Thursday, February 28, 2013
Wednesday, February 27, 2013
Monday, February 25, 2013
उसी घर की, खुशियों के लिए !!
चन्दन-लोहबान का
धुआ, सब खुशबू ,
बिखेर चुका था,
खुशियों और आनंद
के लिए !
आज उसके घर,
पूजा जो थी !
कल दफ्तर में ,
अधिकारी के क्रोध,
का ताप ,
झेल लेगी वो,
अधिक अगरबत्तियां,
लपेट कर,
उसी घर की,
खुशियों के लिए !!
<><><>< मनीष सिंह ><><><>
धुआ, सब खुशबू ,
बिखेर चुका था,
खुशियों और आनंद
के लिए !
आज उसके घर,
पूजा जो थी !
कल दफ्तर में ,
अधिकारी के क्रोध,
का ताप ,
झेल लेगी वो,
अधिक अगरबत्तियां,
लपेट कर,
उसी घर की,
खुशियों के लिए !!
<><><>< मनीष सिंह ><><><>
Sunday, February 24, 2013
!~! अब घर में, सब के सर पर छत्र है !~!
वो लगभग सड़क के बीचों बीच आ गए थे , करीब करीब भारी जोर से लगाईं गयी ब्रेक से एक बड़ा सा ट्रक उनके बिलकुल पास आ कर रुक गया , घने जंगल की घुप्प अँधेरी रात की ख़ामोशी को जोर से लगाईं ब्रेक ने उस सन्नाटे को तोड़ दिया , जसे जम चुके खून और ना उम्मीदी के बीच कोई आशा की किरण जागी उनके लिए ....जो रात के लगभग आधी पहर में दिसंबर की कड़क ठण्ड में , जंगल में उन निर्दियों के द्वारा मरने के लिए फेक दिए गए थे !!
कितना ख़ुशी का दिन था वो जब उनको विदेश जाने का मौका दिया गया था कंपनी की तरफ से , विशेष प्रोजेक्ट पर ! तनख्वाह में लगभग ६ हज़ार प्रतिमाह बढ़ोतरी और जिस देश में जा रहे थे वहां की सरकार एक साल के पचास हज़ार अगल से रूपए देती , चुकी ये प्रोजेक्ट वहां की सरकार का था इस लिए दो साल में लगभग एक लाख मिलते और रहने खाने सब का खर्च उनका ही ...यानी पूरी की पूरी बचत !
एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का सबसे बड़ा बेटा कितना उपर चला गया था !! गाँव में उस घर की बहुत प्रतिष्ठा थी ! उनका ही छोटा भाई हमारी कंपनी में अभियंता के पद पर काम कर रहा है ! सब ठीक से चल रहा था !!
अचानक एक दिन घर से उस छोटे भाई को एक फोन आया पिता जी का - अरे जीतू , कल से बड़े को हम सब फोन लगा रहे हैं , ना तो रिंग बजती है और जैसे वो हर हफ्ते हमें फोन कर के हाल चाल लेता था ...पिचले २ हफ़्तों से नहीं किया ....!!
जीतू - आप मुझे २ हफ्ते बाद बता रहे हैं ,ये ? खैर , कब से नहीं आया उनका फोन ?
पिता जी बोले- हमने ,सोचा की तुम भी परेशान होगे,
लेकिन जब दो हफ्ते हो गए तो हमें लगा की अब सामान्य बात नहीं !
लेकिन जब दो हफ्ते हो गए तो हमें लगा की अब सामान्य बात नहीं !
जीतू - ठीक है , मैं पता करता हूँ , आप वहाँ सब संभालिये !!
हमारे बगल की ही सीट पर बैठता है वो , हम उसकी बात सुन रहे थे ...जैसे ही उसने फोन रखा ...हम सब ने पुछा ...क्या हुआ जीतेन्द्र ? उसने एक सांस में उसने सब कह दिया , रूंधे गले से ! होना भी चाहिए बड़े भाई की लगभग गुमशुदगी की बात थी !!
वो छुट्टी ले कर चला गया ! जहाँ वो काम करते थे वहां के सभी बड़े अधिकारिओं से मिला ! कही से फटकार मिली ! कहीं से सहयोग किन्तु दुःख तो बस खुद को ही झेलना था सो वो झेल रहा था ....! परिवार अलग परेशान ! बड़े भाई के दो छोटे बच्चे , माँ , पिता जी , भाभी , और अपने परिवार के लोग भी ....सब परेशान और दुखी !! आस में की शायद कभी , कही से कुछ खबर आ जाए !!
धीरे - धीरे २ महीने बीत गए ! घर पर जो भी कोई संपर्क का , जान पहचान का आता जो बतलाता , जो भी उपाय बताता सब कर लेते , चाहे जितना भी खर्च हो ...इस उम्मीद में की वो आ जाएँगे !! कोई सिद्ध ब्राम्हण , किसी मौलवी , किसी संत , किसी महात्मा , किसी बाबा , किसी साधू , किसी अंतर्यामी जिस किसी से भी उम्मीद लगी उस के साथ हो लिए और उम्मीद में खर्च करते रहे अपनी आस , अपने आंसूं , अपनी भावनाए इत्यादी इत्यादि इत्यादि ....पर कोई भी उम्मीद की कहीं से नहीं दिखाई दे रही थी ! सब रोज़ रूखे मन से खाने के निवाले अपने गले से उतारते ये सोचते हुए की जीना तो है ...उनके लिए जो अभी छोटे हैं और उनके लिए भी ...शायद वो कभी आ जाये !!
सुबहा के करीब ३ बजे जीतेन्द्र की मोबाइल की घंटी बज उठी ....! कोई अनजान ननंबर था !
जीतेन्द्र सोता कहाँ था आजकल ! बस अपना सीधा हाथ आँखों पर रख कर सोच रहा था की क्या करूँ , कैसे लाऊँ भाई को वापस ? उसकी इस तल्लीनता को फोन की घटी ने तोडा दिया ....जैसे एकदम गरम तेल में कोई ठंडी पानी की बूँद गिर गयी हो !!
जीतेन्द्र ने मोबाइल उठाया ...हाँ , हेलो कौन बोल रहा है ?
सामने से आवाज़ आई - मेरी छोड़ो तुम बताओ कौन बोल रहे हो ?
जीतेन्द्र - भाई वैसे आपको बताना चाहिए ....लेकिन छोडिये , सर, में जीतेन्द्र हूँ !
अच्छा ? उधर से आवाज़ आई, देखो एक शख्स मिला है हमें , उसने ही तुम्हारा नंबर दिया और खुद को तुम्हारा बड़ा भाई बता रहा है ...क्या एसा है ? अपना एड्रेस बताओ !!
जीतेन्द्र ने सब बता दिया , जब ट्रक वाले को तसल्ली हो गयी तो उसने बोला - देखो हम इटावा के पास के राष्ट्रिय राज मार्ग पर घने जंगल में ये मुझे मिले एकदम बिना कपड़ो में , ठण्ड में ठिठुरते हुए ....सड़क के बीचों बीच में आ गए , मुझे ट्रक रोकना पड़ा नहीं तो ....... खैर तुम इनके भाई तो आ जाओ यहाँ और इनको ले जाओ मैं इनको इटावा रेलवे स्टेशन के पास चाय की दूकान पर छोड़ दूंगा !! जीतेन्द्र ने उस डाइवर को भीगी पलकों , रुंधे गले से लगभग गिड़गिडाते हुए उस डाइवर का धन्यवाद किया और निकल पड़ा इटावा के लिए !!
बस थोड़ी एक दो दुकानों के बाद चाय की दूकान पर " वो " दिखाई दिए ! दोनों भाई गले मिल कर खूब रोये , ,सुदामा - कृष्णा , भगवान् श्री राम - भरत और ना जाने कितने ही इस तरह के मिलापों की याद ताज़ा हो आई वहाँ खड़े लोगो को !!
जीतेन्द्र अपने बड़े भाई को ले कर उके दफ्तर पहुंचा , फिर वही से पुलिस के पास भी गया और सारा का हर वो काम पूरा किया जी को सिस्टम कहते हैं ,
जब कोई शिकायत की जाती है तो उसको पूरा होने तक पुलिस काम करती है और अगर उसके पूरा होने से पहले शिकायत को वापस ले लिया जाता है तो भी कार्य प्रणाली पूरी की जाती है की लूप ख़तम किया जा सके ! एक बड़े भाई के लिए सब वो किया जीतेन्द्र और उनको उनके काम पर छोड़ कर उनके गाँव गया और घर के सब लोगो को ये सब बताया ....सब का सब गाँव उनसे मिलने के लिए आया ! एक दिन के लिए वो उनको ले कर गाँव भी आया ! सब मिलने आये ! बच्चो के चेहरों पर आत्मविश्वास फिर से आ गया ! उसके पिता उनके बीच हैं !!
छत्रप हमेशा साथ नहीं रहते , बल्कि सबके साथ नहीं होते……. होते हैं तो सिर्फ आपके अपने ...जिनके आप है !! अतः अपनों और अपनेपन में ही जीवन है ..... अकेली तो हवा भी नहीं उसको अपने होने का प्रमाण देने के लिए सहारा लेने ही होता है !! सब साथ रहिये , हम हो कर ...मैं में आनंद नहीं ....नहीं तो मैं से हम होने के लिए जितेन्द्र से पूछिए कितनी तकलीफ होती है !!
! # ! अब घर में, सब के सर पर छत्र है ! # !
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