Wednesday, August 15, 2012

जैसे , अधिक काफी की मात्रा ,कड़क ना हो कर कडुवी जाती है !

                  ये ही कोई मध्यरात्री के बाद कुछ एक घंटा बीता होगा ....मैंने घडी देखी हो रात के लगभग एक बज रहे थे .....और मेरी गाड़ी तमिलनाडु में " के कामराज " हवाई अड्डे से पोंडिचेरी ( पुद्दुचेरी ) के लिए निकल रही थी ! सफ़ेद रंग की एम्बेसेडर नोवा गाड़ी थी ....साथ में सफ़ेद रंग के ही परदे लगे थे , एक शानदार और सुहाना सफ़र होने वाला था चेन्ने से पोंद्य्चेरी तक का !!   वैसे तो कई बार गया हूँ वह किन्तु इस् बार का सफ़र रात , नहीं नहीं देर रात का था ! मेरा यान लगभग 2 घंटे विलंबित हो गया था , बंगलुरु में ही एक घंटा रुक गया था !!
                  उस सडक को जिस पर से हमें हो कर गुजरना था को ईस्ट कोस्ट रोड बोलते हैं .....क्यों की वो भारत के सुदूर पूर्वी किनारे - किनारे से गुजरती है ....एक तरफ कभी-कभी अथाह जल लिए समुद्र होता है और दूसरी तरफ सपाट धरातल जिसमे अधिकतर समय धान की बालियाँ लहलहाती मिलती हैं ....सुर्ख हरे रंग में , किन्तु आज में उनके दर्शन नहीं कर सकूंगा क्यों की रात में चन्द्रमा ने अपनी चांदनी से उस सुर्ख हरे रंग को एक अनोखे रंग में तब्दील कर दिया है ....!!
                 तमिलनाडु में आपको स्वयं कोई ना कोई बहाना मिल जायेगा जिस से की आप की धार्मिक आस्था को और बल मिले और आप उनका निर्वहन कर सकें !!  थोड़े थोड़े अंतराल पर आपको नमन करने का अवसर मिल ही जायगा , कही कोई बड़ी ही विशेष कारीगरी और चटक रंगों से बने छोटे बड़े मंदिर मिल जायंगे , अनोखे किन्तु सरल तरीके के गिरजाघर और भी अन्य धार्मिक स्थानों के दर्शन हो जायेंगे ! एक मंदिर तो विशेषतः इस रस्ते पर सिर्फ ड्राईवर लोगो के लिए ही है , वो देवता सब ड्राईवर लोगो के लिए बड़े ही श्रधेय हैं ! पुरे रस्ते पर आपको कच्चे नारियल के तुकडे मिल जायेंगे ...जो की एक ही बार में फोड़े गए होते हैं देवता के सामने !
              लगभग रात के 2 बज चुके थे और मुझे भूख लग रही थी ....मैंने अपने ड्राईवर से कहा " कुछ खिला दीजिये " बोला " सर - आपके लायक इस रोड पर पोंडिचेरी से पहले कोई खाने का स्थान नहीं है .....मैंने कहा भाई कोई ढाबा भी हो तो रोक लेना .....हम आस लगाये आगे बढ़ रहे थे की एक गाँव जैसा रौशनी वाला कुछ दिखाई दिया ....और फिर एक छोटी सी दूकान दिखाई दी जो की रात के 2 बजे भी चल रही थी ....कुछ लोग टेबल पर बैठे थे और चुल्लेह के ऊपर रखे तवे पर से भाप उठती दिखाई दे रही थी !
                  हमने रुक कर पुछा तो पता लगा की डोसा और इडली मिल सकते हैं ....और कहेंगे तो काफी भी मिल जाएगी ....जैसे किसी तपते रेगिस्तान में किसी को कोई ठन्डे पानी के लिए पूछ ले और कहे की कुछ मीठा भी कहेंगे तो कैसी फीलिंग होगी ....बस वैसा ही महसूस किया मैंने और हामी भर दी !! उतर कर हाथ धोये और छोटी सी झोपड़ी नुमा दूकान के भीतर सर झुका कर घुस गए ....सर इस लिए झुकाना पड़ा क्योंकि वी छप्पर इस तरह से बना था की किसी भी 5 फुट के इंसान को झुकाना ही पड़े ....ये सब बारिश और कड़कती धुप से बचने के लिए किया जाता है ...भले ही रात में ये ज्यादा व्यावहारिक ना लगे किन्तु दिन के और बारिश के समय ये ही अतिआवश्यक है ! अन्दर गए - ऑर्डर किया - डोसा ...और काफी ! तमिलनाडु में दरअसल में डोसा नहीं बोला जाता ....वो डोसा को डोसाई बोलते हैं ...छोटे छोटे दो डोसे मेरे सामने थे चटनी और साम्भर के साथ ! कुछ लग सा स्वाद था ! अमूमन हम दिल्ली या उत्तर भारत के शहरों में जिस तरह के डोसे , इडली या साम्भर खाते हैं वो कुछ अलग तरह से होता है ....किन्तु वहां जहाँ पर उसका मूल है , वहां का स्वाद कुछ अलग मिला ....ज्यादा खट्टा , तीखा , कम तेल , चटनी में नारियल और दाल का अधिक्क्य और साथ में एक लाल रंग ली तीखी चटनी ! इडली भी खाई , काफी भी पी , कुछ विशेष बर्तन थे वो ! एक बड़ी कटोरी में उल्टा रखा हुआ गिलास और कटोरी में डाली गयी काफी !! दरअसल ठंडा कर के पीने में आसानी होती हैं इस तरह के बर्तनों में ! खा पी कर आगे चले  , और कुछ पौन घंटे में पुदुचेरी की गलियों में आ गए .....!

          रात के तीन बज रहे थे , यकीन मानिये सड़कों पर सफाई कर्मचारी सफाई कर रहे थे ! पूरी की पूरी सड़कों पर सफाई का काम चल रहा था !! मुझे लगा शायद कल कोई बड़ा नेता या अधिकारी आने वाला होगा तो ये सब हो रहा होगा , किन्तु जब सत्यता पता लगी तो यकीन ही नहीं हुआ !! दरअसल पोंद्य्चेरी में आज भी कुछ नियम पुराने समय के चल रहे हैं ....ये एसा मानिये जो नियम पुराने समय में अच्छे थे को वहां के नगर निगम ने वसा का वैसा ही स्वीकार कर लिया है !!  दरअसल पांडिचेरी में पुराने समय से ही रात में सडकों की सफाई हो जाती थी और आज भारत और पोंडिचेरी के आज़ाद होने के भी भी वोही चल रहा है ....रात में सड़कों पर करीने से सफाई होती है , पानी  छिड़का जाता है , कूड़ा उठाया जाता है ...ताकि जब आप सुबह को अपने अपने गंतव्य की तरफ जाएँ तो आपको एक स्फूर्ति भरा वातावरण मिले ! सुगन्धित वातावरण मिले !  ये उन सफाई कर्मचारियों के लिए भी ज़रूरी और अच्छा है , उनको रात में किसी भी प्रकार से ट्रेफिक का सामना नहीं करना होता और नागरिकों को धुल मिटटी , दुर्गन्ध से सामना नहीं करना होता !  मुझे ये बहुत ही मनभावन लगा ! हमारे अन्य शहरों को भी कुछ इस तरह के इन्तेजाम करने की सम्भावनाये सोचनी चाहिए !! जो अधिकारी नए नए अपने अपने पदभार संभाल रहे हैं उनको कुछ अच्छी सोच को प्रयोगात्मक रूप में पहल / चलन में लाना चाहिए !!

संवेदनशीलता ,जबतक प्रायोगिक ना हो परिभाषित नहीं करी जा सकती !                                           

अधिक  प्रयोगात्मकता , संवेदनहीनता का उदाहरण बन भी सकती है !! 

जैसे , अधिक काफी की मात्रा ,कड़क ना हो कर कडुवी जाती है !      

Monday, August 13, 2012

" बाइस्कोप " में तो बस समर्पण ही समर्पण है !!


            " बाईस्कोप " -   जो लोग 35 से 40 वर्षो के हो चले होंगे उनको इस शब्द से अनजानेपन का कोई कम्पन नहीं महसूस हो रहा होगा !!

             तब में शायद पांचवी ये छठी क्लास में पढता रहा होऊंगा तब की ही बात है ! घंटाघर के रामलीला मैदान पर हर साल की ही तरह दशेहरे के मौके पर "मेला " लगा था ! पुरे मौहल्ले से टोली की टोली जा रही थी घूमने के लिए !! बुजुर्गों की , युवाओं की , किशोरों की , घर की महिलाओं की और उनके साथ बच्चों की .... ! कोई बहुत ज्यादा रूपए पैसों को ज़रुरत नहीं होती थी उन दिनों , बस कुछ खास मौकों पर पहनने वाले कपडे और 100 - 200 रुपए ....बहुत हुआ करते थे  !!
               कहीं समोसे , कहीं आलू की टिक्की , कही फेनियाँ , कही पर सुगन्धित केवड़े वाला दूध वो भी कुल्हड़ में , कहीं चाट , कहीं फलों की चाट , कहीं पूरा खाना , कहीं गोलगप्पे और फिर झूलों की बारी ....सर्कस , मौत का कुआँ और चलता फिरता स्टूडियो  - इम्पाला में फोटो खिच्वाइये या फिर कश्मीरी पोशाक में .....बिलकुल पता ही नहीं चलेगा की आप ही कभी कश्मीर गए थे या विदेश में कब घूम कर आये ! कहीं गुब्बारे , कहीं तरह तरह की सीटियाँ, विशेष तरह के खिलौने , चीनी मिटटी के बने बर्तन ....और अचार रखने वाली बर्रनी !  अत्यंत धार्मिक पुस्तकों की दूकान , कपड़ों की दूकान , रंग बिरंगी मिठाइयों की दूकान ! साथ में कभी कभी उद्घोषणा करते भोपू - भाइयों और बहनों ...आज हनुमान जी को सीता मैया अपनी स्मृति चिन्ह के रूप में अपनी " चूड़ामणि " देंगी ...आइये और रामलीला का आनंद लीजिये ...मंच सज चूका है और राखी कुर्सियां आपकी प्रथीक्चा कर रही हैं ......अब बड़ी ही संजीदगी से कहता हूँ ....भी इतने भीड़ भरे मेले में से शायद ही १० प्रतिशत लोग इस आवाज को सुन पते होंगे और जितनो ने सुना उनमे से ३ प्रतिशत लोग वहां जा कर राम लीला देखते होंगे ....हाँ जो बैठे होते हैं उनको अपनी थकान मिटानी होती थी तो बैठ कर सुस्ता लेते होंगे ....रामलीला कौन मन से देखता है ....सबके अपने घरों में ही लीला कुछ कम होती है क्या ....और इसे मौकों पर लोग अपने रोज़मर्रा के झंझटो से थोडा सुकून पाने के लिए जाते हैं और वहां भी वो ही तनाव देखने को मिले तो ..........कम से कम मैं तो नहीं देखता था......हाँ देखता था एक विशेष चीज़ ......" बाइस्कोप "

          आजकल कभी कभी दिख जाता है .....किन्तु देखा नहीं जाता !!

                 बहुत दूर हो गए हैं हम इस से ....! इसमें होता था , दिल्ली का कुतुबमीनार , अगरे का ताजमहल , गोलकुंडा का गुम्बद , काशी का कशिविश्वनाथ मंदिर , दिल्ली का बिरला मंदिर, मुंबई - तब बॉम्बे का गेट वे ऑफ़ इंडिया , दिल्ली का इंडिया गेट ! राष्ट्रपति भवन , लाल किला और ना जाने क्या क्या ! एक मोड़ के रखे जा सकने वाले टेबल पे रखा हुआ एक एक तरफ से त्रिभुजाकार बक्सा ....जिसमे तीन तरफ छोटे छोटे गोल गोल छेद होते हैं ....जिनमे से अन्दर झाँक कर देखा जा सकता है !!  और अन्दर बेटरी  से जलने वाला बल्ब लगा होता है ... जिससे सब साफ़ दीखता है ....और बक्से के ठीक ऊपर एक गोल घुमाने वाला लीवर होता है जिसके एक किनारे पर अन्दर लाल किले से ले कर कुतुबमीनार तक की रील बंधी होती है ....जो बस एक चोर से दुसरे चोर पर कोई ५ मिनट में आ जाती है ...और सब देखने वाले पुरे भारत के दर्शन कर लेते हैं ....जबकि आज कल सन २०१२ में भी भारत में सबसे तेज़ चलने वाली उत्तर रेलवे की मुंबई राजधानी ( भोपाल शताब्दी को छोड़ कर ) से भी लगभग १६ से १७ घंटे लगते हैं ......!! वह कमाल है .....ना ना था ,,,,,,,,,उन दिनों ....   
                        आजकल बाइस्कोप तो है ...हर एक के पास किन्तु उसमे सिर्फ अपने मतलब के चित्र लगे हुए हैं या लोग अपने मतलब के ही चुनिदा चित्र लगाते हैं ....देखते भी खुद हैं और परिवर्तन भी खुद के लिए ही अनुमोदित करते हैं ....किन्तु लाभ का जब भी सरोकार होता है तो वो सब सामान्य से अलग वर्गों के मुताबिक ही चाहिए ....तब उन्हें अलगाव पसंद है ...किन्तु जब संज्ञात्मक या प्रचारात्मक द्रष्टिकोण हो तो बाइस्कोप में सिर्फ अपने मतलब के ही चित्र चाहिए .....वो जो बाइस्कोप चला कर दिखता है शायद वो स्वयं उन जगहों / तजुर्बों से मुखातिब ना हुआ हो जिनको वो सलीके से दिखा रहा होता है ....किन्तु जब वो आपको वो सब दिखता है हो एक मंझे हुए खिलाडी की तरह व्यवहार करता है ताकी उसपर विशवास बना रहे और मनोरंजन एवं मुलाकातों का रिश्ता बना रहे , हर अगली मुलाक़ात पर वो इसे और सुदृढ़ करने की कोशिश करता है .....भले ही कुछ बचपन से साथी बड़े हो रहे हों और दुनियादारी के साथ साथ मौकापरस्ती से ग्रसित हों.....!!
           बाइस्कोप में जड़ता होती है ....किन्तु अविरलता के साथ साथ ....जिसका हर नयन के जोड़े को पता होता है किन्तु फिर भी वो देखता है .....क्यों .....क्यों की वो चाहता है की जीवन की सतत तरलता का गीलापन कभी कभी सघनता को  तलाशता है , हाँ समर्पण के साथ , " बाइस्कोप " में तो बस समर्पण ही समर्पण है ....पूर्णतः !!