुप्रभात - माँ के सानिध्य मैं सुबह का आनंद अतुलनीय होता है ...माँ वालों आपको बधाई !!

Tuesday, January 17, 2012

आज मैंने परछाई से बातें करीं ,

" आज मैंने परछाई से बातें करीं ,
  मैं भी तनहा ही था , वो भी तनहा मिली ,
  जब से जन्मा हूँ मैं , कितना बदला हूँ मैं ,
  कितने रंग चढ़ गए , कितने संग हो गए ,

  वो कल भी उसी सी ही थी , एकदम स्याह रंग,
  फिर भी वो सुन्दर ही है ...क्योंकि बदली नहीं ..ये ही वजह वो परेशां नहीं ....
  किन्तु ये भी सच ही है ...बिना रंग के ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी....

 आज मैंने परछाई से बातें करी...... कुछ नहीं बोलती , बस सुनती ही है ...!!
 आरम्भ से अंत तक साथ ही साथ है ...फिर भी तनहा हैं ...."