Friday, March 22, 2013

" गौरैया " रेशमी धागों सी ......

" गौरैया "


रेशमी धागों सी,
लहराती, फुदकती!
आंगन में,
दीवार पर,
पंखे के खोल में,
रोशनदान से,
उतरती,
कहती रहती,
जीवन तभी है,
जब समिप्प्य हो,
स्नेह हो,
सहयोग हो,
आदर हो !

अब,कम आती है,
थाली से,चावल
सब्जी, दाल,
चुगने को,
दूर हो गयी वो !
दीवारों ने कम
कर दिया,
आपसी सौहाद्र
  एक परिवार में !!
                                                                                                     --::-- मनीष सिंह --::--

Thursday, March 21, 2013

... आग्रह करते दिन, परिपक्कव् होती रातें !!

कितनी भोरें,
कितनी शामें,
कितनी रातें,
कितने दिन,
और साथ,
     रहेंगी !!

गुल्लक टूटी,
गुडिया छूटी,
संभव मन,
संबंधों में बदले !
बचपन से,
आग्रह करते दिन,
परिपक्कव् होती रातें,
सतत,
परिपूर्ण भोर,
निर्मित करती हैं !!


                                 <>< Manish Singh ><>

Wednesday, March 20, 2013

चिनारों पर पतझड़ है !!

इन दिनों,
" चिनारों "पर पतझड़ है !
सब दिखता है,
इस पार से,
उस पार तक !
सही है,
ऊँचाइयाँ भी,
निर्भर है !
लघु-आयु,
अस्तित्वों की!

संवाद, विचार,
सामंजस्य,
बांधे रखते है !
इनका आभाव,
आर-पार कर देता है,
सब कुछ , सभी कुछ !!
संबंधों में पतझड़,
की तरह !!

                <>< मनीष सिंह ><>

Sunday, March 17, 2013

भारतीय रेल - भारतीयता को जीवंत रखती है , सतत , निरंतर चलते हुए !!

                              मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन - सपनो की नगरी का द्वार !!
           समय से पहले पहुच कर रेल की प्रतीक्षा करना और उस समय का आनंद लेना मुझे अच्छा लगता है ! क्यों की वैसे तो रेलवे स्टेशन पर जाने का कोई मौका नहीं मिलता की कोई कहे चलो आज रेलवे स्टेशन भ्रमण कर आया जाए , किसी मशहूर पार्क की तरह ! वैसे हम इस बात बार सहमत हैं की भारत के कई रेलवे स्टेशन अपने आप में भ्रमण स्थल की तरह ही है ! चाहे उनको अंग्रेजो ने बनवाया हो या आज़ादी के बाद भारत ने स्वयं !
          आप सिर्फ एक स्टेशन पर एक स्थान पर शांति से धेर्य के साथ बैठ जाइये जैसे अपने घर या सिनेमाहाल में   बैठते हैं ; सामने के द्रश्य स्वयं अपने आप समयांतराल के बाद बदलते रहेंगे और आप आनंदित होते रहेंगे चाय की चुस्कियों के साथ !!

         साल २००४  की बात है मैं अधिकारिक कार्य से मुंबई में था ! कुछ दिनों के छुट्टी मिली थी तो दिल्ली आ कर परिवार के साथ समय बिताने के लिए ट्रेन का टिकिट लिया और पहुच गया मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन - ट्रेन पकड़ने के लिए ...निर्धारित समय से १ घंटा पहले ....आदत के अनुसार !
         भारतीय रेल की सर्व्श्रेस्ष्ट रेलों में से एक " अगस्त क्रांति - राजधानी " कोई ४:३० शाम से ५ बजे के बीच चलती है वहां से !! ट्रेन को देख कर ही आनंद लेते थे ! गर्व महसूस करते थे की हम ऐसी ट्रेन के देश में रहते हैं जो खाने , पीने , सोने , जागने और वातानुकूलन के साथ साथ सामान्य समय से कम समय में गंतव्य तक पहुचाती है ! आज उसमे यात्रा करने का मौका मिलेगा ! 
जब आप कुछ ऐसे काम करने की तयारी में होते हैं जो की सामान्यतः दिनचर्या में शामिल नहीं है तो आप का व्यवहार भी कुछ ना चाहते हुए भी अलग सा हो जाता है ...दूसरों जैसे लगने जैसा ....थोड़े कम समय के लिए ही सही , किन्तु हाँ !!
               
           स्टेशन पर उद्घोषणा हुई :  यात्रीगण कृपया ध्यान दें  मुंबई सेन्ट्रल से चल कर वडोदरा  मथुरा के रस्ते हजरत निजामुद्दीन जाने वाली गाड़ी संख्या अगस्त क्रांति राजधानी एक्सप्रेस  आज अपने निर्धारित समय १ ६ बज कर ५ ० मिनट के स्थान पर ५ घंटे देरी से चलने की सम्भावना है , यात्रियों को हुई असुविधा के लिए हमें खेद है !  बस, अब क्या था सब के खिल खिलाते चहरे अचानक से मुरझा से  गए , किसी ने क्या सोचा था , किसी ने क्या प्लान बनाया था , किसी की किस से छोटी सी किन्तु महत्वपूर्ण मुलाक़ात थी तो किसी को आगे की गाड़ी लेनी थी , किसी का भावनात्मक जुड़ाव तो किसी का व्यापारिक हित ....सब गड़बड़ होने को था ! खैर कर भी क्या सकते थे ...अब तो देरी हो चुकी थी ...तो आगे भी कल ट्रेन देर से ही पहुचने वाली थी , इसी के साथ चलना था !
            चाय, पकोड़े, बिस्किट,नमकीन और रेल नीर के सहारे शाम बीती ...धीरे धीरे पूरा का पूरा प्लेटफोर्म यात्रियों से भर गया ...अगले पांच घंटो में चलने वाली गाड़ियों के लोग आते जाते रहे ! हम लोग अपने को किसी दुसरे के घर में जबरदस्ती घुस कर बेठा सा महसूस कर रहे थे ! खाना किसी ने नहीं खाया ....ट्रेन में जो मिलता है ! करीब ९ : ५ ० बजे ट्रेन प्लेटफोर्म पर लगी ... गोल्डन टेम्पिल मेल के  जाने के बाद ! सब बेसब्री से इन्तेजार कर रहे थे !!

           जल्दी जल्दी सब ने अपनी अपनी बर्थ ली , थके हारे इंतज़ार करने लगे सामान्य रूप से आने वाले राजधानी के नाश्ते , चाय , पानी का ! रात के १ ० बजे नाश्ता करना कोई समझदारी है तो नहीं लेकिन बहुत से लोग जल्दी सोते नहीं और कुछ थोडा खा कर रात देर से खाने की आदत  होते हैं ! खैर हुआ सब गड़बड़ !

           अब देखिये क्या क्या हुआ और होना क्या चाहिए था :

१. पानी के बोतल मिली - बिना ग्लास के , एकदम गरमा गरम - ठंडी नहीं !
२. एक सज्जन आये - सर आप डिनर में क्या लेंगे - वेज , नॉन वेज ?
३. सब ने अपने अपने पसंद की बात बता दी !
४. कोच में पुराने गानों की धुन नहीं बज रही थी , समाचार नहीं सुनाई दे रहे थे , कोई उद्घोषणा नहीं !
५. दस मिनट के बाद सब के हाथों में खाना परोसा जाने लगा !

सब अचंभित ! ये क्या भाई ? सर खाना ! अरे यार नाश्ते का क्या हुआ ?
सर १ ० बजे तो खाना मिलेगा ना !
हमारे साथ एक सरदार जी अपनी फेमिली के साथ यात्रा कर रहे थे ! उन को बर्दाश्त नहीं हुआ , बोले - भाई मुझे तो मेरे हिस्से का नाश्ता ला कर दो , खाना में बाद में खाऊंगा !! सर , आप हमारे बड़े साहब से बात कर , लीजिये नाश्ता तो नहीं है !
सरदार जी - चल फिर बोल उनको !
सर वो लास्ट कोच में बेठे हैं !
सरदार जी - चल भाई बुला कर ला उनको !
कुछ देर में वो साहब आये , भरपूर बेहेस हुई !
और अंत में किसी को नाश्ता नहीं मिला ....किन्तु किसी को कोई पैसा वापस भी  नही मिला !
सब ने बे मन से खाना खाया !
फिर थोड़ी देर में कोच के  ए सी ने काम करना बंद कर दिया ! तकनिकी स्टाफ को बुलवाया गया ! बस  एक बात जो सरदार जी ने उस समय कही उसने ही ये सब लिखने और सहेजने को बाध्य कर दिया ! तकनिकी स्टाफ के आने के बाद उसने पुछा :

हमें किसी ने बुलवाया था ?
सरदार जी बोले : जी हाँ , आपके दर्शन का मन था सर !
क्यों ?
आपकी यूनिफार्म का रंग देखना था - सरदार जी बोले
क्या मतलब सर ?
सरदार जी बोले - सर, आप लोग हमें ये बताइये , ये गाड़ी कौनसी हैं ?
तकनिकी स्टाफ बोले - सरदार जी ये अगस्त क्रांति राजधानी एक्सप्रेस है . आप एसा क्यों पूछ रहे हैं ?
सरदार जी बोले - सर क्या ये सही में राजधानी है ?
वो बोला - बिलकुल ये राजधानी है , क्यों ?
सरदार जी बोले - क्यों की आज इस ट्रेन में राजधानी की फील नहीं आ रही !
सरदार जी का ये वाक्य बोलना था और सब के तनाव और थके हुए चेहरों पर ख़ुशी की लहर दौड़ गयी ! कोच का माहौल एक दम बदल गया !
राजधानी ट्रेन का पूरा का पूरा वरिष्ठ स्टाफ ग्रुप थोडा अपने को सहज महसूस करने लगा ! तभी सब से वरिष्ठ सदस्य ने घोषणा कर अपनी पूरी पावर का प्रयोग करते हुए - सब को हमारी तरफ से जीतनी मर्जी आइसक्रीम एक बार और खिलाई जाए और ये यात्रियों से विनती है की इस ऑफर को कृपया स्वीकार करें !

रात के १ २ : ३ ० बजे " वापी " के आस पास  पहुचे और सब ने आइसक्रीम ख़तम करी और भारतीय रेल के एक रंग का आनंद लिया !

ऐ सी ठीक हो चूका था ! कूलिंग बढ़ गयी थी ! कोच में हलकी सी चन्दन की खुशबू फ़ैल गयी थी !

बच्चो के लिए हल्का गर्म दूध रेल की तरफ से दिया गया !

एक सदस्य सुबह के नाश्ते की फरमाइश ले कर चला गया था ! किसी ने वेज , किसी ने नॉन वेज , किसी ने जैन और किसी ने कोंतिनेंतल कह दिया था ! सब कुछ सामान्य !

           मुझे  नींद नहीं आ रही थी ! अपनी साइड लोअर सीट पर बहार का नज़ारा देख रहा था ! एक छोटी बच्ची मेरे सिरहाने आ कर खड़ी हो गयी ...मुझे उस के स्पर्श जो बिलकुल रूई के फोए जैसा था लगा ! मुड कर देखा उसके  फादर उसके साथ थे ...वो उसको ट्रेन में टहला रहे थे !

मुझे एक बार फिर अपने भारतीय होने पर गर्व हो रहा था ! 
हम सब कुछ करते हैं ,किन्तु अंत में सब सामान्य हो जाते हैं एक परिवार की तरफ , एक कुनबे की तरह ! भारतीय रेल - भारतीयता को जीवंत रखती है , सतत  , निरंतर चलते हुए !!