वो रोज़ की बातों को अपनी एक बिना जिल्द चढ़ी कॉपी में लिख लिया करता था , तारीख के साथ !!
उसे तो 10 सालों के बाद मालूम हुआ की इस आदत को साहित्यक जगत में " डायरी लिखना " कहते है !!
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" लगभग 8 से 9 साल का रहा होगा जब उसने अपने आप को एक अनाथालय में पाया ! अभी कुछ दिन पहले ही तो वो अपनी माँ और बाबा के पास था फिर अचानक ना जाने क्या हुआ की बाबा के एक दोस्त उसको इस जगह पर छोड़ गए ....ये कह कर की कुछ काम है इस लिए कुछ दिनों के लिए तुम्हे यहाँ रहना होगा और फिर तुम्हारे माँ बाबा तुम्हे यहाँ से ले जायेंगे , 10 साल से अपने माँ बाबा के इंतज़ार करता करता वो .....आज सोचता है की : " जापान में भी ऐसा होता होगा क्या ? "
आज जापान की राजधानी टोकियो के एक आलीशान होटल में अपने सबसे बेहतरीन कमरे से सूरज की पहली किरणों का एहसास करते हुए उसका हाथ अपनी उसी पुरानी बिना जिल्द लगी कापी पर चला गया ...जिसको उसने अनाथालय की बिकती हुई रद्दी में से चुने हुए खाली पन्नो से बनाया था ! मोटे धागे और सुई को वो सामने वाले इस्माईल मिया की दूकान से मांग लाया था और सिलते हुए उसके हाथों में एक बार सुई चुभ भी गयी थी , लेकिन वो सुख जो कापी से मिलने वाला था के सामने ये दर्द कोई वजूद नहीं रखता ......सारी बातें अचानक उसके सामने जैसे बैक फ्लेश में चलती हुई फिल्म से सामान गुजरने लगी ......!!
" अरे बंधू कहाँ के हो ? " "कब आये ?" " क्यों आये ? " "माँ मर गयी या बाप ने दूसरी शादी कर ली ?" किसी रेड लाइट एरिया के प्रोडक्ट हो क्या ?
उस दिन ऐसे ना जाने कितने अनगिनत सवाल उस से पूछे गए जिनका कोई अर्थ उसको नहीं मालूम पड़ा था और वो ख़ामोशी और आखों में सवाल खुद से पूछते हुए चुप रह गया था ....उस दिन जिस दिन उसके अंकल उसको यहाँ छोड़ कर गए थे !! उन्होंने तो कहा था की कुछ दिनों के बाद उसके माँ बाबा उसको ले जाएँगे लेकिन ये 10 बीतने के बाद भी कोई उसको नहीं बता रहा की वो यहाँ क्यों है , और कब तक उसको यहाँ रहना है ..किस गुनाह में .....?
उसका दाखिला सामने वाले सरकारी स्कूल में करा दिया गया , 2.75 रूपए हर माह फीस जाती थी ! कभी कोई दान में किताबे दे जाता था तो कोई बसते , कोई पेन्सिल रबर दे जाता था तो किसी ने खाने के सामानों की वेवस्था के दी थी .... !! उसको एक गुजरती माता जी ने जैसे गोद ले लिया था ....ना .,...कभी उसको अपने घर नहीं ले कर गयी लेकिन हर हफ्ते उसको मिलने आती थी ....और बाकि बच्चों की तरह उसको भी सब सामान दे कर जाती थी ...बस थोडा अधिक सा सामान मिल जाता था और कभी कभी उसके सर पर हाथ फेर कर कहती थी :
" तुम मझे एक अच्छे परिवार के लगते हो , खूब मन लगा कर पढो मैं सब इन्तेजाम कर दूंगी ! " एक बार एक सुबह वो आई और कहा की तुमको दसवी के लिए मैं अमदावाद भेज रही हूँ , वही ठीक से पढ़ाई हो सकेगी तुम्हारी ...और में अमदावाद आ गया ....बचपन भर इधर उधर भटकता ही तो रहा हूँ मैं ...ये सोच कर रह जाता था !
अंग्रेजी - कोंवेंट स्कूल में पढ़ाई होने लगी ...!! लेकिन वो बिना जिल्द वाली कापी उसके साथ हमेशा रही और रोज़ होने वाली बातों को लिखता रहा .....उन्ही शब्दों में .....जेसे जेसे पढ़ाई हुई ...शब्दकोष में विस्तार हुआ और लेखन में प्रखरता आती गयी ....!! उसने कभी दूसरी कापी नहीं बनाई पन्ने कम पड़ते तो किसी और कापी से फाड़ कर उस में ही जोड़ लेता था ! अजीब सा लगाव और भवनात्मक जुड़ाव जो हो गया था उसका उस कापी से .....माँ को सुनाने के लिए जो लिखा था उसने सब ... क्या क्या बीता उसके साथ उन 12 सालों में ...माँ से अलग रह कर ...सब लिखा था उसने ....कैसे उस मीटी खीर का मीठापन आंसुओं के कारण ना कहे जा सकने वाले स्वाद में बदल गया था ....कैसे उस दिन जब उसको क्लास में दूसरा स्थान मिला था तो कोई नहीं था उस पल उसके पास उसके सर पर हाथ फेरने वाला कोई नहीं था ....वो गुजरती आंटी थी तो वो भी एक हफ्ते बाद आती ...और तब वो भाव नहीं आते .....!!
पढ़ाई में अच्छा था वो ....! इसलिए स्कूल से वजीफा मिला और कनाडा के एक प्रतिष्ठित संस्थान में उसको भेज गया .....आज भी वो उसी बिना जिल्द वाली कापी में वो सब लिखता था ....लिखता गया , लिखता गया ....और बढ़ता गया ....!! इकोनोमिक्स में ग्रेजुअसन करने के बाद डाक्टरी करी ....और इकोनोमिक्स में ही आगे के शोध किये ...और आज जापान में होने वाले अन्तराष्ट्रीय इकोनोमिक्स मीट में कनाडा के दल की आगुआइ करने के लिए आया है ....साथ में उसके एक छोटा सा ...लगभग 5 वर्ष का बच्चा भी है ....कौन ...है किसका है नहीं मालूम .....!!
ये सब सोच रहा था की अचानक जसे किसी ने उसकी तन्मयता को तोडा ...., दरवाज़े पर घंटी बजी : " रूम सर्विस " , हाँ हाँ अन्दर आजाओ - टी सर !! उसने थोडा गुस्से से पुछा " और चॉकलेट वाला मिल्क कहाँ है ....वेटर बोला " सर बस ला ही रहा हूँ ...." जल्दी लाओ !
रोहन , रोहन उठो , सुबह हो गयी ...और वो 5 साल का बच्चा उठा और अपने कोमल कोमल हाथों से सार्थक से लिपट गया ....कितना सुकून मिलता है जब रोहन उसके गले से लिपटता है ....कोई है जो उसका अपना है ...और अपनापन देता है ....पुरे खालीपन में एक रंगीन " तुलिका " जो जीवन को रंगों से भर देगी ......!!
उसने रोहन को बनारस के एक अनाथालय से अडॉप्ट किया था पिछले साल जब वो अपनी माँ को खोजने भारत आया था ....माँ तो नहीं मिली ...किन्तु वो पिता बन गया ..." रोहन " का ...तब से वो उसके साथ है .... अकेलापन जो जान बूझ कर दिया गया हो ...वो सार्थक ने जिया है ...इस लिए रोहन उसके साथ है ...और साथ है वो पूरा समय शब्दों में लिखा गया उसकी बिना जिल्द वाली कापी में ....जो माँ और अकेलेपन की कमी को पूरा करती है ...
भैया आप इन फटे पुराने पन्नो को क्यों अपने साथ रखते हो ? इनको फेक दो और नई डायरी खरीद लो ....ये अच्छी नहीं लगती .......रोहन ने वो बिना जिल्द वाली कापी अपने हाथो में ले कर मुह सिकोड़ते हुए बोला ....! ये बात रोहन ने कही थी इस लिए वो बर्दास्त कर गया , कोई और एस कुछ उसकी इस कापी के बारे में कहे तो ......बस !!
वो रोहन को चाकलेट वाले दूध को पिलाते हुए सोचने लगा " रोहन " ज़िन्दगी के बीते हुए दिन बदले नहीं जा सकते ....जो जैसा बीत गया वो वैसा ही रहता है ....हाँ आनेवाली ज़िन्दगी को बदलने का प्रयास किया जा सकता है ....जैसे मेरे साथ उन गुजराती आंटी जी ने लिया और अब मैं वो ही कोशिश तुम्हारे लिए करूंगा ....."
वो ये सब सोच ही रहा था की उसके एप्पल के टेबलेट पर सारिका की काल आई
...और उसने पुछा ...रोहन ने दूध पिया ?
सिद्धार्थ : हाँ पी लिया ...और अंशिका क्या कर रही है ...
सारिका बोली : बस स्कूल के लिए तयार होते हुए रोहन को याद कर रही है ....कब तब आओगे ?
सिद्धार्थ बोला " - कल सुबह " !
सारिका : ठीक है -
सिद्धार्थ : सारिका ,,,,, ये रोहन मुझे अभी भाई भैया ही बोलता है ?
सारिका हंसी और बोली : हा हा हा ...भाई मुझ तो माँ बोलता है ! ठीक है ...तुम आ जाओ मैं उसे सिखा दूंगी .....चलो अब रखती हूँ ....अंशिका की स्कूल बस आ गयी ., ओके बाय रोहन का ख्याल रखना और मीटिंग के वक़्त उसको अपने आस पास ही रखना !
सिद्धार्थ बोला : अच्छा ठीक है ...बाए , रोहन : नही बेटा उन पन्नो को दो मुझे !
रोहन बोला : आप इतना क्यों प्यार करते हो इन फटे पन्नों से ?
सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए रोहन से एक कापी का अलग हुआ पन्ना वापस लिया और मन ही मन सोचा - बेटा , हो सके तो तुम ऐसे पन्नों को मत इक्कठा करना ....मेरी तरह !!!
एक-एक दिन कर के जुड़ते हुए पन्ने ही तो है , ये जीवन !!
जो कभी कभी सुन्दर जिल्द वाली किताब बन जाते हैं ...भरे पुरे परिवार और जिम्मेदारियां निभाते हुए और कभी कभी पूरी उम्र एक एक कर के पन्ने जुड़ते रहते हैं " जिल्द " कभी चढ़ती ही नहीं !!