कुछ सपने खिलखिलाते,
कुछ अपने मिलने आते ;
कुछ बातचीत होती,
कुछ फांसले मिटाती !
निष्प्राण तूलिकाएं,
कम्पित तरंग होतीं,
अफ़सोस वो नहीं था,
उस रात वो नहीं था !
वो डायरी का पन्ना,
उस रात लिखा जाता ;
मन जुगनू जगमगाते,
ऐ काश ,वो जो आता !
खामोश सीपियों में,
आनंद ,प्राण पता ;
अफ़सोस वो नहीं था,
उस रात वो नहीं था !
वो रात महक जाती,
वो रात चहक जाती ;
आशाओं कि किताबें ,
उस रात बहक जाती !
शब्दों को अर्थ मिलते,
कुछ गीत ,गद्य खिलते ;
शब्दों को अर्थ मिलते,
कुछ गीत ,गद्य खिलते ;
अफ़सोस वो नहीं था ,
उस रात वो नहीं था !
::: मनीष सिंह