Thursday, June 27, 2013

एक कहानी : हाईवे !!

                                तेज़ हवाओं और धूल का दौर अभी अभी ख़तम हुआ था !

         हलकी बूंदा बांदी होने लगी थी ! करण अपनी 2nd हैण्ड मारुती 800 के सामने वाले शीशे को साफ़ करने के लिए हाई वे के किनारे रुक कर कपड़ा ढूँढने लगा ! कपडा  डेशबोर्ड में मिला !
शीशा साफ़ कर के चलने को हुआ की पीछे से एक १६  - १८ साल के लड़के ने उसे पुकारा :

Excuse me सर !

करण ने पीछे मुड़ कर देखा : कौन ?

सर , मैं अनिरुद्ध हूँ !

करण : ओके, मुझ से क्या चाहते हो ?

अनिरुद्ध : सर अगर पुणे तक जा रहे हों तो मुझे भी बस पुणे के एंट्री पर ड्राप कर दें तो मेहेरबानी होगी ! मैं किराया दे सकता हूँ सर लेकिन मौसम खराब होने के कारण कोई बस नहीं आ रही और मेरे पास ये एक ही ड्रेस है जो गन्दी हो सकती है , काम पर पहुचने तक !

वो सब कह गया एक सांस में !

करण हलकी सी मुस्कुराहट के साथ सब सुनता रहा !

करण ने बिना एक मिनट लगाये उसको कहा : ठीक है अन्दर आ जाओ !

और  दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोल दिया ! 

अनिरुद्ध अन्दर बैठ गया !

            बहार का मौसम काफी खराब हो चूका था ! तेज़ बारिश और हवा के करण कार चलाना मुश्किल हो रहा था ! कुछ भी साफ़ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था !

अनिरुद्ध शांत लेकिन बेचैन सा सावधान सा बैठा था !

कभी वो करण को देखता तो कभी बहार सामने पड़ने वाली बारिश की बूंदों को !

बीच बीच में बगल से बड़े बड़े ट्रक और गाड़िया तेज़ रफ़्तार से निकल जाती थी ! 

संतोष और बेचैनी का अजीब सा सन्नाटे वाला समय था उन दोनों के लिए कार के अन्दर !

       करण ने ऍफ़ एम् का कोई स्टेशन ट्यून करने की कोशिश करी ! मौसम के कारण सिर्फ घरघराहट के कुछ भी सुनाई नहीं देता था ! काफी कोशिश के बाद उसने कोशिश बंद कर दी और हंसते हुए अनिरुद्ध की तरफ देखा ! दोनों मुस्कुरा दिए ! कार अपनी धीमी रफ़्तार से पुणे की और बढ़ रही थी !
      लगभग 15 मिनट की ख़ामोशी के बाद करण ने अनिरुद्ध से पुछा : कहाँ रहते हो ?

अनिरुद्ध : सर, बस जहाँ से आपके साथ हूँ वह्नी हाई वे से नीचे की तरफ कोई २ किलोमीटर पगडंडी के रस्ते पर मेरा गाँव है !

करन : वहां सड़क नहीं है ?

अनिरुद्ध : है सर , लेकिन सड़क से कुछ दूरी बढ़ जाती है तो बाइक और पैदल सब लोग ईसिस रस्ते से जाते हैं !

करण : हम्म !! क्या करते हो ?

अनिरुद्ध :  सर , ओपन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएसन कर रहा हूँ ! सब्जेक्ट इकोनोमिक्स हैं !

करण : अच्छी बात है ! अब कहाँ जा रहे हो !

अनिरुद्ध जैसे ही  बोलने को हुआ करन का मोबाईल बज उठा !

करण  : हाँ बोलो भाई !

कारन की पत्नी थी दूसरी तरफ से ! करण को उसकी वाइफ़ ने बताया की आगे पुणे हाई वे पर एक बड़ा सा हादसा हुआ है इस लिए जाम लग गया है !

करण  की वाइफ़ : तुम कहाँ हो इस वक़्त ?

करण : अब पता नहीं चल रहा , रुको देखता हूँ गाड़ी रोक कर !

करण ने अनिरुद्ध को बताया की उसकी वाईफ ने खबर दी है की आगे जाम है और हम शायद फंस चुके हैं जाम में ! आगे जाम और पीछे से गाड़ियों का रेला , कार मोड़ कर वापस जाने का कोई चांस नहीं !  बस चलते रहना होगा !

करण अपनी वाइफ़ से बोला : हमें अभी जाम नहीं मिला है और पीछे हम जा नहीं सकते ...इस लिए अब जो भी हो पुणे तो पहुचना ही होगा , तुम चिंता मत करो , और बार बार फ़ोन मत करना मैं वहां पहुच कर खुद कन्फर्म कर दूंगा , चलो बाय !

करण के चहरे पर थोड़ी शिकन आ चुकी थी ! शायद मीटिंग में देर से या फिर न पहुचने की शंका थी ! इधर अनिरुद्ध भी परेशान था ! सबरे जल्दी निकला था की 8 बजे की शिफ्ट पर टाइम पर पहुच जाएगा तो एक दिन की तनख्वाह नहीं कटेगी , लेकिन शायद ये भी संभव नहीं दिखाई दे रहा था उसको भी !

कार में फिर से ख़ामोशी !  शीशों पर पड़ती बारिश की बूंदों की आवाजें आज अच्छी नहीं लग रही थी ! गर्मी से तपते वातावरण में खुशनुमा सुगंध तो थी लेकिन दोनों का मानस चिंता में था !उलझन में था ! 

अब कार की गति और धीमी हो चुकी थी ! आगे सब रुके थे जो इनको तेजी से पीछे छोड़ कर आगे निकल गए थे वो भी कशमकश में थे !

करण ने अनिरुद्ध को देखा और दोनों फिर से मुस्कुरा दिए ! जैसे कह रहे हों भाई अब तो साथ पुणे तक है ही चाहे जो हो !

तभी अचानक करण को जैसे कुछ याद हो आया हो और अनिरुद्ध से बोला : तुमने बताया नहीं की कहाँ जा रहे हो ?

अनिरुद्ध : सर पुणे में एक तीन स्टार होटल में सर्विस बॉय का काम करता हूँ , सबेरे आठ बजे से शाम के आठ बजे तक !

करण : ने अपनी कलाई की घडी की तरफ देखा और बोला : अरे आज तो तुम समय से नहीं पहुच सकोगे  ! देखो 10 तो यहीं बज गए और पता नहीं कब तक रुकना पड़े !

अनिरुद्ध : हाँ सर आज तो हम दोनों परेशान हो गए !

करण : तुम्हे आज की सेलेरी नहीं मिलेगी ?

अनिरुद्ध कुछ नहीं बोला बस सर झुका लिया !

कार की छत पर बारिश की आवाज़ तेज़ हो चली थी  ! अन्दर भी जोर दे कर बोलना पद रहा था !

करण  : घर पर कौन है तुम्हारे ?  वैसे अब हम दोस्त हो गए हैं तो ये जान सकते हैं ! संकोच हो तो कोई बात नहीं !

अनिरुद्ध : अरे नहीं सर , अब हम दोस्त हैं और सफ़र लम्बा होगया है ! एक दुसरे को जान लेना लाज़मी हो गया है अब ! मेरे घर पर एक छोटी बहन है , पिता जी हैं और दादी है ! माँ नहीं है ! हम सब साथ रहते हैं ! पिता जी शुरू से ही घर पर रहे और खेतीबाड़ी का काम देखा और हम भी इसी कारण गाँव में , गाँव की रफ़्तार से ही प्रगति कर सके ! बाकि चाचा लोग बहार शहर में रहते हैं और सब ठीक ठाक हैं !

करण  सब सुन रहा था , अनमने ढंग से जैसे उसको तो बस रास्ता ख़तम होने की चिंता थी ! लेकिन अनिरुद्ध सब सही सही बता रहा है !

करण  : अच्छा !

अनिरुद्ध : सर आप क्या करते हैं और आपके घर पर ......!!

करण हलकी मुस्कान से अनिरुद्ध को देखते हुए बोलने लगा ! : हम बेसिकली चंडीगढ़ से हैं ! मुंबई में अपना घर है और मैं काम भी वहीँ करता हूँ ! एक मल्टीनेशनल कंपनी में ! ये मारुती तो हमारे सर्वेंट की है वो सब्जी और घर के काम के लिए इस्तेमाल करता है ! हमारे पास तीन बड़ी गाड़ियाँ हैं !

अनिरुद्ध ध्यान से सब सुन रहा था ! बारिश कम थी इस लिए आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी ! कभी कभी बीच बीच में सड़क पर देख लेते थे की रास्ता खुला की नहीं ! कारन बोलता जा रहा था !

करण : आज तीनो गाड़ियाँ सर्विस पर दी हैं और मुझे अर्जेंट यहाँ पुणे एक मीटिंग में आना था इस लिए ये ले आया !  घर पर एक माँ और पत्नी है ! पिता जी का देहांत हो चूका है ! रेलवे में बड़े अधिकारी थे ! 25 हज़ार रुपया माँ को उनकी पेंशन आती है !

अनिरुद्ध सोच रहा था और सुन रहा था ! उसने  ने बहार झाँक कर देखा तो घुमावदार सड़क पर रिमझिम बारिश में उनकी कार के पीछे और आगे अनगिनत गाड़ियाँ खड़ी थी ! एक राई के भी बराबर आगे पीछे खासकने की जगह नहीं थी !  आधुनिकता की पराकाष्ठा ये की एक नियत जगह से पहले कोई चाय , बिस्किट वाला नहीं मिलेगा इन हाई वे पर !

दोपहर के २ बज चुके थे !

करण  : भूख लग रही है ! कुछ खाने का भी नहीं रखा इस कार में ! बड़ी गाड़ी में तो सब रहता है ! सुबह हल्का नाश्ता ही किया था ये पता नहीं कब हम पुणे न सही कम से कम किसी ढाबे तक तो पहुचे!

अनिरुद्ध ने संकोच के साथ कहा : सर मेरे पास लंच है , आइये दोनों मिल कर खाते हैं !

करण : अरे नहीं ! तुम खाओ ! लो ये पानी की बोतल ले लो !

कुछ अच्छा नहीं लगा अनिरुद्ध को करण  का ऐसे मना कर देना ! फिर हिम्मत भी नहीं हुई दोबारा से पूछने की ! कितने बड़े घर से हैं करण , उनको कहाँ अच्छे लगेंगे उसकी बहन की हाथ की रोटियां और अचार !  अनिरुद्ध बस चुप चाप बैठ गया ! 

कभी रेडियो , कभी कार का शीशा , कभी बहार खड़े हो कर पड़ोस वाले कार वाले से बतियालेने में समय गुजर रहा था ! धीरे धीरे शाम के 4 बज गए ! करन को अब भूख बर्दाशत नहीं हो रही थी और ट्रेफिक था की टस से मस नहीं हो रहा था ! करण  से रहा नहीं गया और अनिरुद्ध से बोला : चलो अब लंच कर ही लेते हैं और अनिरुद्ध की तरफ हाथ बढ़ा दिया ! अनिरुद्ध सकते में था !

आनन् फानन में अपनी पेंट की जेब से एक पोलिथीन में लपेटे हुए पेकेट को करण की तरफ बढ़ा दिया !

करण  ने पेकेट खोल कर दो रोटियां अनिरुद्ध को दी और दो खुद ली एक एक अचार की फांक भी बाँट ली और खाना शुरू किया ! खाते समय दोनों कुछ नहीं बोले ! पानी पिया और सुकून लिया ! जैसे अगले 4 घंटो के लिए जान आ गयी हो !

अब दोनों को नींद आने लगी थी ! तभी अनिरुद्ध की तरफ किसी ने ठक ठक किया !

अनिरुद्ध : हाँ , क्या है ?

बाहर 10 साल के आस पास का एक लड़का मूंगफली बेच रहा था !

करण  ने 4 पेकेट ख़रीदे !

अब कार और दूसरी गाड़ियाँ आगे को सरक रही थी ! जाम खुल चूका था ! शाम के ५ बजे का समय था ! पुणे आने वाला था !

अनिरुद्ध बोला : सर आप मुझे यहीं ड्राप कर दीजिये मैं वापसी की बस ले लूँगा , अब होटल का तो समय रहा नहीं !

करण : नहीं तुम मेरे साथ चलो !

करण  अपने साथ उसको अपने पुणे के ऑफिस ले आया ! ऑफिस में चाय , काफी और समोसे भजिया का लुत्फ़ ले रहे थे सब !

करण  : हेलो !

कोई चार पांच लोग एक साथ करण का जवाब दे रहे थे : हेलो , अरे कहा थे भाई ?

बस हाय वे के जाम में था ! करण  एक काफी अनिरुद्ध की तरफ बढ़ाते हुए बोला !

भाई मीटिंग तो कल के लिए पोस्टपोन हो गयी है !

अब क्या वापस जाएगा मुंबई !

यही गेस्ट हॉउस में रुक जाओ कल मीटिंग अटेंड कर के चले जाना एच आर में हम बोल देते हैं !

करण  : हाँ वो कोई बात नहीं है !

आज रात मेरे साथ ये मेरा दोस्त अनिरुद्ध भी रुकेगा ! 

हम दोनों हाई वे के साथी हैं अपनी कंपनी में इसके लिए काम देखना हैं बस !

अनिरुद्ध को काम मिल गया !  ऑफिस  का काम ! सुबह ९ बजे से शाम ५:३० बजे तक का ! अब वो अपनी पढ़ाई ठीक से कर सकता था !

करण के फ़ोन से अनिरुद्ध ने अपने घर फोन कर दिया की और कल शाम को आयेगा !

उस रात बड़े बड़े लोगो के साथ उसने एक बड़े होटल में डिनर किया !

वैसे ये डिनर  उसके लिए नया नहीं था ! बस फर्क इतना था आज की वो टेबल के इस तरफ था !

करण  ने मीटिंग अटेंड कर ली !

  अनिरुद्ध ने पुणे के तीन स्टार होटल में जा कर उस दिन का काम संभाला और अपना रिजाइन दिया सब कुछ सही सही बताते हुए ! उसको सम्मान के साथ विदाई मिली ! 

शाम को एक आइसक्रीम की दूकान पर वो करण से मिला जहाँ कारन ने उसको आने को कहा था और
दोनों वापस मुंबई की तरफ चल दिए !

रस्ते में अनिरुद्ध को उसके गाँव के पास छोड़ कर करण आगे चल दिया !

करण   का मोबाइल नंबर अनिरुद्ध के पास था ,आगे किसी भी बात के लिए !

बॉम्बे पुणे हाई-वे के साथी दूर - दूर हो चले ,  लेकिन अब एक ही कंपनी में साथ- साथ थे ! 

साथ संबंधों में प्रगाढ़ता लाता है , और दूरियां परिपक्कवता !!

                                                                                                 :: ~~ :: मनीष सिंह