Sunday, August 3, 2014

एक कहानी : पोशम्पा पा ……

        तेज़ रफ़्तार से दौड़ती टैक्सी लाल बत्ती पर रुकी तो " अनिरुद्ध " की नज़र सड़क के उस ओर लंच टाइम मे पोशम्पा पा भाई पोशम्पा पा   … खेलते बच्चों पर टिक गयी ! उनके सुरीले और तारतम्य लिए शब्दों ने उसे लगभग बाँध सा दिया था !  ड्राइवर ने तेज़ और लम्बा हॉर्न बजाया फिर गाड़ी आगे बढ़ा दी  ! उन 120 सेकेंड्स में अनिरुद्ध जैसे बचपन , किशोरावस्था और जवानी का सफर कर आया था , पोशम्पा भाई पोशम्पा की शंब्दिक और भावपूर्ण नाव में हिचकोले लेते हुए !
 
         बीनू भाई ज़रा गाड़ी उसी स्कूल के पास फिर से ले चलो जहाँ लाल बत्ती पर रुके थे ! अनिरुद्ध ने ड्राईवर से आग्रह किया !
 
         बीनू ने जी सर कहते हुए गाड़ी अगले गोल चक्कर से वापस मोड़ ली और पूछा : साब किसी को मिलना है उस स्कूल में आपको ?
 
अनिरुद्ध निरुत्तर था !
 
बीनू ने कुछ देर बाद फिर पुछा : साब , स्कूल के अंदर ले लू ?
 
अनिरुद्ध : नहीं , यही पलाश के पेड़ नीचे रोक लो !
 
बीनू : सर ,ये नो पार्किंग ज़ोन है , फाईन हो सकता है !
 
       अनिरुद्ध ने कुछ रूपये निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिए और की कहा कुछ चीज़ों की कीमत नहीं होती बंधू और अपनी हाथ घडी को ठीक करता हुआ स्कूल की दीवार की तरफ बढ़ गया !
 
       अनिरुद्ध स्कूल की दीवार पर अपनी दोनों बाँहों को टिकाये खेलते बच्चों में अपना बीता बचपन तलाशने लगा ! जब शशांक और बाकी दोस्त पोशम्पा खेलते थे तो अनुपमा कितना रोती थी उसको भी साथ खिला लेने के लिए लेकिन वो दोनों ही उसको नहीं खेलने देते थे !
 
बीस ,पचीस सालों पहले बीत चुके दिनों की यादों में  खो गया था अनिरुद्ध दीवार पर बाँहों बीच ठुड्डी टिकाये !
 
       आज तो मेरा बर्थडे है ऐनी ( अनुपमा अनिरुद्ध को ऐनी कह कर पुकारती थी ! )  आज तो अपने साथ खेलने दो ! अनुपमा बोलते हुए क्लास रूम से शशांक और अनिरुद्ध के पीछे पीछे चल रही थी !
 
अनिरुद्ध : एक शर्त पर !
 
अनुपमा : वो क्या ?
 
तुम्हे मेरा और शशांक का बैग घर तक ले चलना होगा : अनिरुद्ध मुस्कुराते हुए बोला !
 
अनुपमा ने अपनी भौंह सिकोड़ते हुए हामी भरी !
 
           20  - 25 मिनट का रास्ता - खेल फिर बारिश , धुप और सर्द हवाओं में सड़क के किनारे लगे पलाश के पेड़ों के नीचे चलते हुए घर पहुचना ! रोज़ का काम था उन तीनो का ! जब बड़े हुए तो सामाजिक दायरे सिकुड़े और सब अलग अलग हो गए  ! पिता की ट्रांसफर के कारणं सब बिखर गया ! समय अपनी चाल से चलता रहा !

           शरीर ,दिमाग और ज़रूरतें कुछ चीज़ें भूल जाते हैं किन्तु हर उस चीज़ को मन ज़रूर याद रखता है जिसे आप भूलना चाहते है क्योंकि किसी को भूलने के लिए आपको उसको सबसे ज़्यादा याद रखना होता है !
 
बहुत सालों बाद :::::
 
            पहली नौकरी थी वो अनिरुद्ध की ! एक दवा कंपनी में ! अभी दो महीने ही हुए थे उसको की उस कंपनी में आय एस ओ सर्टिफिकेशन का प्रोसेस शुरू हो गया था ! तब कम्प्यूटर आया आया था और अनिरुद्ध उस का यूज़ जनता था इस लिए कुछ मैनुअल्स टाइप करने का काम उसको ही दिया गया और उसका कम्प्यूटर रखा गया लैबोरेटरी में !
 
क्या , अनिरुद्ध भाई आज आप जल्दी आ गए ? टाइम ऑफिस के खान ने पुछा !
 
अनिरुद्ध : हाँ , खान भाई आज दो पेपर पूरे करके देने हैं !
 
खान : मुझे लगा की आप आज आने वाली नई लैब असिस्टेंट से मिलने के लिए जल्दी आये हैं !
 
अनिरुद्ध : कोई न्यू जॉइनिंग है क्या आज ?
 
खान : जी हाँ ! वसीम साब के दोस्त की बेटी हैं ! रूडकी से आ रही हैं , नाम है अनुपमा !
 
          अनिरुद्ध को अब जैसे हर मिनट एक घंटे सा लगने लगा ! गोल गोल घूम कर लैब की पुरानी सी घडी ने नौ बजाये और वसीम साब की गाड़ी गेट पर आ रुकी !
 
अनिरुद्ध ने लेब की खिड़की से देख कर कन्फर्म कर लिया की खान ने सही कहा था की गलत !
 
           रोज़ मज़ाक करने वाला खान आज सही था , अनुपमा उतर चुकी थी गाड़ी से और सीढ़ियों से होते हुए मेन ऑफिस में दाखिल हुई !

लेकिन , ये वो तो नहीं !

            अनिरुद्ध के अंतर्मन ने आँखों को जवाब दिया ! अनिरुद्ध रिशेप्शन का दरवाज़ा जिस जोश से खोल कर बहार गया था उसके आधे से भी कम उत्साह से आ कर अपने कम्प्यूटर के सामने बैठ गया ! अनमना और अनुत्साहित ! खान के मुह से अनुपमा का नाम सुन कर ना जाने क्या क्या सोच लिया था उसने और सब एक बुलबुले सा एक पल में खत्म !

         अनिरुद्ध ये अनुपमा हैं ! आज से तुम्हारा कम्प्यूटर ये भी शेयर करेंगी रिपोर्ट्स तैयार करने के लिए ! वसीम साब ने एक सोबर और सलीके से हाथों में राइटिंग पैड पकडे लड़की से उसको मिलवाया !

अनुपमा ये अनिरुद्ध हैं  , कहते हुए वसीम साब प्लांट की तरफ चले गए !

लैब में अब दो अजनबी थे !

कुछ देर  ख़ामोशी के बाद अनिरुद्ध ने ही पुछा : ये आपकी पहली  जॉब है ?

अनुपमा की पीठ थी अनिरुद्ध की ओर , उसने  टेस्ट ट्यूब में कुछ केमिकल मिलाते हुए जावाब दिया : हाँ !

अनिरुद्ध और अनुपमा फिर खामोश हो गए !

        एक दूसरे को चाह कर भी नहीं देख सकते थे ! बगल के दरवाज़े पर शीशा था जो बाहर की लॉबी में आने जाने वालों को लेब में एक नज़र डाल लेने को काफी था और फिर प्रोडक्शन एरिया से आने जाने का रास्ता भी वही था जिस से वसीम साब भी गुजरते थे !
 
       दोनों लगभग हमउम्र !

       दोनों के अंदर अंदर उधेड़बुन !

       एक दूसरे को जान लेने की चाहत !  
 
          अनुपमा अनिरुद्ध की अँगुलियों से दबते की बोर्ड की आवाज़ के बीच खुद का नाम सुनने  कोशिश करती थी तो अनिरुद्ध अनुपमा की हाथों में पकड़ी टेस्ट ट्यूब की रगड़ के बीच अपने को पुकारे जाने का इंतज़ार करता था ! दोनों एक दूसरे की पहल करने के इंतज़ार में अपना अपना काम करते रहे और सुबह से दोपहर हो गयी !
 
अरे भाई आज लंच नहीं करोगे दोनों ? शर्मा जी ने लेब का शीशा लगा दरवाज़ा थोड़ा सा खोलते हुए कहा !
 
जी सर ,  चलिए आते हैं ! अनिरुद्ध ने शर्मा जी ( लैब इंचार्जे ) को जवाब दिया और शर्मा जी वापस लंच रूम की तरफ बढ़ गए !
 
चलो अनु लंच ले लेते हैं !

अनिरुद्ध ने अनुपमा  की तरफ बिना देखे कम्प्यूटर लॉग ऑफ करते हुए कहा !
 
तुमने मुझे अनु कहा ?
 
अनिरुद्ध अचानक से किये गए अनुपमा के इस सवाल पर ठिठक गया !
 
अनिरुद्ध : कुछ गलत कह गया क्या मैं ?
 
अनुपमा कुछ नहीं बोली डबडबाई आँखों से अपना लंच बॉक्स ले कर लैब से बाहर निकल गयी !

अनिरुद्ध जैसे मृगतृष्णा में डूबा कम्प्यूटर के सहारे खड़ा रह गया ! लैब से होती हुई लॉबी से गुजरती अनुपमा को देखता हुआ.

दस मिनट  बाद !

तुम खाना नहीं खाओगे क्या ? अनुपमा लैब के दरवाज़े पर खड़ी अनिरुद्ध से पूछ रही थी !

हाँ, चलो आता हूँ कहता हुआ अनिरुद्ध टिश्यू पेपर से हाथ पोंछता हुआ दरवाज़े की तरफ बढ़ गया !

          लैब से लंच रूम की दूरी सिर्फ 50 कदम की थी और उन दोनों को जैसे पूरा जीवन मिल गया था अपनी कह सुनने के लिए !

बुरा लगा तुम्हे मेरा तुम्हे अनु कहना ? : अनिरुद्ध  ने पुछा !

अनुपमा : हाँ भी और ना भी !

अनिरुद्ध : हाँ कैसे ? और ना कैसे ?

अनुपमा : अभी में यहां बहुत दिन हूँ , फिर किसी रोज़ बताउंगी !

दोनों लंच  कर के अपनी अपनी सीट  बैठ गए थे  ! दोनों की पीठ दूसरे की तरफ ! निगाहें और हाथ अपने अपने काम पर किन्तु जुबान दूसरे से बात करती हुई !

अनुपमा : वो भी मुझे अनु कह कर बुलाता था !

अनिरुद्ध : वो , कौन ?

अनुपमा : मेरा एक पुराना दोस्त ! जिसे मैंने दिया पिछले महीने !

अनिरुद्ध : खो दिया मतलब ?

अनुपमा खामोश हो चुकी थी ! जैसे तेज़ आंच पर उबलती चाय पर अचानक कुछ ठन्डे पानी छीटें पड़ गए हों !

अनिरुद्ध निरुत्तर अनुपमा की तरफ घूम गया और फिर से पूछा :  खो गया मतलब अनु क्या हुआ तुम्हारे दोस्त को ?

अनुपमा  की आँखें डब डबा रहीं थीं !

अनिरुद्ध : क्या हुआ अनु ?

अनुपमा बह चली यादों की लहरों पर    .......

        मैं और फज़ल स्कूल से साथ साथ थे ! कॉलेज में भी साथ रहे ! फिर वो दिल्ली चला आया और अच्छी नौकरी करने लगा ! हम दोनों घर बसाना चाहते थे ! सब तय लिया था हमने सिर्फ घर के लोगो की मंजूरी के सिवाय ! अनुपमा की भीतर की यादों की नदी भावनाओं के किनारों को तोड़ती हुई बह चली थी अनिरुद्ध उनसे उठती शब्द फुहारों से पल पल भीगता जाता था !

फिर ? अनिरुद्ध ने वर्ड की फाइल को डेस्क टॉप सेव करते हुए पुछा !

        उस दिन दोपहर में फज़ल मेरे घर पर आया और हम मूवी देखने गए ! अभी पिछले महीने की ही बात है !उसको पहेली बार मिली थी मैं दिल्ली में उसकी नौकरी लगने के बाद !  दिन भर एन्जॉय के बाद  मैं  लौटी तो हमारे घर का माहौल कुछ बदला बदला लगा मुझे ! दरअसल मेरे पापा को अंदाजा हो गया था की हम दोस्ती को रिश्ते में बदलना चाहते हैं और उन्होंने मुझे  ताउजी के पास भेजने का फैसला किया था ! अगले दिन की ट्रैन थी डेल्ही से !

अगली सुबह मैंने अपनी छोटी बहन के थ्रू फज़ल को सब कुछ बता दिया !

          दोपहर को रुड़की से दिल्ली आये टैक्सी से फिर हमने ट्रैन पकड़ी और पटना के लिए निकल गए ! अगले दिन हम पटना में ताऊ जी के घर थे ! पापा का रिटर्न टिकिट अगले दिन शाम का था ! दोपहर में ड्राइंग रूम में रखे लैंड लाइन फ़ोन की घंटी बजी ! ताई जी ने फ़ोन उठाया और मुझे दिया ये कहते हुए की मेरी छोटी बहन है लाइन पर ! रिया के उन दो वाक्यों को सुनने के बाद उस दिन से मेरी ज़िन्दगी जीने की इक्छा खत्म हो गयी !

अनिरुद्ध : क्या कहा था उसने ?

          अनुपमा मोमबत्ती सरीखी निरंतर शब्द दर शब्द जलती जा रही थी और पिघलती जा रही थी :

         जब हम रुड़की से दिल्ली को चले थे तब उस रोज़ रुड़की से नई  दिल्ली रेलवे स्टेशन तक फज़ल भी हमारे पीछे पीछे आया था बाइक पर ! हमारी ट्रैन चले जाने बाद वापस लौट रहा था की रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो गया और वो गुजर गया ! तब से मैं अकेली हूँ ! मैं परेशान रहती थी तो डाक्टर की सलाह पर मुझे कुछ बदलाव के लिए यहाँ  भेजा गया है ! वसीम अंकल मेरे पापा के दोस्त हैं !

अनिरुद्ध आवाक , अचेत और निःशब्द था !

तुम कहाँ खो गए हो ? अनुपमा ने अनिरुद्ध के कन्धों पर अपनी अँगुलियों को रखते हुए कहा !

यहीं हूँ ?

क्या सोच रहे हो ?

यही की मिलने के सौ बहाने और बिछड़ने के सिर्फ एक , वो भी ऐसे !

दोनों एक दूसरे को देख रहे थे ! कुछ  था जो खीच रहा था दोनों को !

अभी बात शुरू ही हुई थी की 4 बजे का हूटर बज उठा !

ऑफिस के पीयून " सोजल " ने लैब का दरवाज़ा खटखटाते हुए पुछा अनिरुद्ध भाई साब , अनुपमा दीदी आपके लिए चाय लाऊँ , पिएंगे ?

सोजल के शब्द ऐसे थे जैसे शांत जंगल में बरसते बादलों को किसी ने अचानक रुकने को कह दिया था !

हाँ सोजल ले आओ : अनिरुद्ध ने अपनी आँखों से टपकने को आतुर आंसुओं को टिस्शु पेपर से पोंछते हुए कहा !

कहाँ रहोगी तुम ?

वसीम अंकल के घर ही !

ओ के !

अगली सुबह !

गुड मॉर्निंग ऐनी ! अनुपमा अनिरुद्ध के बालों में अंगुलियां फेरती हुई बोली !

वाह ! गुड मॉर्निंग अनु लो ये तुम्हारे लिए !

कैडबरी सेलिब्रेशन का गिफ्ट पैक अनुपमा के हाथों में रखते हुए बोला !

          दिन भर एक दूसरे की बातें करते दोनों बहुत करीब थे ! जैसे नये रिश्ते बनने को थे की एक सुबह अनुपमा ने कहा !मुझे देखने कुछ लोग आने वाले हैं अगले संडे ! मुझे जाना होगा !

ओहह : अनिरुद्ध शांत सा बोला !

अनुपमा कुछ और सुनना चाहती थी किन्तु अनिरुद्ध से वो नहीं मिला तो वो संडे को अपने घर चली गयी !

संडे के बाद अनुपमा और अनिरुद्ध फिर से साथ थे !

क्या हुआ ? अनिरुद्ध ने पुछा !

अनुपमा : हाँ देख गए वो मुझे !

अनिरुद्ध : तुम्हारा क्या मन है ?

अब मुझे कुछ मन का करने का मन नहीं करता ! जब किया था तब हुआ नहीं ! अनुपमा बोली !

अनिरुद्ध : तो तुम वहां शादी लिए तैयार हो ?

अनुपमा : तुम  शादी करोगे ?

अनिरुद्ध : ये जवाब नहीं है !

अनुपमा : तो उत्तर समझ लो !

अनिरुद्ध : मतलब ?

अनुपमा : अब और मतलब क्या समझाऊँ ऐनी ?

अनिरुद्ध : ओह्ह !

एक हफ्ता बीत गया ! सब बातें हुई सिर्फ उस सब्जेक्ट पर ही दोनों खामोश  जाते थे  !

एक सुबह अनुपमा बोली : लड़के वालों ने मेरा ब्लड माँगा है !

अनिरुद्ध : वो क्यों ?

मेरा और उसका ब्लड टेस्ट होगा ! अनु बोली !

अनिरुद्ध : ठीक है फिर दे आओ !

तुम चलो मुझे लेबोरेटरी में ले कर यहीं पास में देना है ! अनुपमा ने सवाल के लहजे में आग्रह किया !

अनिरुद्ध अनुपमा को लेबोरेटरी ले गया और फिर घर छोड़ा !

अगले दिन से अनुपमा फिर कभी ऑफिस नहीं आयी !

कुछ साल बाद अनिरुद्ध के घर के बगल के घर पर लैंड लाइन पर फ़ोन आया !

अनुपमा की छोटी बहन रिया बात रही थी !

अनिरुद्ध : हेलो !

रिया : हेलो ! आप अनिरुद्ध बोल रहे हैं ?

अनिरुद्ध : जी , बोलिए रिया !

रिया : आपकी मम्मी की तबियत कैसी है ? दीदी ने जर्मनी जाने से पहले मुझ से कहा था पता करने को !

अनिरुद्ध : माँ तो नहीं रहीं !

रिया : ओह्ह ! ठीक है मैं दीदी को बता दूंगी !

अनिरुद्ध : अनुपमा कहाँ हैं ?

रिया : जी , शादी के बाद वो जर्मनी चली गयी !

अनिरुद्ध : ठीक है !

रिया : चलिए अनिरुद्ध जी रखती हूँ , फिर बात होगी आप अपना ख्याल रखियेगा !

अनिरुद्ध : जी , अनु को कहियेगा मुझे  याद रेहगीं , हमेशा !

और दोनों तरफ से फ़ोन रख दिया गया !

शाम होने को थी ! स्कूल बंद  चूका था !

सर , अब चलें !

बारिश होने को है ! बीनू ने विनम्रता से स्कूल की दीवार के सहारे खड़े अनिरुद्ध से आग्रह किया !

        बारिश होने को नहीं बीनू भाई , बारिश हो चुकी है कहता हुआ अनिरुद्ध अपनी भीगी आँखों को पोछता हुआ बीनू के कन्धों हाथ रख कर पलाश के पेड़ के नीचे खड़ी कार की तरफ चल दिया !

         कार अपनी रफ़्तार से घर की ओर चल दी थी ! घर कहाँ मकान था वो , जिनको घर बनाने वाली दो अनुपमा आते - आते कही और मुड़ गयी थीं ! कार के शीशे पर बारिश की बूंदों से बनती आड़ी टेढी रेखाओं के बीच कुछ तलाशता अनिरुद्ध बच्चों के शब्द सुनता जाता था जो उसने अपने iPhone  में रिकॉर्ड कर लिए थे  …… पोशम्पा पा …… भाई   पोशम्पा पा ……

एक कहानी : पोशम्पा पा ……



                                       ~~~~~~~~~~~~~~~  समाप्त ~~~~~~~~~~~~~~~~~