Tuesday, November 5, 2013

एक कहानी : आनंद सफ़र में है , मंजिल में नहीं !!

             रोज़ कि तरह सड़क के उस तरफ सीधे पल्ले कि साडी ओढ़े अम्मा जी मिटटी के चूल्हे को साफ़ कर रही थीं ! सड़क पर तेज़ दौड़ते ट्रक , जीप और बस कि रफ़्तार और आवाज़ से बे खबर ! टूटी हुई टोकरी में कल रात कि राख भर कर दूर खेत में दाल आती और वहीँ से पीली मिटटी लेती आती , रस्ते में गाय का गोबर भी चुन लाती थीं ! आधे टूटे हुए मटके में मिटटी और गोबर का घोल बना कर पुरे मन से चूल्हे को अंदर बाहर से लीप कर नहाने चली जाती ! लौट कर फिर पूजा करती फिर चूल्हे को जलाती !! फिर भीतर जा कर नाश्ता बनाने लगती !

            इस बीच बूढ़े हो चुके बाबा भी नाहा कर , पूजा कर के दूकान पर आ गए ! रात में करीने से अलमारी में सजाये बिस्कुट , टाफी , बर्फी , मठरी और रस्क के डब्बे चूल्हे के सामने ऐसे रखते कि सामने आने वाले लोगो को दिखाई भी देते और मांगने पर वो खुद ही निकाल सकते ! बाहर के ड्रम में पानी बाबा ही भरते थे अम्मा ने ये काम उनके ज़िम्मे छोड़ रखा था ! आने जाने वाले ट्रक ड्राईवर उनसे चाय पीने से पहले अपने हाथ पाँव धोते जो हैं !

बाबा ने आज कि पहली चाय चूल्हे पर चढ़ा दी थी ! दूध रात का ही बचा था ! आज का दूध तो ट्रक वाला अभी दे कर नहीं गया ! हलकी सर्दी कि सुगबुगाहट थी आज सुबह !

बाबा अदरक नहीं डाली आज ? एक ड्राईवर ने चाय कि चुस्की  लेते हुए पुछा !

बाबा : डाली है बेटा ! कम रेह गयी होगी ! एक और चाय बना देता हूँ , ज़यादा डाल कर !

ड्राईवर : अरे नहीं बाबा , मैं तो बस पूछ रहा था ! लीजिये पैसे ! 

और वो पैसे दे कर अपनी मंजिल कि तरफ चल दिया !

दूकान मर रोज़ कि तरह गहमा गहमी हो चली थी ! सब कोशिश करते कि थोड़ी देर सही पर चूल्हे कि आंच के पास बैठ जाएँ और हाथ ताप ले !

अम्मा : लो जी अब  नाश्ता कर लो मैं चाय देख लेती हूँ ! अम्मा ने नाश्ते कि थाली बाबा कि तरफ बढ़ते हुए कहा !

बाबा : ठीक है !

अम्मा : राकेश , अब कैसी  तबियत है तेरे बेटे कि ? रोज़ काम पर जाते हुए दुकान पर चाय पीने वाले एक फेरी वाले से अम्मा ने पुछा !

राकेश : अब ठीक है अम्मा ! तुम्हारी वो देसी दवा ने बहुत सम्भाला नहीं तो बुखार उतर ही नहीं रहा था!

अम्मा मुस्कुराई और बोली : हाँ , एक बार जब किशोर बीमार पड़ा था जब वो ३ साल का था तब मेरी सास माँ ने ये ही पिलाया था उसको तब से मैं भी सीख गयी ! अब तेरे काम आयी !

राकेश : किशोर कब आएगा ?

अम्मा : जब जी में आएगा आ जाएगा !

बाबा : हाँ और क्या बच्चे बड़े हो जाये तो उनके जी कि ही सुन लेने में सब का हित है !

राकेश : अच्छा अम्मा , बाबा ये लो पैसे आज कि चाय के , कल कि मठरी को वरुण ले गया था के दाम शाम को देता हूँ !

अम्मा : अरे ठीक है राकेश - इतना हिसाब मत रखा कर , दे जाना जब समय हो !

धीरे धीरे दिन के ११ बज चले थे ! दूध वाला टैंकर आया ! कितना दूं अम्मा जी ?

अम्मा : रोज़ जितना देते हो उसमे ५ किलो बढ़ा देना , आज सर्दी है , खपत बढ़ गयी है और जल्दी से आ तुम्हारी चाय और पराठे ठन्डे हो रहे हैं !

दूध का टेंकर चलाने वाले रोहित को अम्मा और बाबा ने एक बड़े साहब से बोल कर दूध कि कंपनी में ड्राईवर रखा दिया था ! गाव का लड़का है ! माँ पिता जी के बाद कोई पास नहीं था संभालें को तो दसवीं के बाद मुखिया के यहाँ मजूरी करता था और ट्रैक्टर चलना सीख गया ! बस गाडी चलाने कि तरफ मन हो गया ! अम्मा के कहने पर दूध कि कम्पनी के बड़े साहब जो कभी कभी कंपनी में देख रेख के लिए आते थे ने ड्राईवर रखा दिया !  सुखी है !

अचानक से मौसम बदल गया ! हलकी बारिश हो चली थी ! सड़क के सभी लोग जैसे अम्मा कि दूकान में चले आये थे ! चाय  , मठरी , बिस्कुट सब जैसे लगता था कि २ घंटे में ख़तम हो जाएगा ! चूल्हे कि आंच बढ़ाने को , लकड़ी , कोयला सब बराबर अपना काम कर रहे थे ! अधेरे में बल्ब जलया बैटरी से ! एक सरदार जी ने अपने ट्रक कि बैट्री बदलवाई थी ! पुरानी वो अम्मा कि दूकान के लिए लेते आये थे उसी को इस्तेमाल कर आज अँधेरे में सबको रौशनी में चाय का आनद मिल रहा था !

बारिश तेज़ हो चली थी ! पानी बेंच और टेबल के नीचे से होता हुआ झोपड़ी के पीछे खेत में जा रहा था ! बाबा ने उठ कर एक बार दूकान कि खपरेल कि छत को देखा और मुस्कुराये !

अनिल : क्या देख रहे हैं बाबा ?

बाबा : कुछ नहीं , देख रहा हूँ और कितना संभालेगी ये हमें ?

अनिल के साथ साथ बाकि सब लोगो को जैसे लगा बाबा कुछ दुखी हैं मन ही मन !

अम्मा : तुम बस ऐसे ही मन दुखी कर लिया करो ! क्या हुआ जो किशोर हमें याद नहीं करता ? ये लोग जो तुम्हारे पास रोज़ आते हैं ! तुमसे अपना हाल बताते हैं  , तुम्हारा हाल लेते हैं किस के नसीब मैं है ये सब ?

बाबा : सच सच बोलो क्या मुझ जैसी दुखी तू नहीं भीतर ही भीतर ? १० साल से बेटे ने शक्ल नहीं दिखायी ! बस कोरियर से दो मोबाइल और सिम भेज दिए थे ! हर महीने बैलेंस भी डलवाता रहता है और बात भी कर लिया करता है , लेकिन उसका चेहरा देखे बरस बीत गए !

चूल्हे कि आग से ज़यादा अम्मा और बाबा के मन में पल रही अपने बेटे को देखने कि आस कि धधक हो चली थी जो बारिश और ठंडी हवा के बीच भी दबाते दबाते उभर चली थी ! सब निःशब्द अम्मा और बाबा के संवाद सुन रहे थी ! बारिश कि बूँदें कभी तेज़ कभी हलकी हो कर साथ देती जाती थी !

तभी एक बाइक सवार पानी में पूरी तरह से भीगा हुआ दूकान में आया ! काँप रहा था !

अम्मा और बाबा उस को देख कर अचानक से सब भूल गए और बोले :

क्या ज़रुरत थी बारिश में चलते रहने कि ? कहीं रुक जाते ? बारिश रूकती तो आ जाते ?

अच्छा अब चलो , अंदर और कपडे बदल लो , किशोर के कपडे शायद तुम्हे आ जाएंगे !

सब सोचने लगे शायद कोई रिश्तेदार होगा अम्मा जी का !

लड़का अंदर गया और गीले कपडे बदल कर बहार आया ! कपडे एकदम ठीक आये थे उसको ! जैसे उसके लिए ही खरीदे हों !

चाय पिलाई अम्मा ने उसको और फिर पुछा : कहाँ के रहने वाले हो ?

अम्मा कि ये बात सुन कर सब स्तभ्द : अम्मा तो ऐसे देखभाल कर रही थीं जैस उनका रिश्तेदार हो पर ये तो उसके रहने कि जगह भी नहीं जानती !

लड़का बोला : अम्मा में शहर में रहता हूँ और यहाँ से सैकड़ों मील दूर कर रहने वाला हूँ ! आज कालेज में छुट्टी थी तो अपने लोकल दोस्त कि बाइक ले कर गाव घूमने निकल गया और भटक गया ! इस जगह को जानता भी नहीं ! जब बारिश शुरू हुई तो आपकी दूकान के सिवाय कुछ नहीं दिखा तो आ गया ! वैसे आपके पास मेरे नाप के कपडे कहाँ से आये ? आपका बेटा भी मेरे उम्र और कद काठी का है क्या ? ज़रा बुलाइये मैं मिलना चाहूंगा उनसे !

ये सुन कर दूसरे ड्राईवर भी कहने लगे : हाँ अम्मा , बाबा आप लो तो बताते हैं कि आपके बेटे को आपने १० साल से नहीं देखा तो फिर ये कपडे कैसे ?

अम्मा और बाबा बोले : बेटा हर साल हम किशोर के लिए दीवाली पर कपडे खरीद कर लाते हैं पास के हाट से ! हर साल एक ही दूकान से और उस दूकान के मालिक के बेटे कि उम्र हमारे किशोर जैसे ही है !

सब कि आँखे डबडबा गयीं ! बारिश ने भी रुक कर अपने शामिल होने का एहसास करवाया ! 

ठीक है अम्मा जी आते रविवार को मैं अपने सब दोस्तों के साथ आउंगा ! कालेज कि बस लेकर और आपकी चाय पियेंगे ! ये कपडे भी उसी दिन लौटा दूंगा !

अम्मा बाबा जसे बेफिक्री से मुस्कुरा रहे थे और केह रहे थे  - तुम आते जाते रहो हमें किशोर कि कमी नहीं लगेगी !

बाकि के ट्रक ड्राईवर , जीप वाले , बस वाले , कार वाले सब धीरे धीरे अपनी रह चल दिए ! पूरा दिन चहल पहल के बाद पूरी रात का सन्नाटा और खालीपन अपने आगोश में लेने ले लिए सड़क पर खड़ा हो गया था ! कब चूल्हा बुझे और वो छा जाए !

रात के कोई १० बज रहे थे !

बाबा को नींद में थे !

उनको लगा जैसे किसी ने दूकान के पास उनको पुकारा था !

धीरे धीरे दुकान के पास गए ! हाथों में टार्च लिए हुए !

बाहर घुप्प अँधेरा था ! कभी कभी दूर सड़क पर एक दो ट्रक आगे पीछे चले जाते थे !

बाबा ने टार्च कि रौशनी बहार खड़े लड़के पर डाली और पुछा ? कौन हो बेटा ?

पास ही खड़े दूसरे लड़के ने कहा बाबा आपने पहचाना नहीं ?

बाबा : नहीं बेटा , आँखे कमजोर हो गयी हैं ना ! बता दो !

बाबा मैं किशोर हूँ !! लड़का बोला !

अम्मा के कानो में जैसे १० पानी के जहाजों कि सीटियों कि आवाज़ें एक साथ गूंज गयी और बाबा को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था ! बस टकटकी लगाये बेटे को निहारते जाते थी टार्च कि रौशनी में !

अदभुद समय ! असामान्य सयोंग ! अम्मा ने बैटरी से बल्ब जलाया ! दोपहर वाला लड़का उनके सामने खड़ा था अपने साथ किशोर को लिए ! दोनों साथ में ही पढ़ते थे एक कालेज में ! किशोर दिन में काम करता था और शाम को पढता था ! खूब पैसे कमाता था ! बड़े और पैसे वाले दोस्तों के बीच आपने माँ बाप को कमतर पाटा था इस लिए अपने घर का पता किसी को नहीं देता और न ही अपने घर किसी को ले जाता ! लेकिन आज एक बड़े कारोबारी के बेटे को जिस तरह से उसके माँ पिता जी ने सहायता करी बिलकुल अपने बेटे कि तरह वो अद्वितीय था ! कोई और कर ही नहीं सकता था ! अपने दोस्त कि आप बीती सुन कर उस से रहा नहीं गया और रात में ही आपने माँ बाप से मिलने चल दिया अपने दोस्त के साथ !

अम्मा ने पुछा : मिलने का मन नहीं करता तेरा हमसे ?

बाबा : अरे मन करा तभी तभी तो आया है !

किशोर : बाबा अब आप मेरे साथ शहर में रहेंगे ! हम कल ही जाएंगे !

अम्मा ने बाबा को और बाबा ने आम्मा को देखा और मुस्कुराते हुए बोले : और फिर कोई तेरे दोस्त जैसा बारिश में भीगता हुआ आया तो उसको कौन संभालेगा ?

किशोर : अब में कमाने लगा हूँ ! अपना मकान ले लिया है सब कुछ तो है फिर ये चाय कि दूकान क्यों ?

बाबा बोले : बेटा जितना आनंद सफ़र में है , वो मंजिल में नहीं !! तू मिलने आया वो भी सफ़र का हिस्सा है और हम तेरे फिर से आने का इंतज़ार करंगे !!

खुश रहिये , चलते रहिये , आनंदित रहिये !

                                                                                                 : by Manish Singh