Friday, February 1, 2013

भोर गाती है , सुनो .....01.05.1992 को लिखा मेरा एक गीत.... !!

01.05.1992 को लिखा मेरा एक गीत ......संग्रहण से .....

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तम घुल रहा तरु झूमते ,
      अब भोर गाती है , सुनो !
          सूर्य निर्मित नव - धुनें ,
              इस और आती हैं , सुनो !!

<><><><>  पहला अंतरा <><><><>

हर कली पर, थी निशा भर,
मौनता छाई हुई,
श्वेत चन्दा की किरण भी,
आईं शरमाई हुई !

बांटता फिरता था सुरभि,
जब कभी शीतल पवन,
जिस से शीतल हो रही थी ,
मौन वृछो की तपन !!

शून्य तकते पत्थरों से,
आज निर्झर कह रहे ,
पर्वतों पे अब किरण कुछ ,
शोर लाती हैं , सुनो ......!!

भोर गाती है सुनो ....

<><><><> दूसरा अंतरा <><><><>

दूर तक धरती सजीली,
श्याम रंग से थी रंगी,
ओस की बूंदों में लिपटी ,
दूब कोमल थी सजी !!

जिनको गाता था पवन,
वो स्वर चलो फिर से भरें,
उन स्वरों संग सूर्य किरणे,
आज अम्बर से झरें !!

सूर्य नव कुछ रच रहा ,
अब "तूलिका" किरणे बनीं,
जो शिखर के व्योम पर ,
कुछ नव रचाती हैं सुनो !!

भोर गाती है , सुनो ........



                     ::::::::::::::::: मनीष कुमार सिंह - 01.05.1992 में लिखा एक गीत :::::::::::::::::

Wednesday, January 30, 2013

शंख ,सीपियों के टुकडे और पीले-पीले से पन्ने जहाँ स्याही फैली-फैली सी है ...रिश्तों की तरह ....!!

          रोज़ सुबह के आठ बजे एक दो आवाजें हमारे छोटे से शहर को पूरी दुनिया से जोड़ देती थी ! आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले राष्ट्रिय समाचारों के माध्यम से हम पिछले 24 घंटो में घटी घटनाओं जुड़ जाते थे ....!!
                                              दो विशेष नाम मुझे याद हैं ;

                             " क्लेयर नाग " और " देवकी नंदन पाण्डेय "

          याद कीजिये वो अर्थपूर्ण और गंभीर उद्घोष जो आरम्भ होता था ...कुछ इन शब्दों से ...." ये आकाशवाणी है ...अब आप " क्लेयर नाग " / " देवकी नंदन पाण्डेय "  से समाचार सुनिए ! ऐसा लगता था मानो की आकाश से स्वयं कोई शक्ति हमें दुनिया से जुड़े रहने को कह रही हो ये बता कर !

             नानी दमन के समुद्र के किनारे पर अपने मौसेरे भाई के साथ काली काली रेत में अपना भविष्य तलाश रहा था ...और वो था की ...अँगुलियों के किनारों से बार बार निकल जाता था ....मैं फिर कॊशिश करता था .....बार बार , तभी अचानक रेडियो ...हाँ जी वोही आकाशवाणी का वाहक पर खबर सुनाई पड़ी की " क्लेयर नाग " जी का एक दुर्घटना में निधन हो गया है , देवकी नंदन जी की आवाज़ अब सुनाई नहीं देती ...जसदेव सिह जी जिनकी आवाज और 26 जनवरी की परेड का आंखोदेखा हाल सुनाया जाना एक दुसरे का पर्याय बन गया गया था ...अब सुने नहीं जाते !!
             रात का समय , प्यालियों में चाय और बिस्किट और बाहर होती बारिश में तेज़ चलती हवाओं में रेडियों पर आते समाचार ...जिनसे आवाज़ बार बार कही निर्वात में चली जाती थी ....फिर कोई ना कोई उस रेडियो को एक कोने में लेजाकर एडजस्ट करता था ...तब लगता मानो उद्घोषक की साँसों में सांस आई हो ...और आवाज़ सुनाई पड़ने लगती थी , आज वो आवाजें बिलकुल खामोश हैं .....ऍफ़ एम् चलता रहता है ...बस चलता रहता है !!
          
                सबेरे 6 बजे से रात के 11 बजे तक सुनाई देने वाली आवाजें .....अब हर वक़्त आती रहती हैं ....किस भी चीज़ का अधिक्य रोग की शक्ल ले लेता है और उसके कारण से बचने की सलाह दी जाती है ....!!
            विभिन्न आकर्षक शीर्षक वाले थोड़े थोड़े समय के कार्यकर्म जैसे :

1. जयमाला - फौजियों की रिक्वेस्ट पर आधारित गानों का कार्यकर्म,
2. छायागीत - रात में 10 बजे से पुराने गानों का कार्यकर्म,
3. विचित्र किन्तु सत्य - रोचक सत्य जानकारियो पर आधारित कार्यक्रम,
4. हवा महल - अनोखा कार्यक्रम

इत्यादि ....

                  राजधानी के 3 टियर कोच में साइड लोअर बर्थ ( मेरी पसंदीदा बर्थ ) पर लेटे हुए सफेद चादर ओढ़ कर " विपाशा " का कहानी विशेषांक पढ़ रहा था की अचानक किसी ने लगभग झकझोरते हुए कहा सर आपका मोबाइल गिर गया है .... मैंने उसे धन्यवाद देते हुए अपना मोबाइल उठाया और फिर से लेट गया ...क्या करता दोपहर के 12 बजे थे ...खाना 1 बजे लगने वाला था ...और अगला स्टेशन कुछ 2 घंटे के बाद आता ...और कोच में सब अपने अपने में मगन ...ना कोई बात ना चीत ....बस लेपटोप और आई फ़ोन पर आतंरिक खोखलेपन को कुछ दूर करने की बाहरी व्यस्तता का पारंपरिक ट्रेन का नज़ारा मेरे सामने था ....!! ये त्र्वेंद्रम राजधानी थी ...शाम को पहुचती दिल्ली .....किसी बीहड़ वन से होते हुए गुजरी तो दिखाई पड़ा की कुछ लोग एक घास के छप्पर वाली दूकाननुमा जगह पर रेडिओ सुन रहे थे  और स्वयं को दुनिया से जोड़ रहे थे ...ये ट्रेन भी दिखाई देती भर थी उनको , इसमें चढ़ने का सुभाग्य कहाँ !!

              कुछ दुरी पर समुद्र की सहायक नदी थे शायद ....जिसमे कुछ जीवन , जीवन ढूंढ़ रहे थे और बच्चे ढूंढ रहे थे शंख , सीपियाँ जो कभी हमरी पीढ़ी ने भी संजोई थीं अब टुकड़ो में हैं हमारी यादों में जिनको जोड़ कर यादें प्रतिरूप कर रहे हैं उनमे ...जो आज है , के कल थे के साथ ....किसी पुराने बसते की कोने की जेब में मिल जाती है कभी तो कभी अपने ही घर के आंगन की की दीवार की दो इंटों के बीच गडी हुई कील के रूप में मिलती है ....कभी दिखाई देती है अपने ही घर के किसी स्टोर रूम की बंद पड़ी अटेची में पीले पीले कागजों के रूप में ....जिस पर स्याही फैली फैली सी है ...रिश्तों की तरह ....!!

                                                              आपका अपना   
                                                                                       :  मनीष सिंह