"भोर की हल्की ठंडक भरी गलियों में घुमते हुए चौकीदार की लम्बी सीटी ने "शील " को नींद से जगा दिया . बेतरतीब हुई सफ़ेद चादर को अपने से अलग कर के चपोतते हुए चप्पल पेहेन कर नित्य कर्म से निबट कर फिर से अपने फोल्डिंग पलंग पर आ बैठा ! फोल्डिंग पलंग ने जैसे उसका पुनः आने पर स्वागत किया ....कुछ आवाज़ दे कर जो सुबहा के शांत वातावरण में कर्ण प्रिय तो नहीं किन्तु अपनत्व लिए हुए थी ...किशोर होने तक का साथी जो है वो फोल्डिंग पलंग ! "
अभी कुछ सोच ही रहा था की एक लम्बी सीटी फिर से सुनाई दी ! शील ने झरोखे से बहार झाँक कर देखा रमईलाल ( चौकीदार ) बांस का डंडा सड़क पर पिटता हुआ जा रहा था ! शील की निगाह अपनी टेबल घडी की तरफ गयी ...सोचा कही घडी बंद तो नहीं पड़ गयी , सुबहा का एलार्म नहीं बजा ! सबेरे के सवा तीन बज रहे थे ! आज तीन बजे ही नींद खुल गयी ? शील ने सोचा ! आजकल बारहवीं के इम्तेहान जो चल रहे हैं उसके रात में देर से सोता है पढ़ते पढ़ते और सबेरे ५ बजे का एलार्म लगा लेता है ! लेकिन आज ऐसा क्यों हुआ ? दरअसल इन दिनों वो ठीक से सो ही नहीं पा रहा था रातों में ! मन में कुछ न कुछ उधेड़बुन चलती रहती है उसके !
चाय पीने की इक्छा हुई किन्तु कदम ने साथ ना दिया हिम्मत नहीं जुटा सका रसोई में जा कर चाय बना कर पी लेने की ! चार साल होने के बाद भी तो उस घर में आगंतुक और अपरिचित ही तो था वो ! कोई अधिकार नहीं ! अधिकार उनके होते हैं जो जीवित हों ! ना ,सिर्फ शारीरिक जीवन अधिकार नहीं ले सकता ! होश संभालने से ले कर किशोर होने तक जिसने केवल खोया हो ,के पास अधिकार हैं के सोचने का भी अधिकार नहीं रह जाता !
आज " रसायन विज्ञान " का पेपर था ! कल से जो वो पढ़ रहा था आज सब मूर्तरूप में सही और सटीक होते दिखाई दे रहे थे ! जीवन में " शील " के जीवन में ना जाने कितने ही रासायनिक परिवर्तन हुए - माता पिता का बचपन में ही नहीं रहना ! अपनी दो छोटी बहनों से दूर रहना ! बचपन में खिलोनो की जगह अपने लिए परिवार में , रिश्तेदारों में , दोस्तों में , समाज में जगह तलाशने की कोशिश ! टूटी हुई पेंसिल और घिसी हुई रबर को और कुछ दिन चला लेने के प्रयास में आशा की कोई रिश्तेदार आये और कुछ नया दे कर जाये ! किसी ज़रुरत के लिए घंटो , दिनों और कई बार तो महीनो सोचना की कैसे और किस से कहा जाये की आंशिक ही सही पर पूरी तो हो ! बचपन बीत गया ! वापस नहीं आता ! रासायनिक परिवर्तन है !
चीज़ें कितनी जुडी हुई हैं ना एक दुसरे से ! अब देखिये ना माँ पिता ने कितना सोच कर रखा होगा उसका घर का पुकार का नाम " शील " ....सब सहना , शालीनता से ! वो ये सब सोच ही रहा था की सामने के पार्क में कुछ लोग चहलकदमी करते हुए हलके धुंधले से दिखाई देने लगे ! उसकी टेबल घडी का अलार्म भी बज उठा !
सुबह के पांच बज चले थे ! दो घंटो तक वो अब तक के जीवन की घटित घटनाओं को भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनों के द्रष्टिकोण से देख रहा था !
उसके दोस्त विकास ने आवाज लगायी : - शील , आज टहलने नहीं चलोगे ?
शील : नहीं , आज रसायन विज्ञान का पेपर है !
विकास : अरे , वो तो मेरा भी है , २ बजे से ! अभी क्या परेशानी है ?
शील : सोच रहा था कुछ पढ़ लूं !
विकास : चल , अब आ जा ! पुरे साल की पढाई एक दो घंटे में नहीं दोहराई जाती !
शील : ज़रा मुस्कुराया , ठीक है आता हूँ रुक !
विकास : हाँ तो मैं जा रहा हूँ बिना तुझे लिए क्या ?
" शील " ने जल्दी जल्दी अपनी हाफ पेंट को बदला और कल ही मोची से सिलवाई हुई स्लीपर को पहना और ड्राइंग रूम से होता हुआ बाहर के दरवाज़े की तरफ लपका !
बड़े भैया ने आवाज़ लगाई : "शील" बाहर पड़ा अखबार पकड़ना !
जी भैया - "शील" बोला और दरवाज़ा खोल कर अखबार ला कर भाई को दिया !
अखबार पकड़ते हुए भैया बोले : कहाँ जा रहे हो ?
"शील" : भैया , विकास के साथ मोर्निग वाक् पर !
भैया : आज तो तुम्हारा कोई पेपर है ना ?
"शील" : जी भैया , केमिस्ट्री का !
भैया : तो ?
"शील" : भैया , सब पढ़ लिया है !
भैया : तुम कहीं नहीं जाओगे , फ्रेश हो कर बैठ कर पढो , विकास को मैं मना कर देता हूँ !!
"शील" : बस २० मिनट में आ जाऊंगा !
भैया : ना बोल ना !
"विकास" आज "शील' नहीं आयगा ...तुम जाओ ...संडे को आयगा ! भैया ने कुर्सी पर से ही तेज़ आवाज़ में बोल दिया !!
"शील" अपने फोल्डिंग पलंग पर जा बैठा ! फोल्डिंग पलंग फिर से एक आवाज़ कर के उसका स्वागत किया , किन्तु इस बार अच्छा नहीं लगा उसे ! बीस मिनट की तो बात थी ! जाने देते तो क्या होता ! नहीं पढूंगा ! कल शाम को एक सवाल पुछा था तो टाल गए थे और ५ किलोमीटर दूर अपने दोस्त के घर जा कर बेडमिन्टन चले गए थे ! फ़ोन को हाथ नहीं लगाने देते ! टूशन के बारे में कभी नहीं सोचा , जो पढ़ा है मैंने खुद पढ़ा और आज जब मैं खुश हूँ तो जाने नहीं देते ! शील ये सब सोच ही रहा था की छोटे भैया की आवाज़ आई : शील ज़रा देखना बहार " डाक्टर झिंगन " की कार कड़ी है क्या ?
"शील" का ध्यान टूटा ! खिड़की से बहार जहां कर देखा और वापस आ कर बताया ,हाँ - खड़ी है !
ठीक है ये पेकेट ले और उनके ड्राईवर को दे आ - छोटे भैया ने आदेश दिया !
"शील" ने वहीँ बैठे बड़े भैया को देखा और चल दिया !
बड़े भैया ने भी "शील" को देखा और कहा , "शील" वापस आते हुए घोष बाबु के पार्क से दो गेंदे के फूल लेते आना ... अमृता ( भैया की बेटी ) को पसंद है !!
इन सब में आधा घंटा बेकार हो गया ! मन भरा जा रहा था ! किन्तु करता भी क्या ! किस से कहता ! क्यों कहता ! गला रूंध गया , मन मारते हुए आज तक जिया है ...आगे भी निर्भरता के रहने तक ये ही नियति है !!
सफ़ेद रंग की कमीज़ जो कुछ पीलापन लिए हुए थी , खाकी रंग की पेंट ! एक दफ्ती ! जोमेट्री बाक्स , स्याही और निब वाले दो पेन ले कर स्कूल के बहार सब पहुँच गए ! वैसे बारहवीं के बच्चों के लिए ये सब चीज़े अब कुछ मायने नहीं रखती लेकिन शील को ये सब ले कर ही जाना था क्यों की उसके पास और कुछ था ही नहीं ले जाने को जिसको इनकी तुलना में कुछ अलग हो !!
रसायन विज्ञान के पर्चा हो गया ! " शील " के जीवन में अभी ना जाने कितने पर्चे होने बाकि हैं ! परिवर्तन बाकि हैं ! मन छोटा हो जाता है जब वीणा आंटी और शशि आंटी आपस में बात करती हुई अपने बी ऐ में पढ़ रहे बच्चों के बारे में बोलती है .... क्या करू दूध तो राहुल पीता ही नहीं ...सबेरे सबेरे उसके पीछे पीछे दौड़ना पड़ता है ! क्या किस्मत है ! एक कप चाय के लिए भी रसोई के आस-पास के चक्कर लगाने पड़ते हैं ... झूठ मुठ का बहाना ढूँढना पड़ता है रसोई में आने का की किसी की निगाह पड़े और चाय के लिए पूछे !!
कल रात " शील " पूरी रात नहीं सोया , कल कोई एग्जाम नहीं था फिर भी .....सोचते हुए क्या ज़िन्दगी कभी ढर्रे पर आएगी और लोगो की तरह , और उसके उम्र के लड़कों की तरह ! जबतक आएगी तब तक ये सब वापस नहीं आने वाले परिवर्तन में परिवर्तिती हो चूका होगा !! बचपन लौटता नहीं है किन्तु ...बचपन ही सबसे अधिक याद रहता है जीवन के किसी भी समय की तुलना मैं ...! हम ,यदि किसी से यदि सम्बद्ध है उसके बचपन में तो उसे "जीवंत" कर दीजिये उसकी पूरी उम्र के लिए !!
::~~ :: मनीष सिंह ::~ ~ ::