Saturday, June 23, 2012

.....समय और समझ का प्रतिवेदन !!

              " कुछ सूखी पत्तियों और फूलों की पंखुड़ियों को अपने मुट्ठी में दबाये एक सुन्दर सा बच्चा अपने घर की तरफ भगा चला जा रहा था ,,,,,इतना परेशां की अगर किसी ने उसको घर पहुचने से पहले देख लिया , रोक लिया और पूछ लिया की उसके हाथों में क्या है तो सारा भेद  खुल जायेगा ....उसको सब बताना पड़ेगा ...कितना कीमती सामान है वो जिसको किसी के भी साथ नहीं बांटना चाहता....!."
              "कुछ एसा ही करते हैं हम ....अपने आप ही अपने लिए किसी भी एक या दो या फिर उस से भी ज्यादा सामान को कीमती , महत्वपूर्ण बना लेते हैं .....अपना अपना दृष्टिकोण है .. या फिर समय और समझ का प्रतिवेदन जिसके कारण ये सब होता है .... !!
             किसी भी चीज़ की महत्तता उसके प्रयोग पर निर्भर नहीं करती जितना की हम उसे प्रयोग के लायक समझते हैं .....! अब संग्रहालयों में रखी वस्तुओं को ही देख लीजिये ....कितना प्रयोग में आती हैं ...किन्तु महतवपूर्ण हैं !! इसी प्रकार से रिश्ते होते हैं , सामान्य और महत्वपूर्ण !!  भोतिक वस्तुओं और रिश्तों में सिर्फ इतना अंतर है ....एक सिर्फ एक के उठाए कदम पर महतवपूर्ण होता है और रिश्ते दोनों और के उठाये क़दमों की महत्ता एवं गंभीरता पर निर्भर करते हैं .......!!



Thursday, June 21, 2012

" आजकल वो नहीं है ...... !! "

" ....आजकल वो नहीं है ....... !! "

                मेरे घर के आँगन के बिलकुल पीछे से भारतीय रेल गुजरती है ....हाँ कुछ एक ठहरती भी हैं , लोहपथगामिनी विश्राम स्थल भी तो है ....बस उसके ही किनारे किनारे पेड़ लगे हुए हैं ....जिनमे से एक बूढा बरगद है ...जो हमारे ब्लोक के मकान संख्या 3 में रहने वाली एक बुजुर्ग ने लगाया था ...जिन्हें हम नानी कह कर संबोधित करते थे ....और उनके अंतिम समय तक करते रहे .....!! "
               बूढे बरगद पर एक दो या कुछ एक कोयल रहती हैं सुबह सवेरे हमलोगों के जागने से पहले जाग कर 
अपने होने के हस्ताक्षर कर देती थी, अपने सुरीले स्वर के कुहू कुहू कर के ..... !
अहाते में कुछ गौरैयों का झुण्ड अपने चु चू के स्वरों से अगले अहाते में चलने का  कार्यक्रम बनाता हुआ जल्दी जल्दी से दाना चुगने में ...मस्त .दिखाई पड़ता था ....!!

                  कोयल सुबह सवेरे बोलती थी उसके पीछे पीछे मैं भी कोशिश करता था उसके सुर से सुर मिलाने की , जब वो बोलती तो में भी बोलता था.....फिर वो बोलती , फिर में बोलता , फिर मैं बोलता .....फिर वो , फिर में .....फिर में हार जाता था ....और वो जीत जाती थी !! इसी तरह से गौरैया के झुण्ड से में हार जाता था ....कितनी बार कोशिश करी की उनकी एक फोटो निकाल लूं किन्तु एसा कभी हो ही नहीं सका की सब की एक साथ निकाल पाया हूँ .....कभी कोई कभी कोई ...कैमरे की हद से बाहर निकल जाती थी !! फिर भी अच्छा लगता था ये लुकाछिपी का खेल ....कोई था तो खेलने के लिए ...अब तो कोई नहीं है .....!!
              
             आजकल ना तो कोयल और ना ही गौरया ही दीख पड़ते हैं !! आवाजें भी सुने नहीं देती ...वो कहाँ हैं नहीं पता हाँ हम हैं अकेलापन लिए हुए .... !! रोज़ रेलगाड़ी आती हैं जाती हैं , नानी नहीं हैं , एक समान्तर दीवार खड़ी है रेल की पटरियों के सहारे ....हम बंधन में हैं या वो पता नहीं .... किन्तु कुछ तो है जो छूट सा गया है ....या धीरे धीरे छूट रहा है ...जिसके कारण हम बौने होते जा रहे हैं ....कद में नहीं ...अपनेपन में , सहयोग में , विचारों में , संबंधों में और ना जाने किस किस में ....आजकल वो नहीं है ..सूनापन है ...अकेलापन है ....सबके होते हुए भी वो सब नहीं है ....जो था किन्तु आज है तो खोखलापन और खालीपन किये हुए ! एक बड़ा सा कमरा सा होगया है जीवन -जहाँ कभी चहल पहल थी और आज निर्वात सा कायम है ....आशा है वो फिर से गाएगी बरगद पर की ये सन्नाटा ख़तम हो और मन का बनवास समाप्त हो जो किसी सीमा के लिए नहीं है एसा जान पड़ता है !!  चलिए अब सोते हैं कल सवेरे उसकी आवाज़ की उम्मीद में ....की जीवन चले !! "

       

         

Sunday, June 17, 2012

.......सारांश के बाद की पंक्तियाँ !!!!!

                " कोई  भी वृतांत , यात्रा , कहानी , शब्दचित्र , वार्ता  दो तरह से कहा  या पढ़ा  जाता  है ....एक पुर्णतः  अक्षर-अक्षर और एक सिर्फ सारांश में ..... ! "

                    मेरे कुछ निजी जीवन के अनुभव मुझे कुछ और भी सोचने  को बाध्य एवें प्रेरित करते हैं .....बाध्य इसलिए की जो सुना उस पर विशवास कर पाना कभी कभी आसान नहीं होता और प्रेरित इस लिए की जो सुना और कहा गया है संभवतः उस के शाब्दिक अर्थ वो ही हों जो सुने किन्तु उनके भावो के अर्थ और भी प्रेरणादायक हो सकते हैं .....! पूरी कहानी के बाद उसका सारांश पढ़ लीजिये आनंद आएगा ....किन्तु मैं आज आपको सारांश से आगे सोचने और पढ़ने की और दिग्दर्शित करने के चेष्टा और प्रयास करूँगा !!
                    मेरा एक मित्र है , था इस लिए नहीं लिख रहा क्योकि अभी वो है ....और में उसको मित्र मानता हूं।... जैसा की सर्व विदित है ...मित्रता में कोई सीमा नहीं होती , रंग, जात ,धर्म , लिंग, आयु आदि आदि .....हम दोस्त हुए , कभी कभी भाई कह कर भी एक दुसरे को संबोधित कर देते थे ...अच्छा लगता था ....किन्तु खोखलापन होता थे उस उच्चारण में ....जो की आज समझ में आया मुझे ....! कई विषयों पर अछि पकड़ थी उसकी , कम उम्र में बहुत कुछ कर लिए था और बहुत कुछ कर सकने की हिम्मत रखता था .....मैं इसी बात से उससे प्रभावित था ....!
                   मित्रता में व्यापार या मौकापरस्ती का कोई स्थान नहीं होता ....इस बात को आप इसे कहें इन दो लोगो के बीच एक सम्बन्ध बना ....जो मित्रता का है , एक अपनी पूरी ज़िम्मेदारी से उसका पालन कर रहा है , निश्छल , निर्बाध और  कई जगहों पर ये दिख भी रहा है की और भी एसा कर रहा ही ....किन्तु अपना भला देखते हुए .....जहाँ उसको एसा लगता है की उसको किसी भी तरह से आर्थिक , सामाजिक , पारिवारिक यू व्यापारिक नुक्सान की सम्भावना है वो आपको मझधार में छोड़ कर ये कहता हुआ निकल जाता है " मम्मी , पापा , चाचा से पूछ कर करूंगा !!  
                   किसी घटना के / कहानी के / मित्रता के या सम्बन्ध  के पुर्णतः सारांश में कहा जा सकने की पूरी संभावना होती है किन्तु मेरा अनुभव ये कहता है की सारांश के  बाद शब्द असल में किसी कथानक को पूरण करते है , यथार्थ के साथ .......हर चमकने वाली चीज अपने आप में तीखापन भी लिए होती है .....सम्बन्ध या मित्रता जब स्वार्थ की नीव पर बने हों तो अधिक विश्वासी व्यक्ति को धोखा होता है क्योकि विश्वासघाती तो अपना मतलब सिद्ध कर के किसी और को अपना नया मतलब साधने के लिए मित्र बनाए जाने के लिए निलकल चूका होता है ....
               अतः यदि संभव हो तो कहानी के सारांश के बाद की अतिरिक्त पंक्तियों पर ज्यादा गौर कीजियेगा ....ताकि धोखा ना हो !! श्रीमान चाहे जो भी हो गए हों किन्तु मेरी निगाह में ........ ..... ... ... .........खैर जाने दीजिये !!
                     सारांश के बाद की   पंक्तियाँ , उन रिक्तियों को स्थान देती हैं जो उचित निर्णय लेने में सहायक होते हैं ....और आपको बताती हैं की आप का किसी को  सहारा किस हद तक होना .चाहिए ...वर्ना दिया गया सहारा आपके ही सर पर चढ़ कर ज्ञान बांटने से बाज़ नहीं आएगा !! ये ख़ुशी की बात होगी की आपका सहारा कुछ मुकाम हासिल कर रहा है ... वो सब किन्तु बदतमीज़ी और ठसक से नहीं होना चाहिए जिसमे से एहसानफ़रामोशी की बू आती हो !!