" विविध भारती " .... जी हाँ आपने भी सुना होगा ये नाम तो ... अच्छा जो लोग १९८८ से पहले जन्मे हैं वो ज़रूर जानते होंगे !! एक रेडियो स्टेशन है ....जी हाँ आज भी है ...किन्तु ऍफ़ एम् रेडियो आ जाने के बाद इस महान रेडियो की आवाज़ कम सुनाई देती है ... लेकिन जब भी सुनाई देती है ...आपके कदम रोक लेती है ... मजबूर करती है की आप ठिठक कर , रुक कर कुछ देर सुने इस को .... और अपनापन महसूस करैं .....
मैं आठवीं या नौवी मैं पढता रहा होऊंगा , हम तीनो बहिन भाई अच्छे से स्कूल की ड्रेस पहन के के तैयार... और हमारी मम्मी जी गर्म गर्म पराठे बना कर दे रही होती हमें दही के साथ थोड़ी चीनी दाल कर ... सच मैं अद्भुद स्वाद ... कभी कभी आलू ये भिन्डी के भुज्जी स्वाद और बढ़ा देती थी....और इन सब के साथ " रेडियो पर चल रहे पुराने गाने " "विविध भारती " पर... .... आनंद दो गुना कर देती थी .... कार्यकर्म शाश्त्रिये संगीत पर आधारित होता था ...
सवेरे ९ बजे एक प्रोग्राम आता था नाम था " चित्रलोक " आनंदित कर देने वाले गाने ... फिर १० बजे एक नया प्रोग्राम " संगम " अच्छे लोगो की फ़र्मिऐश पर अगने आते थे .... ...
शाम को कुछ बहुत अच्छे अच्छे कार्यकर्म आते थे " विचित्र किन्तु सत्य " ...
" जयमाला " - ये प्रोग्राम सिर्फ सैनिक भाइयों के लिए होता था ....
सुप्रभात , संगीतमाला - पहले "बिनका " थी, फिर बाद मैं " सिबाका " हो गयी .... अमीन सायानी जी के साथ .....उनका उनवान था " हाँ बहनों और भाइयों ....." मस्त अंदाज़ और अनोखी बोली... वाह... इन्होने राह दिखाई लोगो को किस तरह से रेडियो पर बोला जाता है .... दिशानिर्देशक थे वो लोग...
हर रोज़ एक प्रोग्राम आता थे नाम था " हवा महल " .... उस प्रोग्राम के शुरू करने की धुन ही मुझे अनादित कर देती थी .... और दिन के अंत मैं प्रोग्राम आता था ... नाम था " छाया गीत " और अंत मैं रात के ११ बजे कुछ मुख्य समाचारों को सुना कर उद्घोषक का कहना " रात के ग्यारह बजा चाहते हैं , अब हम आपसे विदा लेते हैं , कल पुन आपके भेंट होगी ... नमस्कार " जय हिंद " .... आप को अपने भारतीय होने का एहसास होता था !
कल जो बीत गया ....उस को बीतना ही था ...आज के लिए , और आज जो बीत रहा है , वो कल के लिए ये आज के नवजीवन का दायित्व बनता है की कल आप याद किये जाएँ की आप उनको एक सुदर्ध विरासत दे कर गए हैं ...!
क्या क्या हमें मिला है ... मेरी मम्मी जी ने मेरे लिए इंद्रजाल कोमिक्स के दो संकलन छोडे हैं .... मैं चंदा मामा का पिछले १० सालों का " चंदामामा " का संकलन जोड़ रहा हूँ... और भी बहुत कुछ है ...
आइये ज़िन्दगी को जिया जाए , उल्लाह्स को संजोया जाए ...आज की उपलब्धयों से साथ-साथ पुराने संकलन को सहेज कर........ !