Saturday, February 16, 2013

... जो, आते नहीं , चले जाने के बाद !!

                   
रेलवे  प्लेटफार्म
की खाली सीटें,
कल आने वालों का,
इंतज़ार करती है,
आज जाने वालों,
और ,रेल के बाद !

जैसे मन,
आपका और मेरा,
इंतज़ार  करता है,
भावों की सीटों पर,
उनके  लिए ,
जो, आते नहीं ,
चले जाने के बाद !!


                                          <><><><> मनीष सिंह <><><><>

Friday, February 15, 2013

मारीचिका, प्रगाढ़ - रिश्तों की !!

हस्ताक्षर करती कपास,


भीग कर,

वजनी लगती है !

जैसे दीख जाती है,

मारीचिका,

प्रगाढ़ - रिश्तों की ;

उत्सवों , समारोहों में !!

समयांतर में सूख कर,

पुनः , सफ़र पर,

निकल पड़ते हैं,

कपास से,

हम और आप ,

यथार्थ के साथ !!

::::::::::::::::::: मनीष सिंह :::::::::::::::::::

Thursday, February 14, 2013

" वसंत "

" वसंत "


ये ही नाम है उसका !
पीली सरसों के दानो सा,
दरकता जाता है...
भट्टी में ,
इसकी - उसकी,
नज़र , उतरता हुआ !!

पीलापन सरसों का,
आखों में उतार लाया है,
असमानता का ज्वर !
जिसे और अधिक,
गहरा कर देते हैं,
बसंत-पंचमी के रंग !!

::::::::::: मनीष सिंह ::::::::::

Wednesday, February 13, 2013

..........खुरदरे हाथों से सिकी रोटियां !!

" खुरदरे हाथों से सिकी रोटियां,

   बारीक टूटते पठार ,

   पसीने का चिकनापन ,

  आसान कर देते हैं,

  जीवित रहना,

  ये सोच कर ...

  कुछ बाकी है ...!


  सो जाता है , वो रोज़

 उन्ही हाथो का सिरहाना

 बना कर..

 पसीना पोछता हुआ ...

सिकी रोटियां पड़ी रहती हैं,
आस में , चिकनाहट की !!
                                                                                                             :::::::::: मनीष सिंह :::::::::::::

Monday, February 11, 2013

कुंभ में हादसे पर एक श्रधांजलि !!

जैसे ,गरम कुल्हहड़ के किनारों से
चिपकते होठ !

आस्था की गोंद से चिपकती,
अथाह भीड़ !

आनंदित, समर्पित आत्माएं ,
चलती रहती हैं ,

साँसों के रुकने तक !
हर बार व्यवस्थाओं की अग्नि में,
आहुति ले कर ,
जीवित रहता है ;

आस्था का हवनकुंड !

जिसे , पुनः शुद्ध कर देते हैं ,
ऐसे कुंभ !!
                              :::::::::: मनीष सिंह ::::::::::::