Saturday, January 26, 2013

.... विकास एक परम्परा है , जो निभाई जाती है , ज़रुरत हो तो शुरू भी की जाती है !!

                     " उत्सव " का दिन स्कूलों में गणतन्त्र दिवस हो या फिर स्वतंत्रता दिवस ...जाना तो होता है लेकिन उत्साह इस बात का की क्लासों में जाना नहीं होगा ....बस इधर उधर घुमते रहिये , उन्ही दोस्तों से इन दोनों दिनों में मिलने में , बातें करने में जो आनंद और समय के सदुपयों का अंदाजा होता है , वो अन्य किसी सामान्य दिन में नहीं होता .....!

             स्कूल के बगल वाली स्टेशनरी की दुकान पर आने वाले सारे के सारे नए बाल पेन देख लेने का समय इस दिन ही मिलता था ....

            टिक्की वाले और कुलचे वाले की ठेली पर देर तक खड़े हो कर उसको पत्ते बनाते हुए देखना का आनंद इसी दिन तो मिलता था ....

            स्कूल के बगल से गुजरती हुई सकरी गली से निकल कर बड़ी सड़क पर बने कम से कम 100 साल पुराने " चर्च " के अंदर जाने और उसकी उची उची दीवारों और उनके ऊपर बने बड़े बड़े चित्रों को देखते हुए ...यीशु की प्रतिमा के सामने खड़े हो कर परीछा में बढ़िया नंबरों क प्रार्थना करने का ...सामान्य से देर तक इसी दिन तो समय मिलता था ....

           नवयुग मार्किट के तिकोने पार्क में आधे घंटे बेठ कर फिर घर जाने के बाद ....घर पर या सफाई देना की स्कूल से आने में देर हो गयी की स्कूल से देर से प्रोग्राम ख़तम हुआ .....का आनंद ही कुछ और ही था ...समय भी और था ....
       
           मुकंद नगर से लोहिया नगर तक आने का सीधा सा रास्ता है ....लेकिन इन दोनों दिनों में ... चौपला मंदिर - हनुमान जी को प्रणाम पर के ,  दिल्ली गेट - विभिन्न तरह के जनरेटर और सिंचाइन की मशीनों को देखते हुए , अनाज मंडी - गहू , चावल , दाल और गुड की महक लेते हुए , गुड दाम पूछने क बहाने चखते हुए , गन्दा नाला - मिक्सी की अनेको प्रकारों और उनको ठीक होते हुए देखते हुए घर जाने का आनंद ही कुछ और था !!  घंटाघर से होते हुए मंडी , सब्जी मंडी , गोल मार्किट , फिर बजरिया और वहां से किराना मंडी , फिर गाँधी नगर और तुराब नगर और फिर बसंत सिनेमा हाल के सामने से होते हुए ...लगी हुई पिक्चर के पोस्टर देखते हुए ....नया गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफोर्म के किनारे किनारे घर पर आने का आनंद और पुरे दिन को उल्ल्हास से बिता कर ....कोई नहीं पूछे की क्यों इतनी देर हुई ? चुप चाप बने खाने को थाली में ले कर टेलीविज़न देखते हुए ....मन ही मन पुरे दिन की यादों को अपनी आँखों में ले कर राजा होने की अनुभूति .....का तारतम्य अनोखा है .......

                   एक मुख्य आकर्षण इस दिन का होता था .....उस दिन मिलने वाले लड्डू , बर्फी , समोसे और कोई ना कोई फल का आनंद और खुद को उन्नंत मानने का आनंद ....         हमारे घर में आपके घरों में इस दिन जलेबी लाने और बांटने का भी चलन है .

                    इस दिन उपलब्धियां देश की राजधानी के विजय चौक  से होते हुए इंडिया गेट पर घूमती हैं और हम बचपन में इस दिन घुमते हैं अपने शहर की सड़कों और गलियों में ....स्कूल की ही यूनिफार्म में ....कोई नहीं पूछता , टोकता की इस समय कहाँ घूम रहे हो ....जैसे की देश की नयी पीढ़ी शहर का अंदाजा ले रही है की देश को आगे कैसे ले जाना है और कैसे सुरक्षित रखना है .......!!

                विकास एक परम्परा है ,  जो निभाई जाती है और ज़रुरत हो तो शुरू भी की जाती है !! इन दोनों दिनों में ये आशा करते हैं ....पारंपरिक तौर तरीकों को और प्रखर किया जाए एवं  नई पीढ़ी की प्रस्तावनाओं को जान समझ कर प्रराभ्ध से प्रारंभ भी किया जाना चाहिए ....कोई ना करे तो सवयम भी कदम उठाये जा सकते हैं ...... जय हिन्द - जय हिन्द की सेना और जय जय हिन्द के नव युवा - देश के किसान .....जय हो !!
        





          

Friday, January 25, 2013

एक कहानी : उस बिना जिल्द की कापी और फटे हुए पन्नो का सच !!

वो रोज़ की बातों को अपनी एक बिना जिल्द चढ़ी कॉपी में लिख लिया करता था , तारीख के साथ !!

            उसे तो 10 सालों के बाद मालूम हुआ की इस आदत को साहित्यक जगत में " डायरी लिखना " कहते है !!
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       "   लगभग 8 से 9 साल का रहा होगा जब उसने अपने आप को एक अनाथालय में पाया ! अभी कुछ दिन पहले ही तो वो अपनी माँ और बाबा के पास था फिर अचानक ना जाने क्या हुआ की बाबा के एक दोस्त उसको इस जगह पर छोड़ गए ....ये कह कर की कुछ काम है इस लिए कुछ दिनों के लिए तुम्हे यहाँ रहना होगा और फिर तुम्हारे माँ बाबा तुम्हे यहाँ से ले जायेंगे , 10 साल से अपने माँ बाबा के इंतज़ार करता करता वो .....आज सोचता है की : " जापान में भी ऐसा होता होगा क्या ? "
          आज जापान की राजधानी टोकियो के एक आलीशान होटल में अपने सबसे बेहतरीन कमरे से सूरज की पहली किरणों का एहसास करते हुए उसका हाथ अपनी उसी पुरानी बिना जिल्द लगी कापी पर चला गया ...जिसको उसने अनाथालय की बिकती हुई रद्दी में से चुने हुए खाली पन्नो से बनाया था ! मोटे धागे और सुई को वो सामने वाले इस्माईल मिया की दूकान से मांग लाया था और सिलते हुए उसके हाथों में एक बार सुई चुभ भी गयी थी , लेकिन वो सुख जो कापी से मिलने वाला था के सामने ये दर्द कोई वजूद नहीं रखता ......सारी बातें अचानक उसके सामने जैसे बैक फ्लेश में चलती हुई फिल्म से सामान गुजरने लगी ......!!
      

         " अरे बंधू कहाँ के हो ? " "कब आये ?" " क्यों आये ? " "माँ मर गयी या बाप ने दूसरी शादी कर ली ?"  किसी रेड लाइट एरिया के प्रोडक्ट हो क्या ?
            उस दिन ऐसे ना जाने कितने अनगिनत सवाल उस से पूछे गए जिनका कोई अर्थ उसको नहीं मालूम पड़ा था और वो ख़ामोशी और आखों में सवाल खुद से पूछते हुए चुप रह गया था ....उस दिन जिस दिन उसके अंकल उसको यहाँ छोड़ कर गए थे !! उन्होंने तो कहा था की कुछ दिनों के बाद उसके माँ बाबा उसको ले जाएँगे लेकिन ये 10 बीतने के बाद भी कोई उसको नहीं बता रहा की वो यहाँ क्यों है , और कब तक उसको यहाँ रहना है ..किस गुनाह में .....?
      उसका  दाखिला सामने वाले सरकारी स्कूल में करा दिया गया , 2.75 रूपए  हर माह फीस जाती थी ! कभी कोई दान में किताबे दे जाता था तो कोई बसते , कोई पेन्सिल रबर दे जाता था तो किसी ने खाने के सामानों की वेवस्था के दी थी .... !! उसको एक गुजरती माता जी ने जैसे गोद ले लिया था ....ना .,...कभी उसको अपने घर नहीं ले कर गयी लेकिन हर हफ्ते उसको मिलने आती थी ....और बाकि बच्चों की तरह उसको भी सब सामान दे कर जाती थी ...बस थोडा अधिक सा सामान मिल जाता था और कभी कभी उसके सर पर हाथ फेर कर कहती थी :

          " तुम मझे एक अच्छे परिवार के लगते हो , खूब मन लगा कर पढो मैं सब इन्तेजाम कर दूंगी ! " एक बार एक सुबह वो आई और कहा की तुमको दसवी के लिए मैं अमदावाद भेज रही हूँ , वही ठीक से पढ़ाई हो सकेगी तुम्हारी ...और में अमदावाद आ गया ....बचपन भर इधर उधर भटकता ही तो रहा हूँ मैं ...ये सोच कर रह जाता था !
       अंग्रेजी - कोंवेंट स्कूल में पढ़ाई होने लगी ...!! लेकिन वो बिना जिल्द वाली कापी उसके साथ हमेशा रही और रोज़ होने वाली बातों को लिखता रहा .....उन्ही शब्दों में .....जेसे जेसे पढ़ाई हुई ...शब्दकोष में विस्तार हुआ और लेखन में प्रखरता आती गयी ....!! उसने कभी दूसरी कापी नहीं बनाई पन्ने कम पड़ते तो किसी और कापी से फाड़ कर उस में ही जोड़ लेता था ! अजीब सा लगाव और भवनात्मक जुड़ाव जो हो गया था उसका उस कापी से .....माँ को सुनाने के लिए जो लिखा था उसने सब ... क्या क्या बीता उसके साथ उन 12 सालों में ...माँ से अलग रह कर ...सब लिखा था उसने ....कैसे उस मीटी खीर का मीठापन आंसुओं के कारण ना कहे जा सकने वाले स्वाद में बदल गया था ....कैसे उस दिन जब उसको क्लास में दूसरा स्थान मिला था तो कोई नहीं था उस पल उसके पास उसके सर पर हाथ फेरने वाला कोई नहीं था ....वो गुजरती आंटी थी तो वो भी एक हफ्ते बाद आती ...और तब वो भाव नहीं आते .....!!
         पढ़ाई में अच्छा था वो ....! इसलिए स्कूल से वजीफा मिला और  कनाडा के एक  प्रतिष्ठित संस्थान में उसको भेज गया .....आज भी वो उसी बिना जिल्द वाली कापी में वो सब लिखता था ....लिखता गया , लिखता गया ....और बढ़ता गया ....!!  इकोनोमिक्स में ग्रेजुअसन करने के बाद डाक्टरी करी ....और इकोनोमिक्स में ही आगे के शोध किये ...और आज जापान में होने वाले अन्तराष्ट्रीय इकोनोमिक्स मीट में कनाडा के दल की आगुआइ करने के लिए आया है ....साथ में उसके एक छोटा सा ...लगभग 5 वर्ष का बच्चा भी है ....कौन ...है किसका है नहीं मालूम .....!!
          ये सब सोच रहा था की अचानक जसे किसी ने उसकी तन्मयता को तोडा ...., दरवाज़े पर घंटी बजी : " रूम सर्विस " , हाँ हाँ अन्दर आजाओ  - टी सर !! उसने थोडा गुस्से से पुछा " और चॉकलेट वाला मिल्क कहाँ है ....वेटर बोला " सर बस ला ही रहा हूँ ...." जल्दी लाओ !
        रोहन , रोहन उठो , सुबह हो गयी ...और वो  5 साल का बच्चा उठा और अपने कोमल कोमल हाथों से सार्थक से लिपट गया ....कितना सुकून मिलता है जब रोहन उसके गले से लिपटता है ....कोई है जो उसका अपना है ...और अपनापन देता है ....पुरे खालीपन में एक रंगीन " तुलिका " जो जीवन को रंगों से भर देगी ......!!
        उसने रोहन को बनारस के एक अनाथालय से अडॉप्ट किया था पिछले साल जब वो अपनी माँ को खोजने भारत आया था ....माँ तो नहीं मिली ...किन्तु वो पिता बन गया ..." रोहन " का ...तब से वो उसके साथ है .... अकेलापन जो जान बूझ कर दिया गया हो ...वो सार्थक ने जिया है ...इस लिए रोहन उसके साथ है ...और साथ है वो पूरा समय शब्दों में लिखा गया उसकी बिना जिल्द वाली कापी में ....जो माँ और अकेलेपन की कमी को पूरा करती है ...

           भैया आप इन फटे पुराने पन्नो को क्यों अपने साथ रखते हो ? इनको फेक दो और नई डायरी खरीद लो ....ये अच्छी नहीं लगती .......रोहन ने वो बिना जिल्द वाली कापी अपने हाथो में ले कर मुह सिकोड़ते हुए बोला ....!  ये बात रोहन ने कही थी इस लिए वो बर्दास्त कर गया , कोई और एस कुछ उसकी इस कापी के बारे में कहे तो ......बस !!
          वो रोहन को चाकलेट वाले दूध को पिलाते हुए सोचने लगा " रोहन " ज़िन्दगी के बीते हुए दिन बदले नहीं जा सकते ....जो जैसा बीत गया वो वैसा ही रहता है ....हाँ आनेवाली ज़िन्दगी को बदलने का प्रयास किया जा सकता है ....जैसे मेरे साथ उन गुजराती आंटी जी ने लिया और अब मैं वो ही कोशिश तुम्हारे लिए करूंगा ....."

         वो ये सब सोच ही रहा था की उसके एप्पल के टेबलेट पर सारिका की काल आई
...और उसने पुछा ...रोहन ने दूध पिया ?

सिद्धार्थ : हाँ पी लिया ...और  अंशिका क्या कर रही है ...

सारिका बोली : बस स्कूल के लिए तयार होते हुए रोहन को याद कर रही है ....कब तब आओगे ?

सिद्धार्थ बोला " - कल सुबह " !

सारिका : ठीक है -

सिद्धार्थ : सारिका ,,,,, ये रोहन मुझे अभी भाई भैया ही बोलता है ?

सारिका हंसी और बोली : हा हा हा ...भाई मुझ तो माँ बोलता है ! ठीक है ...तुम आ जाओ मैं उसे सिखा  दूंगी .....चलो अब रखती हूँ ....अंशिका की स्कूल बस आ गयी ., ओके बाय रोहन का ख्याल रखना और मीटिंग के वक़्त उसको अपने आस पास ही रखना !

सिद्धार्थ  बोला  : अच्छा ठीक है ...बाए , रोहन : नही बेटा उन पन्नो को दो मुझे !

रोहन  बोला : आप इतना क्यों प्यार करते हो इन फटे पन्नों से ?   

           सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए रोहन से एक कापी का अलग हुआ पन्ना वापस लिया और मन ही मन सोचा - बेटा , हो सके तो तुम ऐसे पन्नों को मत इक्कठा करना ....मेरी तरह !!!
                              एक-एक दिन कर के जुड़ते हुए पन्ने ही तो है , ये जीवन  !!

        जो कभी कभी सुन्दर जिल्द वाली किताब बन जाते हैं ...भरे पुरे परिवार और जिम्मेदारियां निभाते हुए और कभी कभी पूरी उम्र एक एक कर के पन्ने जुड़ते रहते हैं " जिल्द " कभी चढ़ती ही नहीं  !!

Monday, January 21, 2013

यद्यपि , कमियों में पूरे किये गए अच्छे शौक़ ... शौक़ नहीं रहते .... उनको पूरा करने का जूनून और किये गए प्रयास तथापि जीवन के " मार्गदर्शक " हो जाते हैं !!

                                    तब वो  यू एस एस आर ( U S S R )  हुआ करता था !!

                सन  उनीस सौ अट्ठासी (1988 ) उन्नीस सौ इक्क्यानबे (1991 ) के वर्षों के बीच की बात है ! हर रोज़ स्कूल से आते वक़्त मैं अपने दोस्तों के साथ एक किताबों की अस्थाई दूकान पर रुका  करता था , घंटों वहां पर रखी रंगीन और बढ़िया चित्रों वाली किताबों को अलट - पलट कर देखा करता था ! भाषा हिंदी , रुसी , अंग्रेजी और इतालवी में होती थी !! हिंदी भाषा की किताबें और उनके रंगीन कलेवर ( COVER ) , पन्नों और मुद्रण का स्तर इतना उम्दा की देखने वाला बरबस ही उनकी ओर आकर्षित हुए बिना न रह सके  !!
              वो समय भी सब के जीवन में विशेष होता है जब हम आठवीं और दसवीं क्लास में पढ़ रहे होते हैं ...जब सब कुछ पा लेने की चाहत होती है जो भी हमारे आस-पास होता है , चाहे जो कुछ भी हो ....अपनी सीमाओं में हो  या ना हो !! सब कुछ अपने पास रख लेने की चाह !!               
              कभी डाक टिकट इकठ्ठा करने में मन लगता है तो कभी रह चलते मिलती हुई खाली माचिस की डिब्बियों के ऊपर छपे विभिन्न चित्रों को संचित कर ने की इक्छा होती है ....फिर वो खाली डब्बी चाहे जीतनी भी धुल भरी जगह पर पड़ी हो ....उठा लेते हैं और रख लेते है ...अपने बचपन के खजाने को बढ़ाने के लिए ...!!  कभी बोटनी की क्लास में जाने का मौका मिले , वैसे सरकारी स्कूलों में इसे मौके सिर्फ एग्जाम के समय ही मिलते है जब दुसरे जगह के एक्स्ज़मिनर  लेने आते हैं ....वर्ना तो सारी पढ़ाई बिना प्रयोगशाला में गए ही पूरी हो जाती है ....और जब बोटनी की प्रगोय्शाला में जाते हैं तो उसी दिन से शुरू हो जाता है ....सभी दिखाई पड़ने वाले पेड़ पौधों के पत्तों को किताबों में रख कर सुखाने और संगृहीत करने का सिलसिला ....दर असल कई बार इस तरह से मैंने अपनी कितनी ही किताबों के पन्नो को खराब किया था !
            घर में लाइब्रेरी बनाने का  शौक़ चाहे अपने कोर्स की किताबों को पढ़ने का वक़्त मिले या ना मिले , पढ़ने का मन करे ना करे !! इसी शौक़ को हमारे मित्र देश रूस की लिए भारत में मुद्रित होने वाली किताबों ने और पंख लगा दिए ....रोज़ दोपहर स्कूल से लौटते वक़्त उस बस अड्डे के किनारे वाली अस्थाई दूकान पर घंटों खड़े हो कर देखने का मन और सामने से आती जाती बसों , कारों और ऑटो के शोर का कोई फर्क नहीं होना ...बस उस उम्र और चाहत के कारण था !! तब इस किनारे जहाँ आज भी एक मशहूर पोद्दार नर्सिंग होम है से G D A की विकास बिल्डिंग साफ़ साफ़ दिखाई पड़ती थी ...तब पुल नहीं बना था ...और संतोष मेडिकल कालेज का काम पहले होटल केलिंवोर्थ के नाम से प्रगति पर था .... !!
            अब आप समझ ही सकते हैं की उत्तर प्रदेश के किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले किसी आठवीं के बच्चे की अंग्रेजी में कितनी पकड़ होगी ...फिर भी उस किताब की दूकान पर खड़े हो कर के अंग्रेजी में छपी और इन्गिनिरिंग की किताबों को अलट पलट कर देखने से गर्व महसूस हो था था ...और तब ज्यादा जब कोई हमें देख रहा हो ऐसा  करते हुए ...!! ये सही है !! उन किताबों के पीछे के पन्नों पर उनके दाम लिखे होते थे , स्टाम्प किये होते थे नील रंग की स्याही से !! सबसे मेहेंगी किताब उन दिनों मैंने उस दूकान पर देखि थे 50 रूपए की !! कुछ और भी मंहगी रही होंगी किन्तु इतनी मोटी और प्रभाव छोड़ती हुई , कभी उनको उठा कर भी  नहीं देख सका!! 
            मेरा  सब ले लेने का मन करता था बस उनके मुल्य चुकाने को पैसे नहीं होते थे ,आज पैसे हैं तो अब मन नहीं करता ....और वो किताबों की अस्थाई दुकाने भी नहीं लगती ! रोज़ या एक दिन बीच कर के मिलने वाले एक या दो रुपयों को सप्ताह भर इक्कठा कर के अंदाजा लगता था की कौन सी किताब आ सकती है ...किन्तु कई बार एसा हुआ की जब तक मनपसंद किताब के लिए पैसे जमा हुए तब तक वो अस्थाई दूकान शहर के किसी और इलाके में चली गयी ....और हम मन मार कर रह गए ....!! मैंने कई किताबें खरीदी थीं वहां से , कुछ तो आज भी मेरे पास हैं उनके शीर्षक ही मन को भा गए और फिर उनके रंगीन और आकर्षित करने वाले कलेवर तो क्या कहिये .....:

1. रुसी लोक कथाएँ ,
2. F I N S  - रंगीन मछलियों के चित्रों और उनकी जानकारी सही,
3. लेव टॉलस्टॉय की - क्ज्ज़क्क इत्यादि ...

            एक किताब तो कुछ 21 रूपए की है ...सन 1991 में ये भी बहुत थे भाई ....और मेरे पास 4 दिनों के बाद 21 रूपए पुरे होने वाले थे ...हब मैंने उस किताब बेचने वाले से एक सौदा किया ...की वो ये किताब मेरे सिवा किसी और को नहीं बेचेगा लेकिन इसके बदले में वो मुझ से 1 रुपया ज्यादा लेगा ....और मैंने उसको चार दिन बाद 22 रूपए दिया 21 किताब के और 1 उस किताब को मेरे लिए रखने के लिए !!  एसा था मैं .......कज्जाक तो सिर्फ 8.50 रुपए की है !! आज उसी जगह पर एक चाट वाला खड़ा होता है जिसकी चाट के एक पत्ते की कीमत है 25 रूपए ....लोग लाइन लगा कर खाते हैं ....!!  मेरे घर में आज भी हिंदी की चंदामामा आती है ! मेरी माँ को भी किताबें पढने का खूब शौक़ था , इंद्रजाल कामिक्स की तो दो मोटी मोटी एक साथ बाइन्द करी हुई किताबे आज भी हैं जिसमे " मेन्ड्रेक " और " बेताल " की किताबें आज भी हमको उन्ही जादुई दुनिया में ले जाती हैं !! वो नोवेल भी खूब शौक़ से पढ़ती थीं ...., कुछ तो आ भी रखीं हैं !!
          मेरे किताबों के खजाने में एक और किताब अपनी संख्या बाधा रही है ..." विपाशा " जी हाँ उस पत्रिका का नाम है !! मुझे कई विशेषांक भी मिले हैं उसके !!
          वस्तुतः हम जब किसी चीज़ को पाना चाहते हैं और वो बिना किस मशक्कत के मिल जाये तो "यादगार" नहीं बनती !
          यद्यपि  , कमियों में पूरे किये गए अच्छे  शौक़ ... शौक़ नहीं रहते .... उनको पूरा करने  का जूनून और किये गए प्रयास तथापि जीवन के " मार्गदर्शक " हो जाते हैं !!