" स्कूल में छुट्टी कि घंटी बजी तो बच्चों कि आवाज़ों का सुन्दर संगीत कानों में घुलने लगा ! "
सीमा पिछले कई सालों से रोज़ सुबह घर के रोज़मर्रा के काम निबटा कर सामने चारपाई पर बैठी दोपहर होने तक सड़क पर आने जाने वालो को तकती रहती थी ! सर्दी में धुप को साथी बना लेती तो गर्मियों में नीम के पेड़ छाँह कि बंधू हो जाती ! बारिश में पिछले साल कि तिरपाल सहारा होती जिसको बाउंडरी कि दीवार पर टिका कर बैठी रहती !
सब्जी वाले , फल वाले , दूध वाले , प्रेस वाला , सिलेंडर वाला , डाकिया , कोरियर वाला और जो भी मोहल्ले में चक्कर लगता वो सीमा से राम राम कर के निकलता था ! कुछ देर उसके साथ बैठ कर चाय का आनंद भी ले लेते है कुछ लोग ! अभी पिछले बसंत कि तो बात है जब विभोर किसी काम से आया था घर तो माँ के लिए बड़ा सा फ्लास्क ले आया था , बस दिन भर कि बार बार चाय बनाने कि परेशानी से छुट्टी हो गयी थी सीमा कि !
माँ , माँ !! दरवाजे पर किसी ने जोर से आवाज़ें लगायी !
आज सीमा घर में ही थी , बाहर नहीं बैठी थी !
आज सीमा घर में ही थी , बाहर नहीं बैठी थी !
सीमा : हाँ कौन है ?
मैं रोहित हूँ नानी !
१५ , १६ साल के एक लड़के ने बाहर से ज़वाब दिया !
१५ , १६ साल के एक लड़के ने बाहर से ज़वाब दिया !
सीमा : रुक आती हूँ कहते हुए दरवाज़ा खोल दिया !
नानी आज आप बाहर नहीं बैठी हैं चारपाई पर ?
रोहित ने अपने साथ एक और लड़के का हाथ पकड़ते हुए सीमा से पुछा !
सीमा : मेरी कमर में दर्द है आज इस लिए चारपाई नहीं बिछा सकी !
रोहित : हम बिछा देते हैं !
सीमा ने अचानक हुए इस प्यार भरे सम्बोधन को डबडबाई आखों से स्वीकार करते हुते हामी में सर हिला दिया !
सुनेहरी धूप में उज्जवल भविष्य ढलकते बुढ़ापे को सहारा दे रहा था , अदभुद मंजर !
रोहित : आइये नानी बैठिये !
सीमा ने दूसरे लड़के के कंधे का सहारा लेते हुए चारपाई पर खुद को टिका दिया और रोहित से कहा !
अन्दर जाओ और चाय का फ्लास्क ले आओ , भरा है और गर्म भी सम्भाल कर लाना ! दो कप भी लाना !
फिर दूसरे लड़के से बोली - भीतर पलंग पर मेरी शाल राखी है लेते आओ , ठंडक है बाहर !
रोहित : नानी कप में निकाल दूं चाय आपके लिए ?
सीमा : हाँ मुझे इस गिलास में दो और तुम दोनों कप में ले लो !
विराट : नानी लीजिये ! सीमा कि ओर शाल और तकिया बढ़ाते हुए बोला !
सीमा : आ जाओ बैठो मेरे पास और बताओ कि तुम कौन हो ? कहाँ रहते हो ? पहले तो कभी नहीं देखा इधर लेकिन तुम दोनों कि स्कूल ड्रेस तो पास वाले स्कूल कि सी हैं ?
रोहित अभी कुछ बोल पता कि स्कूल कि घंटी बज गयी !
अच्छा नानी अभी जाते हैं , कल आएँगे !
अच्छा नानी अभी जाते हैं , कल आएँगे !
कहते कहते दोनों हाथ हिलाते हुए जल्दी जल्दी स्कूल के गेट कि तरफ बढ़ गए !
सीमा उम्मीद कि रंग बिरंगी मोमबत्तियों को आकार लेता देख रही थी !
माँ कुछ सब्जी दे दूं आज , साग एकदम ताजा है !
सब्जी वाले ने एक गट्ठर में चने सरसों और मेथी रख दी !
फल वाले से आज सीमा ने कुछ सेब खरीदे , अंगूर लिए और अनार भी , सब के सब ताजे कल के लिए !
फल वाले से आज सीमा ने कुछ सेब खरीदे , अंगूर लिए और अनार भी , सब के सब ताजे कल के लिए !
दूधवाले से भी कुछ दूध ज़यादा लिया और कल कुछ पनीर लाने को कहा !
शाम को प्रेस वाले से बोल कर दो मफ़लर मंगवाए पास के ही नए खुले मॉल से चकट रंग के !
दिन बीत रहा था , आज भी डाकिया चिट्ठी नहीं लाया !
शाम को अपने घर लौटते हुए सीमा के पास बैठ कर भारी मन से चाय पीते हुए बोला : माँ क्या विभोर अब बिलकुल नहीं आता ?
सीमा अंदर तक सकपका गयी ! बेटे कि कमी और बेरुखी कि मार से ज़यादा चोट पहुचाने वाली थी ये बात कि समाज में न पता चले कि सबकुछ ठीक ठाक नहीं है , जैसा कि दीखता है ! वो ऐसे दुखी और परेशान होती थी जैसे विभोर ने उसको अकेला छोड़ कर अपराध उसने नहीं खुद सीमा ने किया हो !
सीमा : नहीं ऐसा नहीं है , अभी पिछले साल ही तो आया था ! तुम चो गरम चाय के आनंद ले रहे हो अगर मेरा बेटा ये फ्लास्क ना दे जाता तो ठंडी चाय ही पिलाती तुमको !
डाकिया एक एक शब्द सुन कर ऐसा एहसास कर रह था जैसे खौलते पानी कि भाप !
जैसे भीतर ही भीतर असंतुष्टि कि ज्वाला से सम्बन्ध धधक रहे हो और उनको जकड कर रखने कि कोशिश में भाव रोज़ रोज़ कर के भाप हो रहे थे !
अच्छा माँ अब चलता हूँ , कुछ लाना है बाजार से तो बोलिये कल लेता आउंगा !
सीमा : हाँ ये अच्छा याद दिलाया तुमने रुको दो चीज़े लानी हैं !
कुछ रूपए डाकिये के हाथों पर रखते हुई बोली : जो अच्छा सा पेन लगे दो ले लेना और साथ में दो अच्छी वाली चाकलेट भी लेकिन ये सब मुझे कल ११ बजे से पहले चाहिए सुबह !
डाकिया अपने रस्ते चल दिया ,हाँ कहता हुआ !
दिन भर इसके उसके आने जाने से अकेलापन पास नहीं फटकता लेकिन रात के सन्नाटे में गहराती जाती अकेलेपन कि चुभन खुद को सांस लेने से रोक लेने तक को मजबूर कर देती थी सीमा को हर रात , लेकिन आज ऐसा नहीं था , कल कि ख़ुशी में वो दोनों फिर जो आने वाले थे उसको मिलने !
अगली सुबह !
माँ आज खबर के लिए दूसरा अखबार है , वो जो आप पढ़ती हैं नहीं मिला मुझे - अखबार वाले ने आवाज लगायी सुबह सवेरे !
सीमा अंदर से ही बोली , ठीक है जो है वो ही दे दो !
आज जैसे घडी कि सुइयाँ सर्दी में काँपते बैलों जैसी हो गयी थी , आगे सरकना मानों पहाड़ चढ़ना हो गया हो !
चाय फ्लास्क में भरते हुए काम करने वाली ने अपनी चप्पल पहनते हुए पुछा : माँ चारपाई बहार बिछा दूं ?
सीमा : नहीं , वो आएँगे ना !
कामवाली : वो, कौन ?
सीमा मुस्कुराते हुए - रोहित और उसका दोस्त !
कामवाली ने भी हंसते हुए कहा अच्छा स्कूल के बच्चे होंगे ?
सीमा ने कहा हाँ , मुझे आशुतोष जैसे ही लगते हैं , आज वो भी इनकी ही तरह का हो गया होगा !
कामवाली ने जवाब में कहा पता नहीं माँ जब दीदी कार में बैठ रहीं थी १५ साल पहले तो मैंने ही उनकी गोद में दिया था आशुतोष को अब कहाँ पलट कर देखा उन लोगो ने हमें ! मैं चलती हूँ नहीं तो फिर परेशान हो जाओगी आप पुराणी बात सुन कर !
सीमा घडी देखती जाती थी कि कब ११ बजें और स्कूल कि आधी छुट्टी हो और वो आयें !
नानी , नानी !
हाँ अंदर आ जाओ रोहित - सीमा ने अंदर से कहा !
नहीं आप बाहर आइये - रोहित बोला !
सीमा हाथो से चश्मे को सम्भालते हुए दरवाज़े कि चौखट पर गयी और देखा तीन बच्चे खड़े थे !
रोहित उसका दोस्त जो कल भी साथ था और एक और नया साथी !
सीमा : अरे भाई बाहर क्यों खड़े हो अन्दर तो आओ !
रोहित : नानी आप ने कुछ पहचाना ?
सीमा : हाँ तुम रोहित हो और ये तुम्हारे दोस्त जिसमे से कल भी आया था !
तभी नया वाला लड़का सीमा के पास आया और अमरलता सा लिपट गया सीमा से !
सीमा स्तब्ध् !!
उसको चिपकाये चिपकाये उसने रोहित और दूसरे लकड़े को अंदर आने का इशारा किया और पलंग पर बैठ गयी पूछते हुए : क्या हुआ बेटा ?
रोहित : नानी ये आशुतोष है !
सीमा जैसे बर्फ़ कि सी हो गयी थी , ये सुन कर !
एकदम ठंडी !
एकदम जड़ !
एकदम खुश्क कोई भाव नहीं चहरे पर !
पलकें खुली कि खुली !
हाथों कि अंगुलियाँ गोद में सर रखे आशुतोष के बालों में अटकी रेह गयी थीं ! अब कुछ नहीं बाकि रहा !
एकदम ठंडी !
एकदम जड़ !
एकदम खुश्क कोई भाव नहीं चहरे पर !
पलकें खुली कि खुली !
हाथों कि अंगुलियाँ गोद में सर रखे आशुतोष के बालों में अटकी रेह गयी थीं ! अब कुछ नहीं बाकि रहा !
नानी क्या सोच रही हैं ? रोहित ने सीमा के कन्धों पर हाथ रखते हुए पुछा !
सीमा ने अपना माथा रोहित कि छाती पर टिका दिया और हाथो से कस कर पकड़ लिया उसको कि फिर धूमिल न होने पाये रे रौशनी जो बरसों के बाद आज देखने को मिली हैं उमीदों कि मोमबत्तियों में !
आशुतोष ने गोद में सर रखे रखे ही आवाज लायी - मम्मी आप भी आ जाईये !
आशुतोष ने गोद में सर रखे रखे ही आवाज लायी - मम्मी आप भी आ जाईये !
चोखट पर आशुतोष कि माँ ( विभा ) ने परदे को हटा कर कदम रखा ! अब सीमा के गले से आवाज़ रोके से नहीं रुक रही थी ! तेज़ आवाज़ में रो पड़ी दोनों !
लगता था जैसे कितने ही समदर, कितनी रुकी हुई नदियां बहाव का कारण तलाशते हुए सीमा के घर में आ मिले थे !
रोहित ने आशुतोष और सीमा से विदा लेने को बाय कहा !
आशुतोष ने हाथ पकड़ कर रोक लिया उसको !
सीमा ने सब कुछ रख दिया रोहित के सामने जैसे देवता को अर्पण कर रही हो !
विभा कहने लगी : माँ विभोर के विदेश जाने के बाद मुझे ट्रान्सफर मिल गया यहीं केंद्रीय विद्यालय में ! क्योकि मुझे प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ाना था आशुतोष को तो आपके घर के बगल वाले स्कूल में दाखिला दिलवाया लेकिन उसको कभी भी आपके बारे मे नहीं बताया !
परसों रोहित और उसके दोस्तों ने ज़िक्र किया था आपके बारे में और कल आपके पास आये भी थे फिर यहाँ नयी जगह पर दोस्तों के नाम पर ये दोनों ही इसके दोस्त बने और मुझ तक बात आयी और मुझे भी इतने दिन से आप सब दे दूरी ठीक नहीं लग रही थी ! इस लिए मैंने इन दोनों और आशुतोष को आपके बारे में बताया और साथ आ गए आज आपके पास !
सेब और अनार रखे हैं अंदर जा ले आ , डाकिया से दो चाकलेट मंगवाई थी वो भी लेती आना फ्रिज से निकाल कर ! सीमा ने रूधे गले से कहा !
दो पेन और मफ़लर रखे हैं रोहित और उसके दोस्त के लिए !
दादी आज हम जन्मदिन मनाएंगे शाम को सब का - आशुतोष बोला !
सीमा ने आशुतोष कि टी शर्ट के कलर को ठीक करते हुए पुछा - मोमबत्तियाँ कितनी लगाएगा ?
ढेर सारी दादी हर बिछड़े साल कि !
हम पहली बार जो मिले हैं !
हम पहली बार जो मिले हैं !
तभी डाकिया ने आवाज़ लगायी ! - माँ
हाँ आऒ , अंदर ही आ जाओ !
माँ , आपकी आज भी कोई चिट्ठी नहीं आयी है !
भाई अब कोई इंतज़ार नहीं चिट्ठियों का , पर तुम शाम को आ जाना हम मोमबत्तियॉँ जलाएंगे !
अकेलापन कोने कोने अँधेरा ढूँढता जाता था और मोमबत्तियों कि रौशनी , अपनापन !!