नीलम जा जरा रामभरोसे की दूकान से थोडा जा जामन ले आना ... कल के लिए दही जमानी है ....! जी हाँ ये और कुछ वाक्य मिले जुले वाक्य हम सबने अपने बचपन में सुने होंगे बस नाम बदल दीजिये अपने लिए ही लगते हैं..... !
आपके पड़ोस मैं खुली छोटी सी दूकान जिस पर वो हर सामन मिलता है जो हमारे लिए कभी कभी बेहद कीमती और आवयशक हो जाते हैं .... रात हो या दिन . ... तपती दोपहर हो या फिर सर्दी की ठिठुरती रात ....और सुबह सुबह का वक़्त ... जब जब छोटी किन्तु अतिआवय्श्यक चीजों के लिए हम रामभरोसे की दूकान पर आश्रित होते हैं... एक तरीके से हमें घर को समय समय पर इसकी ज़रूर्तात होती है और वो काम आता है ..... ! हर ज़रूरत... कभी कभी तो हम अपनी ज़रूरत उसको बता करके उसको पूरा करने की अपील करते हैं ...और वो करता है....!!
रामभरोसे अब छुपने लगा है... या ये कहें की रामभरोसे की दूकान धीरे धीरे उनकी दूकान बंद होने लगी है ... जी हाँ एक समय ये आ जायेगा की वो विलुप्त हो जाने वाला है ... क्यों की ....बस उसकी दूकान के बस थोड़ी ही दुरी पर एक " माल " बनाने की योजना बन रही है... बिलकुल नई पीढ़ी छोटी दूकान पर जाने को शर्म महसूस करती है ... हाँ माल मैं जाती है... और उसको ही मूल मानती है जिसे सहारे जीवन चलेगा ... मोटी तनख्वाह पर खर्चा करना उनको आता है... किन्तु ...कुछ और बहुत कुछ इन माल के ज़रिये पूरा नहीं हो सकता है .... ....याद कीजिये कभी एसा समय आया होगा आपके भी घर पर ...अचानक मेहमान आ गए हो और घर पर नकद पैसे नहीं .. क्यों की आज कल तो डेबिट और क्रेडिट कार्ड का चलन है ना... रामभरोसे से ही नमकीन बिस्किट ले कर आये होने और ...उसने बिना पैसे के दिया होगा सब.... ये कह कर की आपके मेहमान मेरे मेहमान ... बाद मैं हिसाब करते हैं... अभी उन्हें देखिये ......
ये " माल " मैं संभव नहीं...... सब ज़रूरी है , रामभरोसे भी और माल भी बस दोनों को सहेजने की ज़रुरत है ..... आधुनिकता के सहारे के बिना चला भी नहीं जा सकता किन्तु अपने मूल छोड़ कर भी सांस लेना भी संभव नहीं ... आइये सहजें दोनों को ....और जी सकें !!
- मनीष सिंह