Saturday, September 22, 2012

..... चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है !

             याद कीजिये अपनी क्लास 2 की उस हाफ पैंट को जिसपर की कोई भी क्रीज़ नहीं होती थी और बेल्ट स्कूल के ही बिल्ले के साथ इंतनी टाईट बंधी होती थी की सुबह सुबह के खाली पेट मे भी आधा पराठा ठीक से नहीं जा पता था और इतनी सलवटें की पैंट ...पैंट कम झोला ज्यादा लगती थी ....और हम उसी में खुश थे , चिंता थी तो बस इस्कूल में प्रार्थना के शुरू होने से पहले पहुच सकें ...वरना लेट आने वाले बच्चों की लाइन में लगना पड़ेगा ....और अगर एक बार भी एसा हुआ तो फिर पहले क्लास टीचर , फिर प्रिन्सिप्ल और अंत में पूरी क्लास में छुट्टी की घन्टी बजने तक पूरी कलास के दिन भर दिए जाने वाले ताने ....बाप रे बाप कितना जुल्म था उन दिनों ....!! ये ही चिंता थी बस लेनिन उन उन् दिनों !
           समय बीता अपने पास का ज्यमितिये बक्सा और उस में का सामान पूरा होने की चिंता ...एक दो चिली हुई पेन्सिल ज्यादा रख लेते थे ताकि पिरीअड में दिक्कत ना हो ! दसवीं से समय रात दिन की पढ़ाई ....और फिर इस्कूल के रस्ते में मिलने वाली कोई .....जिसको हमारे जन्नाने में हम खूब अछे लगते थे से भेंट ...बस निगाह भर .....! जूते मोज़े सजीले होते थे , अगर तै का चलन होता तो वो हमेशा सीधी होती / या होनी चाहिए ...! फिर परिणाम की चिंता और जल्दी से परिणाम आजाये तो फिर कुछ वोकेशनल कोर्स की तलाश ...अ फिर बारहवीं में एड्मिसन की चिंता ...क्या पता कम प्रतिशत में विज्ञान मिलेगा भी की नहीं ...भले हम विज्ञान केलायक ना हों किन्तु एक दोस्त ने वो विषये चुना हो तो हम भी वो ही लेंगे ....ना मिल्पाये तो कला से ही डिग्री पा लेंगे या सोच कर कम से कालेज में दाखिला तो मिले !! कुछ और बड़े हुए तो ...जूते छोटे होगये ...बदलने की चिंता किन्तु लकी होने के कारन उन्हें छोड़ने का मोह और नए कैसे होंगे की चिंता ....! गग्रेज़ुएत हो जाएँ तो बस कोई नौकरी मिल जाने की चिंता !! नुकरी मिली तो हम दिशाहीन !! क्या ये ही सही रहेगा अपने लिए ...की चिंता !! घर को खूब सजा देंगे ...के लिए कुछ नया खरीदें लिकिन हात में अपने पैसे न होने की चिंता ....कैसे कुछ ज़यादा कमाया जाए ...की चिंता !! चलिए अब जब नौकरी मिल जाये तो जहाँ हैं वहां से और ऊपर की और की तरक्की की चिंता , चलो तरक्कि भी हो गयी ...तो वंश की चिंता .... शादी ब्याह हो जाये उसका अपना आनंद जिम्मेदारिओं का और चिंता के स्तर का , उपलब्धियों का !

            मैं यहाँ एक विशेष समय को लेकर ज्यादा केन्द्रित हूँ की ये सही है की समय , आयु और संबंधों के साथ साथ आपकी चिंताएं बदलती और घटती और बढाती रहती हैं ....जिनको समझदारी से निभाया और पूरा किया जाता है ....फिर भी एक समय होता है आपके जीवन में जब आपको कोई चिंता नहीं होती और सब आपकी चिंता करते हैं ....पर उस समय को सब लोग नहीं जी पाते ....आइये उस पर बात करते हैं .....
        
          पिता जी , माँ सब ध्यान से आपके हर सामान को जुटाने में लगे होते हैं ...और आपके सामने आते ही आप किसी ना किसी बात पर उसमे नुक्स मिकल देते हैं ... रंग अच्छा नहीं है ड्रेस का , जूते इसे नहीं वैसे वाले चाहिए थे, कल टिफिन नहीं केक ले जाने का मन है ....आज दूध नहीं पियूँगा , सेब अच्छा नहीं लगता , घिया बाप रे ये किस चीज़ की सब्जी बना कर रख दी , दाल ओहो हो ..मुझे दाल नहीं खानी ..कढी में से खट्टी खट्टी बदबू आती है ....अनार इसके दाने आपने धोये क्यों नहीं ...? कल ही तो ये टी शर्ट पहनी थी आज दूसरी दो , आप ने मेरी चाकलेट तोड़ी क्यों ? मुझे साबुत खानी है ....! टेबल का लेम्प ज्यादा रौशनी देता है ...लो वोल्ट का बल्ब लगाइए तो पढूंगा !! पेंसिल छोटी हो गई है ....दूसरी दीजिये , रबर सफ़ेद होगी तो ही स्कूल जाऊंगा !! मेरे ग्लास से दीदी , भैया ने क्यों पानी पिया ....मुझे नया ला कर दो !! पहले टीवी पर कार्टून लगाओ तब डिन्नर खाऊंगा ! पहले बोलो की कल मुझे वहां ले चलोगे तो होमे वर्क करूँगा .....और अंत में आप घोडा बनो मुझ को घुमाओ नहीं तो में सोऊंगा नहीं .....और ना जाने क्या क्या ....!!
         जिन लोगो ने ये सब या इस से भी ज्यादा सुख और करीबियत का आनंद लिया है ...उनको बधाई ...! किन्तु सब लोग इस प्रकार के सुख लायक अपने को नहीं पाते .... जो है बस वो ही है ....विकल्प नहीं ....कोई !!
         चिंताएं सर्वदा ही परिष्कृत होती रहती है ...किन्तु अवय्श्क ये है की उनको जिया जाए उनके मूल स्वरुप में , निभाया जाये , संप्रेषित किया जाए उन तक जिनको आभास तक नहीं उनका ...किन्तु संवेदना के साथ , विनय के साथ , आभार के साथ ....समर्पण के साथ ....!!

Wednesday, September 19, 2012

..... हम सब एक सफ़र पर ही तो हैं !! ....यात्रा और मेरी भावनात्मक उपलब्धि !!

               हम सब ....जी हाँ ...हम सब अपनी अपनी सभी भौतिक उपलब्धियों के विषय में जब भी मौका मिलता है ज़रूर अपने अपनों के साथ चर्चा करते हैं !!

                  आइये में आज अपनी भवनात्मक और स्नेहात्मक उपलब्धि के विषय में आपसे बातें करता हूँ ......!! ये कोई 8 दिनों पहले की बात है ...दोपहर के कोई सवा तीन बजे का वक़्त हो रहा था मैं और मेरे एक सहयोगी अधिकारिक कार्य से कलकत्ता जाने की तय्यारी में थे ...वो ग्रेटर नॉएडा से और में गाज़ियाबाद से दिल्ली के इंदिरा गाँधी अन्तरराष्ट्रीये हवाई अड्डे पर पहुचे ! अपने उड़नखटोले में पहुचने तक जो भी नियमावली के अनुसार काम करना होता है हमने किया और लाइन लगा कर अपने उड़नखटोले में सवार हो गए ! 
               उड़ान थी इंडिगो की 6इ - 365 और हमारी सीट थे 2बी और 2सी , मैं किनारे वाली सीट पर बैठ गया ! एक एक कर के हमारे साथ कलकत्ता के लिए उड़ने वाले लोग आ रहे थे और अपने अपने नियत स्थान पर विराज रहे थे ! कितना अनोखा और नित नवीन नज़ारा होता है वो ....मैं तो हमेशा पूरी यात्रा का बस वो समय ही जीता हूँ जब मैं अपनी सीट पर बैठ कर आने वाले सब लोगो को देखता हूँ ....सच में अनोखा अनुभव होता है ! विभिन्नं प्रकार के पोषकों में , विभिन्न तरह के केश सवारे हुए , हर एक के चहरे पर अलग अलग तरह की भावनाए और गरिमा का मिश्रित तेज़ ....होता है ... वायुयान में सफ़र करना कम से कम भारत में तो अभी 2012 तक का सबसे महंगा सार्वजनिक सफ़र है ....इस लिए भी ...किन्तु जब आगंतुक दरवाज़े पर आ कर देखता है की उस से पहले से कई लोग वहां बैठे हैं तो वो नवीनता
और अपने को विशेष स्तर का समझने का भाव गुल होजाता है और चहरे पर कुछ मिश्रित भाव निर्मित होते हैं !!

            में अपनी सीट आर बैठ कर सब को देख रहा था की अचानक मुझे लगा की ये चेहरा मैंने पहले भी कभी देखा है .....मैं सोच में पड़ गया .....एक साधारण सी महिला ...सफ़ेद बालों की लम्बी चोटी बनाये हुए , माथे पर चन्दन का तिलक , हाथ में सोने का कंगन , और दुसरे हाथ में सुनहरी घडी , मुह में पान .... खाते हुए धीरे धीरे मेरी और बढ़ी ...और मेरे से अगली सीट पर बैठ गयीं ....उनके हाथ में एक पर्स भी था ...क्रीम रंग का ! उनके साथ एक और युवती थीं !
             मैं इस उधेड़बुन में लग गया की इनको कहाँ देखा है और मुझे वो याद क्यों नहीं आ रहा ...की अचानक याद आया ...मैंने अपने साथी से कहा ...ये मशहूर शाश्त्रीय गाइका श्रध्ये गिरिजा देवी जी हैं और में उनका आशीर्वाद लेना चाहता हूँ ...! मैं अपने को रोक नहीं सक रहा था ! मैंने उनके साथ की युवती से आखिरकार पूछ ही लिया ...ये वो ही हैं ना ? उन्होंने मुस्कुराते हुए हां में अपना सर हिला दिया ....बस फिर क्या था ....मैंने  गिरिजा जी के चरण स्पर्श किये और आग्रह किया की उनके साथ एक चित्र लेना चाहता हूँ ....उन्होंने अनुमति दे दी ...और मैं उनके चरणों में बैठ गया ...और उस युवती से ही चित्र लेने को कहा ...और बस हो गया !! वो चित्र आपके लिए संलंग्न है इस ब्लॉग के साथ !! गिरिजा जी के विषये में बहुत सी जानकारियां नेट पर उपलब्ध हैं ! एक लिंक आप के लिए !  Girija Devi - Wikipedia, the free encyclopedia

           फिर वो 2.30 घंटो का सफ़र इतना उर्जा भरा रहा की ...थकान काफूर हो गयी और हैं उत्साहित होते गए ...गिरिजा जी का सानिध्य पा कर ! एक गरिमावान एवं आदरणीयों का साथ अपनों भी सही दिशा की और अग्रसर करता है , जैसे जो कुछ गंधी दे नहीं हो हूँ बास सू बास !! खुशबू रखने वाले का साथ भर हो तो भी आप स्वयं को खुशबू के वातावरण में ही पाते हैं !!

        ये मेरी भावनात्मक उपलब्धि थी !! यात्रा संस्मरण लिखता रहूँगा और यात्राएं करता रहूँगा .......हम सब एक सफ़र पर ही तो हैं !!
                                                                    -- ::  आपका मनीष