शिलाँग की गलियों की एक बेहद सर्द सुबह थी वो जिसमे शशांक ने अपने बचपन की यादों की गरमाहट महसूस कर ली थी , जोज़फ़ की चाय की चुस्कियां लेते हुए !!
अगर शताब्दी निकल गयी तो फिर समझ लेना की गोहाटी की ये दूरी ५ दिन की हो जायगी - तमांग ने लगभग चिल्लाते हुए शशांक और अपने सभी बेच मेट्स से कहा ! तमांग को ही लीडर ऑफ़ दा बेच बना कर भेज गया था ! यहीं शिलोंग का ही तो रहने वाला है वो ! दिल्ली में रह कर अपनी सी ऐ की पढाई कर रहा है अपने बाकि साथियों के साथ ! तीन सालों के बाद एक बड़ी चाय की कंपनी का ऑडिट करने का जिम्मा तमांग एंड दोस्तों को दिया था उनकी ऑडिट कम्पनी ने ! उसका मुख्यालय शिलांग में ही है ! बिलकुल तमांग के घर के नज़दीक !!
बाकि के लोगों के साथ तमांग शिलांग पंहुचा ! रात के ८ बज रहे थे ! पहाड़ी इलाकों में रात के आठ बजना मतलब लगभग आधी रात का हो जाना होता है , क्योकि सूरज की पहली किरण भी वहां सुबह के ४ : ३० बजे पद ही जाती हैं !
चोराहे के पास में एक तीन सितारा ( ३ स्टार ) होटल बुक था ! सब ने कडकती ठण्ड में स्ट्रांग काफी का आर्डर किया ऑमलेट के साथ ! तमांग और शशांक अच्छे दोस्त हो चले थे इन ३ सालो में इस लिए तमांग शशांक को अपने साथ अपने घर ले आया ! होटल में नहीं रुकने दिया उसको दुसरे साथियों के साथ ! तमांग के घर में उसकी माँ , पिता जी , एक छोटी बहन और एक छोटा भाई था ! एक और था " रूद्र " ! पहाड़ी नहीं था वो लेकिन उनके साथ ही रहता था ! १२ साल का रहा होगा रूद्र ! रात का सुकून भरा वातावरण ! माँ पिता का साथ ! घर का खाना और फिर बचपन की फोटो के साथ चुस्कियां लेती आधी रात कब निकल गयी , किसी को अंदाज़ा ही नहीं लगा !!
आंगन से गाय की रंभाने की आवाज़ से सबकी आँखे खुली ! सब तरफ सूरज अपनी बाहें पसार चुका था ! हर तरफ उजाला हो चूका था ! शशांक के लिए ये सब अजूबा था ...सबेरे के ४ बजे इतना उजाला ...कहाँ देखने को मिलता है अपनी दिल्ली में !! ५ बजते बजते सब ने अपने अपने को फ्री कर लिया और घर के आंगन में बने ज़मीन से सिर्फ डेढ़ फुट ऊँचे फिक्स गोल टेबल के चारो तरफ बैठ गए ...सबके लिए एक एक गरम शाल रखी थी! सब एक ही तरीके से बैठ गए ...घुटने पीछे की तरफ को मोड़ते हुए !! शशांक के ऐसा एक जापानी फिल्म में देख था ! तमांग उसके बगल में ही था ! सबको खुले से प्याले में चाय परोसी गयी ! हरे से रंग की थी ! सफ़ेद प्यालों में वो हरा रंग अनोखा लग रहा था उस पर से हलकी हलकी भाप ने सजावट का काम किया था ! पड़ोस की बेकरी से लोकल मेड केक और कुकीज़ भी थे साथ में ! यहाँ चाय कपो में नहीं दी जाती ! बंधन नहीं है , खुले प्यालों में पीजिये , चाहे जीतनी !
सब सलीके से चाय का मजा ले रहे थे की अचानक तमांग की बेहेन ने सन्नाटे हो तोडा !
शीनू ( तमांग की बहिन का नाम ) : पा , मेरी सायकल कब आईगी ? अब तो दादा ( बड़ा भाई तमांग ) भी आ गए ?
मिस्टर वू ( तमांग के पिता ) : तमांग , आज तुम्हे क्या ऑफिस जाना है ?
तमांग : हाँ , क्यों ?
मिस्टर वू : नहीं सोच रहा था की आज शीनू की सायकल ले आते हैं , घाटी की बड़ी दूकान से !
तमांग : रूद्र चला जाएगा आपके साथ !
मिस्टर वू : तमांग अभी वो छोटा है !
तमांग : छोटा ? बारह साल का हो गया है इस सितम्बर में !
मिस्टर वू : फिर भी करीब पांच किलोमीटर की दूरी है नीचे और वो भी घुमावदार , कैसे चला सकेगा इतना सायकल ?
तमांग : सब चला लेते हैं पा, आप ले कर तो जाइये ?
मिस्टर वू : नहीं ! तुम अपने काम पर जाओ मैं कुछ और इंतज़ाम करता हूँ ! रुद्र से इतना सायकल चलवाना ठीक नहीं ...अभी छोटा है वो ! तमांग की माँ ने भी मिस्टर वू की हाँ में हाँ मिलाई !
रूद्र : मैं चला लूँगा !
तमांग : तू चुपकर !
मिस्टर वू : तमांग , ऐसे नहीं !
तमांग ने लगभग घूरते हुए रुद्र को देखा और शशांक के कंधे पर हाथ रखते हुए पुछा ? भाई चाय पी ली हो तो चलो मोर्निंग वाक पर चलते हैं !!
शशांक : हाँ बस आखिरी घूँट है , उतार लूं गले के नीचे !
शशांक की ये बात पता नहीं कैसी लगी सब को और सब ठाकाहे मार का हंसने लगे ! माहौल जो तमांग , रूद्र और मिस्टर वू की बातचीत के कारण तनाव भरा हो गया था ....अब हल्का हो चला था !
शशांक ने उठते हुए शीनू के कान में खुस्फुसते हुए कहा ...तेरी सायकल हम आज ही ले कर आयेंगे !
शीनू मुस्कुराई ....बहुत अपनत्व से नहीं छिचले विश्वास के साथ ...पहली बार जो मिली थी शशांक से !
भाई तू रूद्र को ही क्यों भेजना चाहता है वहां : शशांक ने तमांग से पहाड़ी की सड़क पर टलते हुए पुछा !
तमांग : तो क्या वो नहीं जा सकता ?
शशांक : देख नीचे कितनी घुमावदार सड़क है ! ऊपर से नीचे नहीं नीचे से ऊपर आना है ....सायकल से ...अभी छोटा है यार रुद्र ! थक जाएगा ! तुझे ज़रा भी नहीं लगता की वो इस काम के लिए अभी छोटा है ?
तमांग : हाँ ,है तो छोटा , पर मैं क्या करू ?
शशांक : अगर वो तेरा अपना छोटा भाई होता तो भी तू ये ही करता ?
तमांग सिर्फ शशांक की तरफ देखता रह गया !
शशांक और तमांग ने एक तिराहे पर जोजफ छोटी सी दुकान पर चाय पी फिर घर लौट गए !
ऑफिस गए , घर से ही कंपनी वालों ने गाड़ी से उन्हें ले लिया था ! रस्ते से दुसरे बेच मेट्स को भी लिया ! दिन भर ऑडिट किया ! दोपहर में एक बड़े से रेस्तरो में लंच किया ! फिर शाम को चाय और पांच बजे के करीब घर वापस आगये !
शशांक ने नोटिस किया की तमांग ने दोपहर जब सब लंच कर रहे थे तो तमांग ने एक अच्छी सी दूकान से एक बड़ी सी चोकलेट खरीदी थी , दो और छोटी छोटी भी ! घर में घुसते ही उसने शीनू और अपने छोटे भाई को बुलाया और दोनों तो छोटी छोटी चाकलेट दे दी !
रूद्र वहां नहीं था !
तमांग : माँ, रूद्र कहाँ है ?
माँ : पा के साथ नीचे घाटी तक गया है ?
तमांग से पहले शशांक ने पूछ लिया : क्यों ?
माँ : रूद्र की स्कूल की ड्रेस सिलने दी थी , वो ओर उसको जूते भी पहनाने थे तो उसके पा उसको साथ की ले गए हैं !
तमांग ने अपने पा को फ़ोन किया और कहा : पा , आप वहीँ रुकिए मैं और शशांक आ रहे हैं नीचे!
मिस्टर वू : ठीक है !
बाइक ले कर तमांग और शशांक नीचे पहुचे !
तमांग को देख कर रूद्र ने अपने को छुपाने की कोशिश करी दुकान के आड़ में , क्यों ....ये आप खुद सोचिये !!
रूद्र वहां कहाँ खड़ा है , इधर आ ! तमांग ने बुलाया बिना बाइक से उतरे हुए !
रूद्र नहीं आया , सहमा सा खड़ा रहा ! सोच रहा था पा ने मेरी ड्रेस और जूतों पर आज कुछ खर्च कर दिया है ....फिर तमांग भैया कुछ बोलेंगे , इस लिए नहीं आया !
तमांग ने बाइक खड़ी करी और रूद्र के पास गया और झुकते हुए उसके गाल पर चूम लिया फिर गले से लगा लिया ! शायद इस पल का ही इंतज़ार था रूद्र को .....रूद्र जोर जोर से रोने लगा और अपनी पूरी ताकत से तमांग से लिपट गया , जैसे अमरलता लिपट जाती है किसी शाख से पुरे समर्पण के साथ !! तमांग की पलकें भी भीग चुकी थी ! कितना फासला कर लिया था तमांग ने अपनों से ही आज पता लगा उसे....रूद्र रोये जा रहा था !
तमांग : रूद्र , ले ये चकलेट ले और बाइक पर बैंठ मैं अभी आता हूँ !
रूद्र ने तमांग को नहीं छोड़ा ! आज पिछले छे सालों की प्यास बुझा लेना चाहता था ! बड़े भाई का हाथ छोटे भाई के सर पर कैसा होता है को वो तरस गया था ....आज सब से अमीर था रूद्र दुनिया में ! भाई जो साथ था !
तमांग ने बड़ी वाली चाकलेट रूद्र को दी और खुद गोदी में ले जा कर बाइक पर उसको बैठा दिया ! उसकी आँखों से आंसू पोछे ! पा और शशांक ये सब देख रहे थे ! खाई देर से बनती है लेकिन उसको पाटना भी आसान है !
तीनो चारो बाज़ार गए - शीनू के लिए सायकल खरीदी ! छोटे भाई के लिए एक जोमेट्री बोक्स ख़रीदा ! रूद्र के लिए अच्छे से हैण्ड ग्लब्स ख़रीदे सफ़ेद रंग के ! पा अपनी बाइक पर आये थे ! शशांक ने अपनी बाइक पर रूद्र को लिया और पा के साथ घर की और चल दिए ! तमांग सायकल ले कर घर की और चल दिया ! शाम हो चली थी ! ठंडी हवाए ! कोहरे की हलकी चादर चढ़ने लगी थी! तमांग एक घंटे के बाद घर पहुच गया ! रूद्र घर के बाहर वाले दरवाज़े पर तमांग का इंतज़ार कर रहा था ! शीनू भी नहीं थी बाहर जब की सायकल उसकी ही थी ! सब अन्दर चाय पी रहे थे !
तमांग ने रूद्र को देखा रूद्र ने तमांग को ....
तमांग : चलाएगा ?
रूद्र : हाँ !!
तमांग : तो आजा फिर !
सामने वाली सड़क का एक चक्कर लगाया रूद्र ने , फिर दोनों घर के अंदर गए !
आज उसी सामने वाली सड़क पर जोजफ की चाय की दुकान पर पांच सालों के बाद शशांक चाय पीते हुए यादों के महल में चहलकदमी कर रहा था की उसके कंधे को हिलाते हुए किसी सुन्दर से लड़के ने कहा : नमस्ते !
शशांक के सामने एक सुन्दर सा लम्बी और भरी पूरी कद काठी वाला अठारह साल का युवक खड़ा था !
शशांक : नमस्ते , माफ़ करना भाई मैं आपको पहचान ना सका !
रूद्र हूँ भैया मैं !
शशांक : अरे तुम रूद्र ! आओ आओ , जोजफ भाई एक काफी देना !
रूद्र : काफी किस के लिए ?
शशांक : तुम्हारे लिए !
रूद्र : आपको कैसे पता की में काफी पिता हूँ ?
शशांक : बस पता है ! खैर क्या करते हो ? कहाँ हो ?
रूद्र : इस साल बी काम में है एड्मिसन हुआ है और यहीं हूँ ! सुबह सवेरे आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! और घर क्यों नहीं आये ? चलिए अभी चलिए !
शशांक : हाँ बस घर आता थोड़ी देर में !!
जोज़फ़ ने काफी का कप रूद्र की तरफ बढ़ा दिया !
रूद्र : भाई कितने हुए ?
शशांक : हा हा हा ....अरे इतने बड़े नहीं हुए हो ...अपना पर्स जेब में रखो !
शशांक की आवाज़ में आदेश था !
अब रूद्र शशंक के कन्धों से भी ऊँचा हो गया था ! दोनों घर की तरफ चल दिए !
रूद्र : आप यहाँ अचानक , कैसे ?
शशांक : अब मैं यहीं रहूँगा ! मेरी जॉब यहीं की बड़ी चाय की पत्ति वाली कंपनी में लगी है !
रूद्र : या बड़ी अच्छी बात है भैया !
शशांक धीरे धीर घर की तरफ बढ़ रहा था और सोच रहा था जब वो खुद रूद्र की उम्र का था तब एक पापा के एक दोस्त ने उसका कैसे फायदा लिया था ! अपने बेटे की सायकल खरीदने और उसको चला कर ले कर आने की लिए उसको ले कर गए थे जबकि उनके बेटे से शशांक दो साल छोटा ही था !!
यादें कहाँ से कहाँ ले जाती हैं आपको ! समय जैसे रुक गया सा रहता है यादों के सहारे ! शशांक अभी ये सोच ही रहा था की रूद्र के फ़ोन की घंटी बजी - तमांग का फोन था !
रूद्र : तू जहाँ भी है , जल्दी दे बस स्टाप पर जा वहां शशांक भैया आ रहे हैं ! वसे मैं लेट हो चूका हूँ तुझे फोन करने में ....जा जल्दी जा उनको ले कर घर आना फिर आगे के लिए शाम को बात करते हैं - दूसरी तरफ से तमांग ने रूद्र से एक सांस में सब कह दिया !
रूद्र : तमांग भैया , शशांक भैया आ गए हैं और वो में अपना सामान रख चुके हैं ! अब में उनको घर ही ले जा रहा हूँ , लीजिये उनसे बात कीजिये ! रूद्र ने फ़ोन शशांक को दे दिया !
शशांक : हाँ भाई , घर के पास ही हूँ , शाम को बात करते हैं, ओके बाय !
रूद्र और शशांक घर में घुसे !
शीनू और छोटे भाई दोनों ने शशांक के पैर छुए ! तमांग ने बताया था ऐसा करने को ! जब तमांग शशांक के घर गया था तो उसके छोटे भाई ने भी तमांग के पैर छुए थे ! शीनू को देख कर रूद्र ने भी शशांक के पैर छुए ! सब कितना पारिवारिक था !
समयक परिवर्तन बहुत ज़रूरी हैं और उनके लिए ज़रूरी है ग्रहण करने की , सबकुछ अपना लेने की काबिलियत !!
रूद्र , तमांग , शशांक और सायकल ...सब साथ ही हैं , संसार तो चलता रहता है !!

::: मनीष सिंह ::
सब सलीके से चाय का मजा ले रहे थे की अचानक तमांग की बेहेन ने सन्नाटे हो तोडा !
शीनू ( तमांग की बहिन का नाम ) : पा , मेरी सायकल कब आईगी ? अब तो दादा ( बड़ा भाई तमांग ) भी आ गए ?
मिस्टर वू ( तमांग के पिता ) : तमांग , आज तुम्हे क्या ऑफिस जाना है ?
तमांग : हाँ , क्यों ?
मिस्टर वू : नहीं सोच रहा था की आज शीनू की सायकल ले आते हैं , घाटी की बड़ी दूकान से !
तमांग : रूद्र चला जाएगा आपके साथ !
मिस्टर वू : तमांग अभी वो छोटा है !
तमांग : छोटा ? बारह साल का हो गया है इस सितम्बर में !
मिस्टर वू : फिर भी करीब पांच किलोमीटर की दूरी है नीचे और वो भी घुमावदार , कैसे चला सकेगा इतना सायकल ?
तमांग : सब चला लेते हैं पा, आप ले कर तो जाइये ?
मिस्टर वू : नहीं ! तुम अपने काम पर जाओ मैं कुछ और इंतज़ाम करता हूँ ! रुद्र से इतना सायकल चलवाना ठीक नहीं ...अभी छोटा है वो ! तमांग की माँ ने भी मिस्टर वू की हाँ में हाँ मिलाई !
रूद्र : मैं चला लूँगा !
तमांग : तू चुपकर !
मिस्टर वू : तमांग , ऐसे नहीं !
तमांग ने लगभग घूरते हुए रुद्र को देखा और शशांक के कंधे पर हाथ रखते हुए पुछा ? भाई चाय पी ली हो तो चलो मोर्निंग वाक पर चलते हैं !!
शशांक : हाँ बस आखिरी घूँट है , उतार लूं गले के नीचे !
शशांक की ये बात पता नहीं कैसी लगी सब को और सब ठाकाहे मार का हंसने लगे ! माहौल जो तमांग , रूद्र और मिस्टर वू की बातचीत के कारण तनाव भरा हो गया था ....अब हल्का हो चला था !
शशांक ने उठते हुए शीनू के कान में खुस्फुसते हुए कहा ...तेरी सायकल हम आज ही ले कर आयेंगे !
शीनू मुस्कुराई ....बहुत अपनत्व से नहीं छिचले विश्वास के साथ ...पहली बार जो मिली थी शशांक से !
भाई तू रूद्र को ही क्यों भेजना चाहता है वहां : शशांक ने तमांग से पहाड़ी की सड़क पर टलते हुए पुछा !
तमांग : तो क्या वो नहीं जा सकता ?
शशांक : देख नीचे कितनी घुमावदार सड़क है ! ऊपर से नीचे नहीं नीचे से ऊपर आना है ....सायकल से ...अभी छोटा है यार रुद्र ! थक जाएगा ! तुझे ज़रा भी नहीं लगता की वो इस काम के लिए अभी छोटा है ?
तमांग : हाँ ,है तो छोटा , पर मैं क्या करू ?
शशांक : अगर वो तेरा अपना छोटा भाई होता तो भी तू ये ही करता ?
तमांग सिर्फ शशांक की तरफ देखता रह गया !
शशांक और तमांग ने एक तिराहे पर जोजफ छोटी सी दुकान पर चाय पी फिर घर लौट गए !
ऑफिस गए , घर से ही कंपनी वालों ने गाड़ी से उन्हें ले लिया था ! रस्ते से दुसरे बेच मेट्स को भी लिया ! दिन भर ऑडिट किया ! दोपहर में एक बड़े से रेस्तरो में लंच किया ! फिर शाम को चाय और पांच बजे के करीब घर वापस आगये !
शशांक ने नोटिस किया की तमांग ने दोपहर जब सब लंच कर रहे थे तो तमांग ने एक अच्छी सी दूकान से एक बड़ी सी चोकलेट खरीदी थी , दो और छोटी छोटी भी ! घर में घुसते ही उसने शीनू और अपने छोटे भाई को बुलाया और दोनों तो छोटी छोटी चाकलेट दे दी !
रूद्र वहां नहीं था !
तमांग : माँ, रूद्र कहाँ है ?
माँ : पा के साथ नीचे घाटी तक गया है ?
तमांग से पहले शशांक ने पूछ लिया : क्यों ?
माँ : रूद्र की स्कूल की ड्रेस सिलने दी थी , वो ओर उसको जूते भी पहनाने थे तो उसके पा उसको साथ की ले गए हैं !
तमांग ने अपने पा को फ़ोन किया और कहा : पा , आप वहीँ रुकिए मैं और शशांक आ रहे हैं नीचे!
मिस्टर वू : ठीक है !
बाइक ले कर तमांग और शशांक नीचे पहुचे !
तमांग को देख कर रूद्र ने अपने को छुपाने की कोशिश करी दुकान के आड़ में , क्यों ....ये आप खुद सोचिये !!
रूद्र वहां कहाँ खड़ा है , इधर आ ! तमांग ने बुलाया बिना बाइक से उतरे हुए !
रूद्र नहीं आया , सहमा सा खड़ा रहा ! सोच रहा था पा ने मेरी ड्रेस और जूतों पर आज कुछ खर्च कर दिया है ....फिर तमांग भैया कुछ बोलेंगे , इस लिए नहीं आया !
तमांग ने बाइक खड़ी करी और रूद्र के पास गया और झुकते हुए उसके गाल पर चूम लिया फिर गले से लगा लिया ! शायद इस पल का ही इंतज़ार था रूद्र को .....रूद्र जोर जोर से रोने लगा और अपनी पूरी ताकत से तमांग से लिपट गया , जैसे अमरलता लिपट जाती है किसी शाख से पुरे समर्पण के साथ !! तमांग की पलकें भी भीग चुकी थी ! कितना फासला कर लिया था तमांग ने अपनों से ही आज पता लगा उसे....रूद्र रोये जा रहा था !
तमांग : रूद्र , ले ये चकलेट ले और बाइक पर बैंठ मैं अभी आता हूँ !
रूद्र ने तमांग को नहीं छोड़ा ! आज पिछले छे सालों की प्यास बुझा लेना चाहता था ! बड़े भाई का हाथ छोटे भाई के सर पर कैसा होता है को वो तरस गया था ....आज सब से अमीर था रूद्र दुनिया में ! भाई जो साथ था !
तमांग ने बड़ी वाली चाकलेट रूद्र को दी और खुद गोदी में ले जा कर बाइक पर उसको बैठा दिया ! उसकी आँखों से आंसू पोछे ! पा और शशांक ये सब देख रहे थे ! खाई देर से बनती है लेकिन उसको पाटना भी आसान है !
तीनो चारो बाज़ार गए - शीनू के लिए सायकल खरीदी ! छोटे भाई के लिए एक जोमेट्री बोक्स ख़रीदा ! रूद्र के लिए अच्छे से हैण्ड ग्लब्स ख़रीदे सफ़ेद रंग के ! पा अपनी बाइक पर आये थे ! शशांक ने अपनी बाइक पर रूद्र को लिया और पा के साथ घर की और चल दिए ! तमांग सायकल ले कर घर की और चल दिया ! शाम हो चली थी ! ठंडी हवाए ! कोहरे की हलकी चादर चढ़ने लगी थी! तमांग एक घंटे के बाद घर पहुच गया ! रूद्र घर के बाहर वाले दरवाज़े पर तमांग का इंतज़ार कर रहा था ! शीनू भी नहीं थी बाहर जब की सायकल उसकी ही थी ! सब अन्दर चाय पी रहे थे !
तमांग ने रूद्र को देखा रूद्र ने तमांग को ....
तमांग : चलाएगा ?
रूद्र : हाँ !!
तमांग : तो आजा फिर !
सामने वाली सड़क का एक चक्कर लगाया रूद्र ने , फिर दोनों घर के अंदर गए !
आज उसी सामने वाली सड़क पर जोजफ की चाय की दुकान पर पांच सालों के बाद शशांक चाय पीते हुए यादों के महल में चहलकदमी कर रहा था की उसके कंधे को हिलाते हुए किसी सुन्दर से लड़के ने कहा : नमस्ते !
शशांक के सामने एक सुन्दर सा लम्बी और भरी पूरी कद काठी वाला अठारह साल का युवक खड़ा था !
शशांक : नमस्ते , माफ़ करना भाई मैं आपको पहचान ना सका !
रूद्र हूँ भैया मैं !
शशांक : अरे तुम रूद्र ! आओ आओ , जोजफ भाई एक काफी देना !
रूद्र : काफी किस के लिए ?
शशांक : तुम्हारे लिए !
रूद्र : आपको कैसे पता की में काफी पिता हूँ ?
शशांक : बस पता है ! खैर क्या करते हो ? कहाँ हो ?
रूद्र : इस साल बी काम में है एड्मिसन हुआ है और यहीं हूँ ! सुबह सवेरे आप यहाँ क्या कर रहे हैं ! और घर क्यों नहीं आये ? चलिए अभी चलिए !
शशांक : हाँ बस घर आता थोड़ी देर में !!
जोज़फ़ ने काफी का कप रूद्र की तरफ बढ़ा दिया !
रूद्र : भाई कितने हुए ?
शशांक : हा हा हा ....अरे इतने बड़े नहीं हुए हो ...अपना पर्स जेब में रखो !
शशांक की आवाज़ में आदेश था !
अब रूद्र शशंक के कन्धों से भी ऊँचा हो गया था ! दोनों घर की तरफ चल दिए !
रूद्र : आप यहाँ अचानक , कैसे ?
शशांक : अब मैं यहीं रहूँगा ! मेरी जॉब यहीं की बड़ी चाय की पत्ति वाली कंपनी में लगी है !
रूद्र : या बड़ी अच्छी बात है भैया !
शशांक धीरे धीर घर की तरफ बढ़ रहा था और सोच रहा था जब वो खुद रूद्र की उम्र का था तब एक पापा के एक दोस्त ने उसका कैसे फायदा लिया था ! अपने बेटे की सायकल खरीदने और उसको चला कर ले कर आने की लिए उसको ले कर गए थे जबकि उनके बेटे से शशांक दो साल छोटा ही था !!
यादें कहाँ से कहाँ ले जाती हैं आपको ! समय जैसे रुक गया सा रहता है यादों के सहारे ! शशांक अभी ये सोच ही रहा था की रूद्र के फ़ोन की घंटी बजी - तमांग का फोन था !
रूद्र : तू जहाँ भी है , जल्दी दे बस स्टाप पर जा वहां शशांक भैया आ रहे हैं ! वसे मैं लेट हो चूका हूँ तुझे फोन करने में ....जा जल्दी जा उनको ले कर घर आना फिर आगे के लिए शाम को बात करते हैं - दूसरी तरफ से तमांग ने रूद्र से एक सांस में सब कह दिया !
रूद्र : तमांग भैया , शशांक भैया आ गए हैं और वो में अपना सामान रख चुके हैं ! अब में उनको घर ही ले जा रहा हूँ , लीजिये उनसे बात कीजिये ! रूद्र ने फ़ोन शशांक को दे दिया !
शशांक : हाँ भाई , घर के पास ही हूँ , शाम को बात करते हैं, ओके बाय !
रूद्र और शशांक घर में घुसे !
शीनू और छोटे भाई दोनों ने शशांक के पैर छुए ! तमांग ने बताया था ऐसा करने को ! जब तमांग शशांक के घर गया था तो उसके छोटे भाई ने भी तमांग के पैर छुए थे ! शीनू को देख कर रूद्र ने भी शशांक के पैर छुए ! सब कितना पारिवारिक था !
समयक परिवर्तन बहुत ज़रूरी हैं और उनके लिए ज़रूरी है ग्रहण करने की , सबकुछ अपना लेने की काबिलियत !!
रूद्र , तमांग , शशांक और सायकल ...सब साथ ही हैं , संसार तो चलता रहता है !!

::: मनीष सिंह ::