" सवेरा रोज़ होता हो ,सलोनी किरणें आती हों ,
अनोखी रात तारों संग ,कहीं गुमसुम हो जाती है !
हज़ारों मीत मिलते हैं ,नए अंकुर सजाने को ,
पलों को थाम लेते हम , ये ही सपने संजोते हैं !!
समय की ओस की बूंदों से बंधन शिथिल होते हैं,
चाहे कितनी सजाई हों , वो शामें ढल ही जाती हैं !! "
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