" किसी भी तरह के "" पूर्वाग्रह "" की "" तपिश "" आप के कोमल और अनमोल विचारों एवं उनकी अभिव्यक्ति को भंजित अथवा " नष्ट " कर देती है ! "
Friday, October 28, 2011
Thursday, October 27, 2011
अधिक सहारा ...बोझ सा लगता है........
" आज वो दोपहर याद आ गयी जब मैं अपने स्कूल से पैदल खरखाई नदी के पुल को पार कर रहा था .... दुरी पर एक दूसरा पुल था ...जिस पर से रेलगाड़ी आया जाया करती थी , पर पिछली रात एक दुर्घटना हुई थी.... पुरुषोत्तम एक्सप्रेस को एक माल गाड़ी ने टक्कर मार दी थी ... भयानक मंजर था ... माल गाड़ी का इंजन पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के पिछले डब्बे के लगभग ऊपर की जा चढ़ा था ... बहुत लोगो की मौत और घायल होने का समाचार आया था .... ! "
हाँ लेकिन मेरे और मेरे जैसे और कितने ही लोगों के लिए एक सामान्य सा दिन था.... ... स्कूल से छुट्टी के बाद मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ मदमस्त हो कर के वापस आ रहा था.... नदी पर पहुँच कर हम कुछ देर के लिए रुके और दुर्घटना को देखने लगे .... बचाव का काम चल रहा था .... कुछ जीवें अगर बच सकें तो बचा लिए जाए , प्रशाशन के प्राथमिकता ....!!
नदी के किनारे किनारे खूब घने पेड़ थे.... और जंगल कहा जाये तो भी कोई बात नहीं .... हमें दर नहीं लगता था....क्यों की "छठ " के अवसर पर हम यहाँ आया करते थे ... .... पर आज कुछ अजीब सा वातावरण था... इस लिए हम जंगल मैं नहीं गए .... ! आदित्य पुर की तरफ नदी का पुल पार होते ही एक छोटी सी चाय वाले की दूकान थी...४ गुना ४ की... उसमे वो चाय और मठरी रखता था.... पर मुझे पसंद थे उसके गुलगुले ..... जो वो अक्सर बारिश के दिनों मैं बनता था ...और चार आने के ४ देता था..... लेकिन उन दिनों चार आने बमुश्किल मिलते थे .... !
एक बार तो मुझे अपने एक ग्रुप फोटो को खरीदने के लिए ५ रुपे की ज़रुरत थे... पेसे जमा करने की आखरी तारीख पास थी और मुझे कोई उम्मीद नहीं की मुझे पैसे मामा जी या मामी जी देंगी.... हाँ पिता जी के देहांत के बाद मुझे मेरे मामा जी के घर रहना पड़ा था कुछ ५ साल.... तो मैंने अपने मामा जी के जेब से २० रुपे चुराए थे ५ - ५ के चार नोट.....जमा भी किये.... फोटो भी मिला ..और चोरी के जुर्म मैं खूब पिटाई भी हुई.... !
आप क्या हैं ये आपके साथ बीते और किये गए व्यवहार पर भी निर्भर करता था.... साधन की बात बहुत बाद मैं आती है.... आप क्या चाहते हैं पहले ये नियत होना चाहिए ...और उसके लिए वातावरण , और वातावरण के लिए आप के बड़ों की पहेल ....और सब हो जाए तो साधन जुटाने की बात.... आती है.... ! हम अपने को दूसरों के लिए सही या गलत करते वक़्त ये भूल जाते हैं ...की दूसरा भी आप के ही तरह इंसान या सोच रखने वाला है...... बड़ों को ये चाहिए की यदि आप किसी भी तरह से छोटो के लिए ज़िम्मेदार हैं तो अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए ....झूठा आश्वाशन या निभाने के ढोंग की प्रकिया आप को ही उनकी नज़रों मैं छोटा कर देगी ....और आपके द्वारा बाद के वादे कोई मायने नहीं रखेंगे ....क्यों की जिस वक़्त बेल को सहारे की ज़रुरत थी आप नहीं थे और आज जब संभल गये तो अधिक सहारा ...बोझ सा लगता है........
समय पर लिया गया कोई भी निर्णय ......निर्णायक ही साबित होता है .... चाहे किसी भी सन्दर्भ मैं हो....फिर....हाथ पर हाथ रख कर कोई मंजिल नहीं मिला करती.... बस के तमगा मिलता है.... ये इंसान कभी कुछ गलत नहीं .......न ...न .न..... कुछ करता ही नहीं !
..............याद रखना होता है !
रौशनी के उत्सव पर विशेष तजुर्बा - " रौशनी करने के लिए अंधेरों को अधिक प्रबलता से याद रखना होता है ! "
Sunday, October 23, 2011
एक समाचार " इस बार दिवाली पर उल्लुओं की किस्मत खराब ! "
एक समाचार " इस बार दिवाली पर उल्लुओं की किस्मत खराब ! " .... लोग दिवाली पर उल्लू की बलि दे कर के लक्ष्मी को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं ......की लक्ष्मी उनके पास आयेंगी !
भाई लेकिन मेरे हिसाब से तो इस दिवाली पर कुछ उल्टा ही है .... उल्लुओं की मौज है ....!
कंपनी मैं जो लोग पुरे साल उल्लू कहे जाते हैं .... बराबर का इन्क्रीमेंट पाते हैं ....
पूरी क्लास मैं उल्लू कहे जाते हैं.... बस एक आरक्षण का कार्ड चलते हैं ... वोही सीट पाते हैं जिसके लिए दुसरे जी जान लगाते हैं .... उल्लू ...अपना उल्लू सीधा कर जाते हैं ... दिवाली मानते हैं ...!
भाई इस दिवाली उल्लू परेशानी मैं नहीं मौज मैं है ,,,,, और आरक्षण वाले तो पुरे साल ही मौज मैं होते हैं...और पुरे के पुरे घी मैं दुबे रहते हैं... इश्वर की ये तो माया है ... कहीं सिर्फ धुप तो कहीं छाया ही छाया है.... " उल्लू मौज मैं हैं भी , कभी भी ... कहीं भी ..... बे शक ! "
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