Friday, October 26, 2012

.... अच्छे समय में उठाया गया कदम !!

                  सर्दियों की शाम के कोई चार बजने को थे , भारतीय घरों में सामान्यतः चाय का समय लेकिन वो कुछ परेशान सा था ...अभी अभी तो आया था माँ को अस्पताल में छोड़ कर बेसुध ...वो कुछ नहीं बोलती थी बस देखती रहती थी , आज भी नहीं बोली थी जब दोपहर को आये उनके लिए अस्पताल के खाने को ले कर उसने ही खाया ...क्यों की वो तो खाती नहीं थी ..बस आजतक सब का ख्याल रखती आई थीं ...आज भी उनके ही हिस्से का खाना बच्चों ने खाया था !! 1 घंटे का सफ़र कर के घर वापस आया था कुछ देर आराम करने के लिए ...अस्पताल में आराम कहाँ मिलता है ...वैस कर ने को कुछ काम नहीं होता लेकिन मानसिक तौर पर आप हमेशा व्यस्त रहेते हैं ... चिंताग्रस्त पता नहीं क्या होगा ? सोच सोच कर ....!!

            अभी तीन महीने पहले ही उसकी माँ को जोंडिस हुआ था , संभल गयीं थी उनकी सेहत लेकिन पूरा घर अव्यवस्थित हो गया था ....सब कुछ दिशाहीन हो गया था !!  कभी कभी लोग आते थे उनसे मिलने , बस मुस्कुरा देती थीं सारा दर्द अपने गले से निगलते हुए !!  कमर में भी दर्द रहने लगा था ! थोडा झुक कर चलने लगी थीं ! एक दिन सबेरे अचानक चल नहीं सकीं , रुक गयीं कुछ बुखार सा था राहुल ने काम पर जाने से मना किया ...मम्मी मत जाओ आज ....हाँ पिता के देहांत के बाद काम करना पड़ता था राहुल की माँ को , राहुल और दो और बहनों की पढाई और खाने पीने के लिए .... बस आज नहीं जा सकी ...दर्द ज्यादा था !! दिन , हफ्ते  और महीनी बीते ....इलाज चल रहा था ...और पैसा पानी की तरफ बह रहा था ...जो भी था उसी में से !!

          स्थानीय डाक्टरों ने 26 जनवरी सन 2000 को मना कर दिया और किसी सरकारी अस्पताल में ले जाने ...हाँ दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाने की सलाह दी , लगभग कह ही दिया !! लोकल अस्पताल में जो खर्चा आया उसका भुगतान राहुल के मौसा जी ने किया ....वो खुद नहीं आये थे कभी भी ...हाँ पैसो का इन्तेजाम कर दिया !! अब दिल्ली के जी टी बी में था अपनी माँ को ले कर के ...सरकारी अस्पताल में ....अकेला ...दो बहने , पडोसी लोग आते थे मिलने कभी कभी , कोई दफ्तर से शाम को आता था ....कोई दिन में ...एक बार तो हाँ सिर्फ एक बार पुरे महीने माँ के अस्पताल में भारती होने के बाद माँ की पड़ोसन दोस्त साथ में मिलने आयीं थीं  ! सब जिगरी दोस्त थीं राहुल की माँ की !!  किसी ने स्वेटर बनाना सीखा था तो किसी ने जीवन में कैसे अकेले लड़ा जाये सीखा था .... उनको देख कर पुरे महीने चुप रहने वाली राहुल की माँ पहली बार और आखिरी बार बोली थीं ...एक सबसे करीबी दोस्त को देख का  कर और उनके शब्द थे - " अब आई हो ?? "  जैसे बोलना चाह रहीं थे की बस अब तो मैं जा रही हूँ ...इतने दिनों तक इंतज़ार किया और तुम लोग नहीं आये ....अब आये हो ...?? !! लेकिन इस पुरे समय में राहुल की सबसे छोटी मौसी उसके साथ थी ! हर कदम पर ....किन्तु सब को चलना खुद ही होता है ...और पैर नगें हो तो तपिश ...चाहे वो कैसे भी रूप में हो ....पैसो की कमी , नाते रिश्तेदारों का नकारीबियत समय पर , समाज में कम पहचान , इत्यादि !!

                 दिन , हफ़्तों कर के वो दिन आ ही गया जब उसकी माँ चली गयी !! रात के करीब 12 बज रहे थे ,  अचानक माँ की साँसें तेज़ चलने लगीं , राहुल समझ गया था की आज सब ख़तम ....हो जायगा ...वो चुपचाप अस्पताल के उसक वार्ड के दरवाज़े पर खड़ा हो कर अपनी माँ को कराहते हुए जाते हुए देख रहा था ...ना रो पा रहा था , ना ही कुछ कर पा रहा था ....दौड़ कर रात की ड्यूटी पर के डाक्टर को ले कर आया ...उसने देखा और सब बंधन निकाल दिए ...नेबुलिज़ेर , सलाइन सब ...और कहा ...ये अब जिन्दा नहीं हैं ...मेरे साथ आइये ...मैं मृत्यु प्रमाण पत्र लिख देता हूँ !!  सब खामोश ...एक डरवाना सन्नाटा !! उस रात ....राहुल के दो दोस्त ...अमित और सुधांशु उसके साथ थे ....एक दूर के भैया भी साथ थे ...एक अम्बेसेडर कार में पिछली सीट पर राहुल और उसके दोनों दोस्तों की गोद में लेट कर आयीं थीं , अपने घर राहुल की माँ ...अंतिम बार ...फिर जा कर कभी ना आने के लिए !!  बहनों को सान्तवना दी ...और रिश्तेदारों को फ़ोन किये !! सब कुछ आस पड़ोस और कुछ लोगो ने अंतिम सब किया जो ज़रूरी था !!
                 ये कोई समय नहीं था राहुल की माँ का जाने का !! दिशाहीन और पैसों की कमी के कारन उनका इलाज़ सही ...और सही समय पर न हो सका !! पिता लगभग 15 साल पहले गुजर गए थे ..और अब माँ भी नहीं !! ज़रा अंदाज़ा लगा लीजिये ...उन बच्चों का ...रिश्तेदार आये और तय किया की राहुल को एक नौकरी में मदद करेगे ...आज राहुल नौकरी कर रहा है ...लेकिन एक बात हमेशा कचोटती है उसे ....माँ का इलाज़ सही से ना हो सका ..सही अस्पताल में ...पास में पैसे नहीं थे ...!! उसने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया ...बचपने में सुनी एक कहानी और किशोरावस्था में अपने साथ हुए माँ के हादसे से सबक लेते हुए !!  कहानी सुनी थी की जब अच्छे दिन हो तो ..खाने पिने की चीज़ों को जमा कर लेना चाहिए ....बुरे वक़्त के लिए ....!!  जब माँ अस्पताल में भारती थी को वहाँ एक सज्जन ने सलाह दी थी : जब भी नौकरी करो तो अपना मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना ....ताकि आपका परिवार दो तरह से ना पीड़ित हो ...एक आप को देख कर और दुसरे ये सोच सोच के की पैसे कहाँ से आएंगे .. ठीक इलाज़ के लिए .....!! एक रोटी कम खा लेना लेकिन मेडिकल बीमा ज़रूर करवाना !! आज राहुल ने अपना मेडिकल बीमा किया हुआ है ...खुश है , ये सोच कर की यदि बीमार पड़ा तो इलाज़ के लिए पैसे का ना होना मुद्दा नहीं होगा !! .....
                  ज़िन्दगी हम सब को समय से पहले बड़ा होने के लिए हमेशा तयारी करती रहती है !!  एक बड़ा कदम हम सबको अपनी ज़न्दगी में ज़रूर उठाना चाहिए .... कुछ रकम अपने ऊपर मेडिकल बिमा करवा कर ताकि आपके असमय कहीं जाने की परिस्थिथि में अकेलापन  ...साथी ना बने क्यों की राहुल के रिश्ते के लोग बार बार बुलाने पर भी शायद इस लिए वहां नहीं आये ये सोच कर के कहीं खर्चे न करने पड़ें ...हमें राहुल की ज़गह खुद को रख कर देखा ...और पाया की ज़रुरत है ...बेहद ज़रुरत है बिलकुल वैसे ही किसी मेडिकल बीमे की जैसे की हमें स्वयं को जीवित रखने के लिए भोजन करना होता है !!
                समय कभी एक सा नहीं रहता , अच्छे समय में उठाया गया छोटा ही सही बीमित होने का कदम आपको मानसिक और आपके परिवार को सहारा देता है ...ताकि सम्मान और सांसारिक बंधन बने रहें लम्बे समय तक !!  सोचियेगा ... अन्यथा सब कुछ तो चल ही रहा है अपनी गति से अब पिछड़ना या साथ चलना हम पर है , वर्ना ,   हम में से कोई भी राहुल हो सकता है !!

Wednesday, October 24, 2012

.... नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!

              दिल्ली के आकाशवाणी भवन से बाहर निकला तो मेरे हाथ में एक निमंत्रण पत्र था जो उस दिन से मुझे दस दिनों पूर्व सन 1991 में एक सामान्य डाक से मिला था !
                आकाशवाणी के युववाणी के लिए कुछ कविताएँ रिकार्ड करवाने के लिए !
तकरीबन 10 मिनिट्स के लिए 2 गीत मैंने रिकार्ड करवाए अपने अन्य साथीयों के साथ !! वो बड़ा ही सुनेहरा दिन था , तीसरी बार आया था मेरे सामने ये समय , हर बार मैं कुछ सीखता ही जाता था !! 

                रिकार्डिंग के 10वें दिन एक चेक मिला " भारतीय स्टेट बैंक , संसद मार्ग " का एक पत्र के साथ जिसकी पहली पंक्ति को पढ़ कर लगता है जैसे की आप ने ना जाने कितना देश हित का कार्य कर दिया और किसके लिए आपको पारितोषिक दिया जा रहा है .... लिखा है ( है इस लिए लिख रहा हूँ क्यों की वो पत्र अब भी है मेरे पास ) " भारत के राष्ट्रपति की और से .....आपको दिनांक ......आपके द्वारा किये गए कविता पाठ के लिए प्रति पाठ रूपये मात्र 100/- संलग्न चेक भेजा जा रहा है जिसकी अवधि 6 माह है ( अब 3 माह हो गयी है ) ! अब उन दिनों मेरे पास कोई बैंक अकाउंट नहीं होता था  तो ये चेक कहाँ जमा करूं !! किसी बैंक में अकाउंट खुलवाना 1991 - 1995 में कितनी बड़ी बात और पेचीदा बात होती थी ....जो लोग उस समय के होने को पता होगा और मेरे से इत्तेफाक रखेंगे !!   एक रास्ता निकला !! एक बायलर बनाने वाली कंपनी के मालिक स्वर्गीय श्री संजीवा तानिय्यापा सुवर्णा जी के सबसे छोटे बेटे को हिंदी पढ़ता था तो उनकी पत्नी जी ने मेरा अकाउंट अपने बैंक " विजया बैंक " नवयुग मार्किट में खुलवा दिया ! मैंने चेक जमा करवाया और पुछा की सर कितने दिनों में पैसा आ जायगा ?

          मैं पंद्रह दिनों के बाद अपने बैंक पहुंचा ! सुबह के 10.15 बज रहे थे ! सरकारी बैंक अब भी 10 बजे ही खुलते हैं और पब्लिक डीलिंग 2 बजे बंद हो जाती है ! अजीब सी बात है ! अपना ही पैसा ! अपने ही काम के लिए किसी दुसरे की सुविधा के अनुसार प्रयोग में लाये जा सकते हैं !! कमाल है भाई ! वैसे आज कल कुछ निजी बैंकों ने फिर से सरकारी कर्मचारियों को थोडा और समय पर काम करने के किये मजबूर किया तो है !!   खैर हमें अपने सामने बैठे अधिकारी को पुछा की साहब ज़रा मेरे अकाउंट का बैलेंस देख कर बता दीजिये !! ठीक है अपना अकाउंट नंबर बोलिए ....हमने बताया , उन्होंने एक बड़ी मोटी  सी लेज़र जो की दो मोटे मोटे काले काले लकड़ी के दो फ़ाइल नुमा पन्नों को पलते हुए देखा और सबसे आखरी पंक्ति को पढ़ते हुए कहा ...हाँ जी इतना बैलेंस है ... मैंने हिसाब लगाया ...अरे अभी तो वही है जो खाता खुलवाते हुए था ...उन्होंने पुछा कब खुलवाया था ? 15 दिन पहले ....!! अच्छा रुकिए !!उन्होंने कहाँ ...हाँ रुकिए ..एक एंट्री करनी बाकी है ....हाँ अब इतना है !!

            सही रकम के बारे में आश्वस्त होने के बाद मैंने कहा कुछ पैसे निकलवाने हैं !! उन्होंने एक विद्रोवल फॉर्म मेरी और बढ़ा दिया ...इस को भर दीजिये ...! हमें भरा ! फिर उनको दिया !! उन्होंने एक टोकन नुम्बर उस पर लिखा और मुझे एक पीतल का टोकन दे दिया मुझे और कह दिया की वहां बैठ जाइए ...जब ये नंबर पुकारा जाए तो केश काउंटर पर जा कर पैसे ले लीजियेगा !! हम जैसे एकदम विजयी मुस्कान के साथ वहां रखे एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गए और अपने चेक की यात्रा को देखने लगे !!
          सबसे पहले टोकन देने वाले साहब ने टोकन दिया और टोकन नुम्बर लिखा विठ्राल फॉर्म पर ! फिर वो चेक चला गया एक और वरिष्ठ अधिकारी के पास , उन्होंने फिर से उसी मोटी सी फ़ाइल को पलता और बस दो बार में ही मेरे अकाउंट वाला पेज निकाल लिया , और समान्तर ही कम्प्यूटर पर कुछ देखा ....और कुछ किया ...बाप रे  उसको करते हुए वो साहब कुछ कुछ सामंजस में थे ....पर कुछ कर गए ...! अब अगले काउंटर पर चेक गया ! ये काउंटर सब से महत्वपूर्ण !! अगर यहाँ से पास हो गया तो पैसा मिलेगा नहीं तो बस सिद्ध कीजिये की आप ही आप हैं !!  वहां क्या क्या की हुआ ..... पहले तो उन्होंने देखा ....टोकन नंबर लिखा है की नहीं , फिर दो मैन्युअल लेज़र में एंट्री है तो उसके होने के प्रमाण सवरूप पहले अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं , फिर वो ही एंट्री कम्पुटर में है की नहीं ....अगर हैं तो उसके होने के प्रमाण सवरूप दुसरे अधिकारी के हस्ताक्षर हैं की नहीं ....चलिए ये दोनों तो मिल गए ...अब बारी आई ...मेरे हस्ताक्षर मिलाने की .... उन्होंने अपने सामने रखी एक अलमारी में करीने से रखे कुछ छोटे छोटे गट्ठों में से मेरे एकाउंट्स के नुम्बर वाले गट्ठे को निकला और वो ही कार्ड निकला जिसमे मेरे दो नमूना हस्ताक्षर थे ...उनसे मिलान किया गया ...तब सब ओके मिला तो वहां से अगले काउंटर पर दिया गया ...वहां नंबर से सैम को बुलाया जा रहा था ... लगभग 15 मिनट्स के बाद मेरा नंबर आया ...मेरा चेक मेरी तरफ ही बढाते हुए उन्होंने कहा अपने हस्ताक्षर कीजिये ...ये कन्फर्म करने के लिए की में ही हूँ ...जिसने वो चेक सबसे पहले काउंटर को अपना चेक दिया था !! और पूरे 1 घंटे के बाद मुझे मेरे ही पैसे मिले .. वाह वो ज़माना !!  और आज सिर्फ एक क्लिक करने के बाद हम निश्चिंत हो जाते हैं की हमारा पैसा सही जगह पर सही समय पर पहुच गया !! मुझे याद नहीं की आजकल मैं अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से कब गया होऊंगा !! जब आज कल की सुविधाएं नहीं थीं तब ये चाहिए था किन्तु ये भी सही है की 50% लोग ...अपने बैंक में व्यक्तिगत रूप से नहीं जाते और ये तक नहीं जानते की वो लोग जो ये सुविधाएँ दे रहे हैं वो दिखने में कैसे हैं .... !! अरे ये क्या बात कह दी मैंने ..ज़रुरत क्या है उनको देखने की ? काम हो रहा है ना !! भाई तो कम तो तब भी होता था लेकिन हम उनको देख पाते थे और मन की भड़ास निकल पाते थे ...पर आज समय पर काम हो रहा है तो भी उनको साधुवाद नहीं दे पाते ...हाँ मन में हुआ तो कस्टमर केयर पर एक इ मेल छोड़ देते हैं .......लेकिन सुना है की इन बैंकों के दफ्तर काफी बड़े और सुन्दर होते हैं ....और कर्मचारी ड्रेस कोड में रहते हैं ...सब सामान दिखने के लिए ...क्यों की सरकारी सोपानो पर  आरक्षण का सहारा भी होता है ना म उस पर ना असर पड़े इस लिए !!