Wednesday, January 29, 2014

एक कहानी : ये आकाशवाणी है !!

                         " ये आकाशवाणी है , अब आप नवीन कुमार से समाचार सुनिये ! "

            सरकारी नौकरी ,सरकारी गाड़ी ,सरकारी ठाठ बाट और समाज में प्रतिष्ठा सब थे नवीन के पास किन्तु उसे गाहे बगाहे लगता था कि ये सब  किस काम का ? रोज़ आकाशवाणी भवन से अपने घर और घर से फिर पास के ढाबे वाले के पास जाने के रास्ते  में ये सोचता जाता था !

मैं किसके लिए हूँ ?

क्यों कर रहा हूँ ये सब ?

क्या है मेरा संसार ?   

कार में पड़े अखबार को देखता जा रहा था सोचते सोचते !

शाम के साढ़े सात बजते होंगे !

नवीन सात बजे का बुलेटिन पढ़ कर सरकारी गाड़ी से ढाबे कि तरफ चल दिया !

समाचार बाबू आज क्या खायेंगे ? ढाबे वाले सरदार जी ने बड़े अदब से कार से उतरते हुए नवीन से पुछा !

     नवीन ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया : सरदार जी आज सर में हल्का सा दर्द है , एक कप चाय पिला दीजिये पहले , खाना फिर जो आप खिला दें ! अगला बुलेटिन रात ११ बजे पढ़ना है ,बहुत टाइम है !

हाँ हां , अभी लो  कहते हुए सरदार जी ने खुद चाय का बर्तन उठा लिया !

अमूमन उनके ढाबे में काम करने वाले बहुत से लड़के ये सब काम देखते हैं और सरदार जी केवल गल्ला सम्भालते हैं !

नवीन को प्यार जो करते हैं तब से जब वो हाफ नेकर में उनके पास तंदूरी रोटियां सिकवाने आया करता था !तकरीबन १५ सालों पहले अपनी नानी के साथ ! अब ना तो नहीं रहीं और ना माँ ! 
पिता का साया बचपन में नहीं रहा , माँ ने दूसरी शादी कर ली ! घर को किराये पर दे दिया और नवीन को पास के होस्टल में रख छोड़ा ! होस्टल का खर्च कनाडा से ही भेजती रहती थी कुछ सालों तक ! जब वो बंद हो गया तो सरदार जी ने नवीन का साथ दिया , अब भी दे रहे हैं !

जनवरी के महीने कि सर्द शाम ,हवा और धुंध के साथ सर्द हो चली थी !

तभी , दूर बैठे एक साधू ने नवीन से अपने पास आने को कहा !

नवीन : आप मुझे बुला रहे हैं बाबा ?

साधू : हाँ बेटा !

नवीन साधू के पास जा कर चारपाई पर बैठ गया और बोला : जी , बाबा !

साधू : सर में दर्द कब से है ?

नवीन : बस सुबह से ही है , आज दिन भर थोड़ी थकावट भी रही !

साधू : अरे बेटा रोज़ सवेरे तुम्हारी आवाज से हमारा दिन निकलता है ! दिन दुनिया कि खबर लगती है ! संसार में क्या चल रहा है सब पता चलता है ! चाहे कही भी रहे , यहाँ या फिर हरिद्वार , तुम से जुड़े रहते हैं ! ऐसा लगता ही नहीं कि हम किसी को नहीं जानते ! सब दुनिया हमारी है , ऐसा ही एहसास रहता है ! एक तो तुम्हारी आवाज़ इतना अपनत्व लिए है और फिर तुम समाचार ऐसे पढते हो कि हर सुनने वाले को लगता है कि उसके ही लिए पढ़ा जा रहा हो !

नवीन मुस्कुरा रहा था और बार बार अपने सर पर हाथ रखता जाता था , दर्द के कारण ! साधू बोलते जा रहे थे !

अभी कल ही मैं हरिद्वार से लौट रहा था , गाड़ी में लगे रेडिओ पर तुम्हारी आवाज़ सुनी सब संसार के समाचार मिल गए वर्ना चार दिन से गंगा किनारे धुनि रमाये कहाँ कुछ खबर थी !

नवीन ने बाबा को टोकते हुए पुछा : बाबा आप तो साधू हैं , फिर संसार कि खबर आपके किस काम कि होती होगी ?

साधू हल्का मुस्कुराते हुए बोले : बेटा जब कोई ये कहे कि मैं संसार से दूर हो रहा हूँ समझो और करीब आने कि कोशिश में है ! क्यों कि वो याद रखता है कि उसको संसार से दूर रहना है ! एक विज्ञापन भी आजकल सुना है मैंने " जितना दूर जाओगे , अपनों के उतने करीब आओगे ! "

नवीन अपना सरदर्द भूल चूका था ! चाय कि चुस्कियों का आनंद लेते साथ एफ एम् पर चले पुराने गानो कि धुन के शाम को और लम्बा होने इच्छा जगा रही थी लेकिन घडी कि सुइयां कहती थीं कि समय के साथ चलो !

ये कप ले के जाऊं नवीन भैया ? छोटे लड़के ने नवीन से पुछा !

नवीन जैसे चलती ट्रेन में अचानक लगे झटके के साथ काँप गया और बोला : हाँ हाँ , कप रख कर मेरे पास आना !

कॉलसेंटर में काम करने वाले कुछ बच्चों कि दो गाड़ियां रोज़ कि तरह ढाबे पर आ कर रुकीं !
हंसी ठहाके ,महंगे महगे मोबाइल ,टेबलेट ,लैपटॉप और सब सुख सुविधाओं वाली चीजों के साथ 
सब ५ रुपये वाली चाय का आनंद ले रहे थे ! संसार कि सारी कीमती चीजें एक तरफ और जनवरी कि सर्द शाम में ढाबे कि ५ रूपए कि चाय एक तरफ होती है लेकिन उनके लिए ही ,जिनका संसार होता है !

नवीन के लिए या सब बे मानी था !

         तीन सालों पहले हुई शादी ! संतान सुख नहीं ! पिछले ६ महीनो से वाईफ मायके में रह रही थी ! मैं और तुम का झमेला ! बस और  कुछ नहीं !
         तभी उन किशोरों में से किसी ने सरदार जी को नवीन से बात करते सुन  लिया और पहचान गए कि वो रेडियो कि आवाज़ वाला नवीन कुमार है !

        बस फिर क्या था अकेलेपन और सन्नाटे से घिरे नवीन के इर्दगिर्द रंगबिरंगे कपड़ों में अब नए लडके लड़कियां खड़े थे !

सर , हम भी आपकी बुलेटिन और दूसरे कार्यकम रेडिओ पर सुनते हैं !  

बल्कि हमारी ट्रैनिंग में कई रेडियो के सीनियर ने हमें टिप्स दिए थे !

आज आप से रूबरू होने का मौका है तो प्लीज़ हम को कुछ गाइड कीजिये !

नवीन अचानक से जैसे सन्नाटे भरी सड़क के सुनसान रस्ते से निकल कर  खचाखच लोगो से भरे गली मोहल्ले में पहुच गया था , ऐसा सोचने लगा और बोला :

देखो दोस्तों तुमलोग मुझसे क्या सीख सकते हो, मैं तो सिर्फ वो पढता हूँ जो मुझे पढ़ने को कहा जाता है लेकिन तुम लोग तो सामने वाले कि समस्या का समाधान करते हो , वो भी सुन्दर तरीके से साफ़ आवाज़ में !

ये सुनकर एक लड़का बोला :लेकिन अपने सही नाम से नहीं ,

आप को आपके नाम से सब जानते हैं सर पर हमें कोई नहीं ! फर्क है !

नवीन : तो फिर एक बात ही शेअर कर सकता हूँ कि जब आपके पास अपना कोई ना हो , हो भी तो दूरी बनाये हुए रहे तब संसार के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए ,
उनके लिए जिनको आप न जानते हों और वो जो आपको ना जानते हों ! रिश्ते जन्म लेंगे किन्तु सीमित समय और दायरे में जो अंतहीन दर्द नहीं देंगे ,

और फिर ये कशिश आपकी आवाज़ में उतरेगी जिसे हर सुनने वाला अपने लिए ,

कहा गया समझ कर आपको याद रखेगा !

नवीन कि आवाज़ सघनता से हर एक के कान में सरक रही थी !

ठंडी हवाओं के झोके एक दूसरे को और करीब ला रहे थे नवीन बोलता जा रहा था  , बे सुध निरंतर कि अचानक सरदारजी ने आवाज़ लगायी :

बच्चो आप सब को देर हो जाएगी और समाचार बाबू को भी तो रात का बुलेटिन पढ़ना है !
लो एक एक कप चाय मेरी तरफ से पियो और काम पर चलो !

नवीन का संसार कितना बड़ा था ये उसे आज खबर लगी ! एक घर ! एक स्टूडियो ! एक ढाबे के सिवाय !

वो जो उसको छोड़ कर दूर चले गए हैं उनका दुःख तो है लेकिन समय के साथ दूरियाँ करीबियत में बदलती हैं , ऐसा विश्वास है !

कुछ ही देर में नवीन स्टूडियो में था , टेक्नीशियन के ओके का इशारा मिलते साथ उसने अपनी आवाज़ का परिंदा संसार के मानस पर लिख देने को " सदैव समर्पण " माध्यम चाहे जो हो !

ये आकाशवाणी है , रात्रि के ११ बजने को हैं     , कल सबेरे फिर मुलाक़ात होगी ……… शुभरात्रि !!