Saturday, February 23, 2013

उसकी रोज़ की कमाई, से महंगे कप !!

संवेदना, लाज, अस्मिता,
पर , चर्चा !
बोतलबंद पानी,
डब्बाबंद खाना,
उसकी रोज़ की कमाई,
से महंगे कप,
बच्चो की पुस्तकों से
महंगा , पर्चा !

घूल, शोर रोधी,
कार में बैठे ;
सब लौट आये;
वो बैठी रही,
टिकट खिड़की के नीचे,
असहाय, आस में,
सुनकर लौटेंगे वो,
फिर, चर्चा में,
करते हुए,
सरकारी, खर्चा  !!

                                         <><>< मनीष  सिंह ><><>


Friday, February 22, 2013

... मंझा, धागा, हुचका, और उत्साह !!

"कटी-फटी पतंग,
  गीला अरारोट,
  मंझा, धागा, हुचका ,
  और उत्साह !
  दिन बीत जाता,
  आस में, की ,
 पतंग उड़ जाएगी !!"

"वो और मैं,
  हम सब,
  आशान्वित है,
 बिखरी संभावनाएं,
 सिमित साधन,
 ले चलेंगे हमें भी,
 ऊँची उड़ान पर ;
 अधिक प्रगति की !! "

Wednesday, February 20, 2013

सोचता हूँ , यात्राएं बड़ी हो , अर्थपूर्ण हों ....लम्बी नहीं !!

              आज थोड़े से ही फूल मिल सके थे उसको ,उस हारश्रिंगार के पेड़ के नीचे से !

           थोड़ी देर जो होगयी थी उसको सो कर उठने में तो पड़ोस की गीता और रतन ने चुन लिए थे सब फूल, उसके पहुचने से पहले ! कल रात माँ की खांसी ज्यादा थी इसलिए काढ़ा और गर्म पानी कर के देती रही ...जब माँ को थोड़ी रहत मिली तब उनकी आँख लगी ...और कुछ रात के बारह बजे उनकी बांह को पकडे पकडे सो गयी थी वो ....इस लिए सबेरे देर से जगी और फूल ना मिले ...  सो ,  आज दवा नहीं आ सकेगी !!
         वो सुनहरी बेतरतीब बालों वाली गुडिया उस काली सी बड़ी कार वाले बाबु को बहुत भाति थी ! रोज़ हर्श्रीन्गार, मोतिया और दो चार गुलाब के फूल अपनी नन्ही सी थाली में ले कर खड़ी रहती वो मंदिर के बहार की सीढ़ियों के पास ! अपने नन्हे नन्हे हाथों से कभी गुलाब , कभी मोतिया के फूलो की छोटी माल उठा कर भगवान् के भक्तों को कहती ...

" बाबूजी - बिलकुल ताज़े फूल है , " लेलो भगवान् से मन मांगी मन्नत पूरी होगी "
     
          कुल दस या पचास रूपए के लिए वो नन्ही सी जान सबेरे सबेरे ३ बजे से हर्श्रीन्गार के पेड़ के नीचे सफ़ेद चादर बिछा कर फूलों के गिरने का इंतज़ार करती है और खड़ी रहती है की कोई आये और उन्हें ले कर उसकी मन्नत पूरी करे !!

           भगवान् तो मंदिर के अन्दर हैं , उन्हें क्या क्या मालूम की उस नन्ही जान को क्या चाहिए ? वो तो अन्दर का सपने में भी नहीं सोच सकती और जब तक अन्दर भारी  भरकम भेंट , फूल की माला, और महगी मिठाई जब तक साथ ना हो तब तक गुडिया की अरदास कहाँ भगवान सुनेंगे !
                                
                                       आज  देर से जागी तो सब गड़बड़ हो गया !   

                  फिरभी खाली थाली ले कर उदासमन से उसी सीढ़ी के पास आ कर बैठ गयी !
देखने लगी रतन और गीता को, आज उसके हिस्से के फूल भी उनके पास थे !! फिर मन में सोचा उस नन्ही सी जान ने .... अरे कहाँ ये सारे फूल तो भगवान् जी के हिस्से के हैं और उन के 
पास मेरे  द्वारा चुन कर पहुचे या फिर किसी और के ...क्या फर्क पड़ता है ?? दुसरे मन ने कहा फर्क पड़ता है गुडिया - आज माँ के दवा नहीं आ सकेगी ...आज वो कल से ज्यादा खासेंगी और उनको आज कल से ज्यादा तकलीफ होगी !!

          वो ये सब सोच ही रही थी की अचानक एक स्पर्श ने उसको ऐसे जागृत किया जैसे सुन्न पद गए शारीर के हिस्से में अचानक चुभन का एहसास हो !!

वो ही बड़ी सी कार वाले पूछ रहे थे - " आज फूल किसी और दो दे दिए गुडिया ? "
नहीं बाबूजी - वो बोली !
तो तुम्हारी थाली खली क्यों है - बाबूजी ने फिर पुछा ?
वो एक सांस में सारा का सारा कह गयी ...और इस के कारण घर पर क्या होगा ये भी बोल दिया ...एक अधिकार से ......जैसे की रोज़ के मिलने जुलने वाले अपना दुःख दर्द बाँट लेते हैं !!
           उन बाबु जी ने उसको कार में बिठाया , उसके घर गए और साथ में दवा भी ले गए !! पूरा मोहल्ला देख रहा था ....आनंद चाहे छनिक हो ...उसका होना बरसो के ताप पर हिम का एहसास दे जाता है ...!!

       मैं मिला था ऐसी एक गुडिया से , जब दक्षिण भारत की यात्रा पर था !! कुछ कम समय की भेंट ने मुझे सब समझा दिया !! वो पढ़ती है और अपने को स्वाबलंबी कर चुकी है !

     कहीं सुना था, पढ़ा था , ...जिंदगी बड़ी होनी चाहिए ...लम्बी नहीं ! सोचता हूँ , यात्राएं बड़ी हो ,अर्थपूर्ण हों  ....लम्बी नहीं ....यात्राओं का लम्बा होना खालीपन को भी परिलक्षित  करता है ....इस गुडिया की जीवन यात्रा कुछ बड़ा सिखाती है !!



          
           

Monday, February 18, 2013

मैं हूँ , माँ तुम भी हो - मेरे जीने में !

युग , संसार, पूरी  धरा,
गंगा , शिप्रा, गोदावरी,
हिम, ज्वालामुखी,
एवं  शांत समुद्र,
वात्सल्य ,करुणा, अनुराग,
सब की मुट्ठी बांधे,
वो ,हमारे आने और जाने,
पर आशीष छिड़कती,
हम हरे भरे रहे , ताकि !!

चोखट और आँगन ,
निहारता हूँ मैं, आज
अब  वो फुहारें , नहीं हैं,
वो मुट्ठी भी नहीं है,
जिनसे अमृत धार,
जिनसे हिम ,
जैसे बरसती थी,
तुम, पनपती असुरक्षा,
विफलता के ज्वालामिखी पर ,
और शांत  हो जाते थे,
उफनते कई , ज्वार भाटे !!

माँ - आज तुम नहीं हो !!
मैं हूँ , माँ तुम भी हो ,
मेरे जीने में  !
तुमने जीना सिखाया है,
सो , जी रहे हैं !!  

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