सर्दियों की शाम के कोई चार बजने को थे , भारतीय घरों में सामान्यतः चाय का समय लेकिन वो कुछ परेशान सा था ...अभी अभी तो आया था माँ को अस्पताल में छोड़ कर बेसुध ...वो कुछ नहीं बोलती थी बस देखती रहती थी , आज भी नहीं बोली थी जब दोपहर को आये उनके लिए अस्पताल के खाने को ले कर उसने ही खाया ...क्यों की वो तो खाती नहीं थी ..बस आजतक सब का ख्याल रखती आई थीं ...आज भी उनके ही हिस्से का खाना बच्चों ने खाया था !! 1 घंटे का सफ़र कर के घर वापस आया था कुछ देर आराम करने के लिए ...अस्पताल में आराम कहाँ मिलता है ...वैस कर ने को कुछ काम नहीं होता लेकिन मानसिक तौर पर आप हमेशा व्यस्त रहेते हैं ... चिंताग्रस्त पता नहीं क्या होगा ? सोच सोच कर ....!!
अभी तीन महीने पहले ही उसकी माँ को जोंडिस हुआ था , संभल गयीं थी उनकी सेहत लेकिन पूरा घर अव्यवस्थित हो गया था ....सब कुछ दिशाहीन हो गया था !! कभी कभी लोग आते थे उनसे मिलने , बस मुस्कुरा देती थीं सारा दर्द अपने गले से निगलते हुए !! कमर में भी दर्द रहने लगा था ! थोडा झुक कर चलने लगी थीं ! एक दिन सबेरे अचानक चल नहीं सकीं , रुक गयीं कुछ बुखार सा था राहुल ने काम पर जाने से मना किया ...मम्मी मत जाओ आज ....हाँ पिता के देहांत के बाद काम करना पड़ता था राहुल की माँ को , राहुल और दो और बहनों की पढाई और खाने पीने के लिए .... बस आज नहीं जा सकी ...दर्द ज्यादा था !! दिन , हफ्ते और महीनी बीते ....इलाज चल रहा था ...और पैसा पानी की तरफ बह रहा था ...जो भी था उसी में से !!
स्थानीय डाक्टरों ने 26 जनवरी सन 2000 को मना कर दिया और किसी सरकारी अस्पताल में ले जाने ...हाँ दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाने की सलाह दी , लगभग कह ही दिया !! लोकल अस्पताल में जो खर्चा आया उसका भुगतान राहुल के मौसा जी ने किया ....वो खुद नहीं आये थे कभी भी ...हाँ पैसो का इन्तेजाम कर दिया !! अब दिल्ली के जी टी बी में था अपनी माँ को ले कर के ...सरकारी अस्पताल में ....अकेला ...दो बहने , पडोसी लोग आते थे मिलने कभी कभी , कोई दफ्तर से शाम को आता था ....कोई दिन में ...एक बार तो हाँ सिर्फ एक बार पुरे महीने माँ के अस्पताल में भारती होने के बाद माँ की पड़ोसन दोस्त साथ में मिलने आयीं थीं ! सब जिगरी दोस्त थीं राहुल की माँ की !! किसी ने स्वेटर बनाना सीखा था तो किसी ने जीवन में कैसे अकेले लड़ा जाये सीखा था .... उनको देख कर पुरे महीने चुप रहने वाली राहुल की माँ पहली बार और आखिरी बार बोली थीं ...एक सबसे करीबी दोस्त को देख का कर और उनके शब्द थे - " अब आई हो ?? " जैसे बोलना चाह रहीं थे की बस अब तो मैं जा रही हूँ ...इतने दिनों तक इंतज़ार किया और तुम लोग नहीं आये ....अब आये हो ...?? !! लेकिन इस पुरे समय में राहुल की सबसे छोटी मौसी उसके साथ थी ! हर कदम पर ....किन्तु सब को चलना खुद ही होता है ...और पैर नगें हो तो तपिश ...चाहे वो कैसे भी रूप में हो ....पैसो की कमी , नाते रिश्तेदारों का नकारीबियत समय पर , समाज में कम पहचान , इत्यादि !!
दिन , हफ़्तों कर के वो दिन आ ही गया जब उसकी माँ चली गयी !! रात के करीब 12 बज रहे थे , अचानक माँ की साँसें तेज़ चलने लगीं , राहुल समझ गया था की आज सब ख़तम ....हो जायगा ...वो चुपचाप अस्पताल के उसक वार्ड के दरवाज़े पर खड़ा हो कर अपनी माँ को कराहते हुए जाते हुए देख रहा था ...ना रो पा रहा था , ना ही कुछ कर पा रहा था ....दौड़ कर रात की ड्यूटी पर के डाक्टर को ले कर आया ...उसने देखा और सब बंधन निकाल दिए ...नेबुलिज़ेर , सलाइन सब ...और कहा ...ये अब जिन्दा नहीं हैं ...मेरे साथ आइये ...मैं मृत्यु प्रमाण पत्र लिख देता हूँ !! सब खामोश ...एक डरवाना सन्नाटा !! उस रात ....राहुल के दो दोस्त ...अमित और सुधांशु उसके साथ थे ....एक दूर के भैया भी साथ थे ...एक अम्बेसेडर कार में पिछली सीट पर राहुल और उसके दोनों दोस्तों की गोद में लेट कर आयीं थीं , अपने घर राहुल की माँ ...अंतिम बार ...फिर जा कर कभी ना आने के लिए !! बहनों को सान्तवना दी ...और रिश्तेदारों को फ़ोन किये !! सब कुछ आस पड़ोस और कुछ लोगो ने अंतिम सब किया जो ज़रूरी था !!
ये कोई समय नहीं था राहुल की माँ का जाने का !! दिशाहीन और पैसों की कमी के कारन उनका इलाज़ सही ...और सही समय पर न हो सका !! पिता लगभग 15 साल पहले गुजर गए थे ..और अब माँ भी नहीं !! ज़रा अंदाज़ा लगा लीजिये ...उन बच्चों का ...रिश्तेदार आये और तय किया की राहुल को एक नौकरी में मदद करेगे ...आज राहुल नौकरी कर रहा है ...लेकिन एक बात हमेशा कचोटती है उसे ....माँ का इलाज़ सही से ना हो सका ..सही अस्पताल में ...पास में पैसे नहीं थे ...!! उसने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया ...बचपने में सुनी एक कहानी और किशोरावस्था में अपने साथ हुए माँ के हादसे से सबक लेते हुए !! कहानी सुनी थी की जब अच्छे दिन हो तो ..खाने पिने की चीज़ों को जमा कर लेना चाहिए ....बुरे वक़्त के लिए ....!! जब माँ अस्पताल में भारती थी को वहाँ एक सज्जन ने सलाह दी थी : जब भी नौकरी करो तो अपना मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना ....ताकि आपका परिवार दो तरह से ना पीड़ित हो ...एक आप को देख कर और दुसरे ये सोच सोच के की पैसे कहाँ से आएंगे .. ठीक इलाज़ के लिए .....!! एक रोटी कम खा लेना लेकिन मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना !! आज राहुल ने अपना मेडिकल बीमा किया हुआ है ...खुश है , ये सोच कर की यदि बीमार पड़ा तो इलाज़ के लिए पैसे का ना होना मुद्दा नहीं होगा !! .....
ज़िन्दगी हम सब को समय से पहले बड़ा होने के लिए हमेशा तयारी करती रहती है !! एक बड़ा कदम हम सबको अपनी ज़न्दगी में ज़रूर उठाना चाहिए .... कुछ रकम अपने ऊपर मेडिकल बिमा करवा कर ताकि आपके असमय कहीं जाने की परिस्थिथि में अकेलापन ...साथी ना बने क्यों की राहुल के रिश्ते के लोग बार बार बुलाने पर भी शायद इस लिए वहां नहीं आये ये सोच कर के कहीं खर्चे न करने पड़ें ...हमें राहुल की ज़गह खुद को रख कर देखा ...और पाया की ज़रुरत है ...बेहद ज़रुरत है बिलकुल वैसे ही किसी मेडिकल बीमे की जैसे की हमें स्वयं को जीवित रखने के लिए भोजन करना होता है !!
समय कभी एक सा नहीं रहता , अच्छे समय में उठाया गया छोटा ही सही बीमित होने का कदम आपको मानसिक और आपके परिवार को सहारा देता है ...ताकि सम्मान और सांसारिक बंधन बने रहें लम्बे समय तक !! सोचियेगा ... अन्यथा सब कुछ तो चल ही रहा है अपनी गति से अब पिछड़ना या साथ चलना हम पर है , वर्ना , हम में से कोई भी राहुल हो सकता है !!