मैंने ,आपने और सबने अपने मोहल्ले , गाँव , शहर में कहीं न कहीं जरूर देखा होगा ! तो ज़रूर कभी अपने अपनी छोटी बड़ी , लम्बी , बहुत लम्बी यात्राओं में कहीं देखा होगा !
कभी आप घूमने जा रहे होंगे तो रस्ते में ठंडा पानी , गरम चाय पीने के लिए कभी रस्ते में रुके होंगे तो ज़रूर देखा होगा ! एक बड़ा बरगद का पेड़ !
जिसकी छाया में सब अपनी अपनी जगह पाते हैं ! दूकान वाला अपनी दूकान चलता है ! कोने में लगे सरकारी टेलीफोन से लोग अपनों को फोन कर लेते हैं ! चलते चलते थक चुके लोग कुछ पल आराम कर के आगे की यात्रा की शुरुआत करते हैं !
बड़े बरगद की छाया में सब लोग अपने लिए कुछ ना कुछ पाते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं और तरक्की होती है किन्तु एक सत्य ये भी है की बड़े और छायादार बरगद / पेड़ के नीचे लगाया गया कोई पौधा ठीक से पनप नहीं पाता ! उसकी स्वयं की तरक्की कमतर ही रहती है, बनिस्बत इसके की वो उस छाया की परिधि से बाहर लगा हो !
अतएव, ये भी सत्य है की अधिकाधिक छाया और संरक्षण भी उत्थान , उन्नति , सही दिशा लेने में अवरोध सरीखे ही होते हैं !!
आपके सिनिअर्स का आपके प्रति कम बेरुखी से पेश आना भी आपकी उन्नति में बाधक हो सकता है !
इस पंक्ति को दोबारा से पढ़िए , कुछ प्रायोगिक ( प्रक्टिकल ) सा लगेगा , किन्तु ये शत प्रतिशत सत्य नहीं है ! किन्तु ऐसा है ही नहीं ये भी कहना खुद को झुठलाना होगा !