हम गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझोता नहीं करते ! सही है भाई जब हम पैसे खरे खरे देते हैं तो मिलने वाली वास्तु क्यों स्तर से नीचे हो या उसके समतुल्य क्यों न हो जो हमें मिलना चाहिए जिसके एवज में हमने धन दिया है !!
ये तो हुई एक सामान्य सी बात , लेकिन ये मेरा ब्लॉग सामान्य और विशेष के बीच की मध्यमा है ....तो आज बात करते हैं सामान्य सी चाहत और परिवर्तन की .... !! मेरे और आपके , उसके , इसके हम सब के तन में धमनियां हैं और उनमे रुधिर बहता है , जिसमे नाजाने कितने प्रकार के गुण हैं , जो इश्वर ने सब को एक सामान दिए हैं ....किन्तु कालांतर में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों में इधर उधर हो जाते हैं ...बात उस इधर उधर की नहीं है जो प्राकर्तिक हों ...हम बात करेंगे उन परिवर्तनों की जो प्राकर्तिक नहीं मानव के विशेष परिवर्तन पर हों ...जो अपने आस पास घटने वाली घटनाओ पर आधारित हों ...
आइये बतियाते हैं :-
जब सड़क पर चलते हुए किसी दुर्घटना पर तड़पते हुए किसी इंसान को देख भी अपने गंतव्य पर पहुचने की जल्दी में जब हम ये देखने की ज़हमत नहीं उठाते की प्राण हैं भी की नहीं ....तब परिवर्तन महसूस होता है ....रुधिर में !
जब किसी पिज्जा के चटकारे लेते हुए अचानक कोई आधे कपड़ों में कोई बच्चा दिखाई दे तो कोशिश करते हैं की जीतनी जल्दी हो सके तो वो अपने पास से किसी और के पास चला जाए ....खाने के मजा किरकिरा हो रहा है ....तब परिवर्तन महसुस होता है !
जब रेलगाड़ी में अचानक से आपके जूतों को हटा कर छोटे से झाडू से आपकी और सब की सीट के नीचे का कचरा साफ़ करता हुआ कोई अपाहिज दिखाई देता है तो उसकी और इशारा कर के बड़ी सहजता से कहते हैं " अरे, जरा इधर से भी ले लेना ...." और फिर जब वो आपसे कुछ उम्मीद करता है तो कहते है , उन भाई साहब ने दिया ना ...एक रुपया ....तब रुधिर में परिवर्तन महसूस होता है !
जब किसी पहचान वाले की अंतिम कियाक्र्म में जब वहां जाते हैं जहाँ सब को एक दिन जाना है तो मन सब कुछ होते हुए भी ये सोचता है : " अब जब ये हो ही गया तो देर किस बात की हैं , जल्दी क्यों नहीं करते " , घर से फोन आते हैं , आप हाथ मत लगाना , और रस्ते में कुछ खाना मत .....तब परिवर्तन महसूस होता है रुधिर में ....!! कुछ लोगों ने तो शमशान देखि भी नहीं होगी ...परिवार में छोटे हैं तो ये सब बड़े करते हैं मेरे ....कह कर कभी नहीं जाते !!
जब बस अड्डे पर किसी भुट्टा बेचने वाले को एक भुट्टा भूनने के लिए कह कर हम किनारे खड़े खड़े हो जाते हैं ....ठंडी हवा से बचने के लिए ....और जब भुट्टा भुन जाये तो देख कर कहते हैं ...यार इसमें तो दाने ठीक नहीं हैं ....कोई और भून दो ....उसके ना नुकुर करने पर आप किसी और के पास चल देते हैं ...बिना ये सोचे की उसकी उस पूंजी का क्या होगा जो अपने नकार दी ....तब परिवर्तन महसुसू होता है रुधिर में !
आस पड़ोस में किसी के घर में घटी किसी घटना पर घर में बात करते हुए सब सीमाए लांघ देते हैं ....ये सोचे बिना की शायद आपके बारे में भी कोई इस से भी बुरा सोचता होगा !!....तब रुधिर में परिवर्तन महसूस होता है !!
कल तक जिनको साथ आप रहने देने में सुरक्षित महसूस करते हैं एक रोज़ आप खुद को उनसे दूर करने की कोशिश करते हैं ये समझ कर की आपका स्तर थोडा अलग हो गया है किन्तु ये भूल जाते हैं की वहां तन जाने का रास्ता किस ने दिखाया ..... परिवर्तन ...रुधिर में महसूस होता है !!
में अपने उन दिनों को याद करता हूँ जब हम अपने कालेज की प्रयोगशाला में एक प्रयोग करते थे .... " आसूत जल " बनाने का .... एक बड़े से कांच के सांचे में सामान्य सा जल लेते थे और उसको खूब गरम करते थे ....तपिश देते थे ....और विभिन्न नालियों से उजरते हुए बाद में भाप बनते हुए जल को हल्का ठंडा करते हुए एक बीकर में इकठा करते थे .....इसे " आसूत जल " कहते थे .... जी हाँ इस के बनाने से पूर्व का पानी मानव के पीने योग्य होता है लेकिन इतनी तपिश के बाद बना जल मानव के पिने योग्य नहीं रह जाता उसमे किसी भी तरह का स्वाद नहीं रह जाता किन्तु जल ज़रूर रहता है .... बस आजकल हमारा सब का रुधिर भी विभिन्न प्रकार की तपिश सहता हुआ रुधिर तो रहता है किन्तु ...सब कुछ करने लायक नहीं .... ये बात असामान्य नहीं हो सकती हाँ इस को समझने के लिए हमें सामान्य होना होगा और बहार आना होगा अपने असामान्य से ओढे आवरण से ...अन्यथा अनजान खोखलापन लिए ये तपिश हम सब की रुधिर को और आसूत से और परिष्कृत आसूत की ओर ले जायगी !
मिलते रहीए , रुधिर में अपनापन तथा मिनिरल बने रहेंगे , आसूत जल नहीं बनेगा ये रुधिर !