" कोई भी वृतांत , यात्रा , कहानी , शब्दचित्र , वार्ता दो तरह से कहा या पढ़ा जाता है ....एक पुर्णतः अक्षर-अक्षर और एक सिर्फ सारांश में ..... ! "
मेरे कुछ निजी जीवन के अनुभव मुझे कुछ और भी सोचने को बाध्य एवें प्रेरित करते हैं .....बाध्य इसलिए की जो सुना उस पर विशवास कर पाना कभी कभी आसान नहीं होता और प्रेरित इस लिए की जो सुना और कहा गया है संभवतः उस के शाब्दिक अर्थ वो ही हों जो सुने किन्तु उनके भावो के अर्थ और भी प्रेरणादायक हो सकते हैं .....! पूरी कहानी के बाद उसका सारांश पढ़ लीजिये आनंद आएगा ....किन्तु मैं आज आपको सारांश से आगे सोचने और पढ़ने की और दिग्दर्शित करने के चेष्टा और प्रयास करूँगा !!
मेरा एक मित्र है , था इस लिए नहीं लिख रहा क्योकि अभी वो है ....और में उसको मित्र मानता हूं।... जैसा की सर्व विदित है ...मित्रता में कोई सीमा नहीं होती , रंग, जात ,धर्म , लिंग, आयु आदि आदि .....हम दोस्त हुए , कभी कभी भाई कह कर भी एक दुसरे को संबोधित कर देते थे ...अच्छा लगता था ....किन्तु खोखलापन होता थे उस उच्चारण में ....जो की आज समझ में आया मुझे ....! कई विषयों पर अछि पकड़ थी उसकी , कम उम्र में बहुत कुछ कर लिए था और बहुत कुछ कर सकने की हिम्मत रखता था .....मैं इसी बात से उससे प्रभावित था ....!
मित्रता में व्यापार या मौकापरस्ती का कोई स्थान नहीं होता ....इस बात को आप इसे कहें इन दो लोगो के बीच एक सम्बन्ध बना ....जो मित्रता का है , एक अपनी पूरी ज़िम्मेदारी से उसका पालन कर रहा है , निश्छल , निर्बाध और कई जगहों पर ये दिख भी रहा है की और भी एसा कर रहा ही ....किन्तु अपना भला देखते हुए .....जहाँ उसको एसा लगता है की उसको किसी भी तरह से आर्थिक , सामाजिक , पारिवारिक यू व्यापारिक नुक्सान की सम्भावना है वो आपको मझधार में छोड़ कर ये कहता हुआ निकल जाता है " मम्मी , पापा , चाचा से पूछ कर करूंगा !!
किसी घटना के / कहानी के / मित्रता के या सम्बन्ध के पुर्णतः सारांश में कहा जा सकने की पूरी संभावना होती है किन्तु मेरा अनुभव ये कहता है की सारांश के बाद शब्द असल में किसी कथानक को पूरण करते है , यथार्थ के साथ .......हर चमकने वाली चीज अपने आप में तीखापन भी लिए होती है .....सम्बन्ध या मित्रता जब स्वार्थ की नीव पर बने हों तो अधिक विश्वासी व्यक्ति को धोखा होता है क्योकि विश्वासघाती तो अपना मतलब सिद्ध कर के किसी और को अपना नया मतलब साधने के लिए मित्र बनाए जाने के लिए निलकल चूका होता है ....
अतः यदि संभव हो तो कहानी के सारांश के बाद की अतिरिक्त पंक्तियों पर ज्यादा गौर कीजियेगा ....ताकि धोखा ना हो !! श्रीमान चाहे जो भी हो गए हों किन्तु मेरी निगाह में ........ ..... ... ... .........खैर जाने दीजिये !!
सारांश के बाद की पंक्तियाँ , उन रिक्तियों को स्थान देती हैं जो उचित निर्णय लेने में सहायक होते हैं ....और आपको बताती हैं की आप का किसी को सहारा किस हद तक होना .चाहिए ...वर्ना दिया गया सहारा आपके ही सर पर चढ़ कर ज्ञान बांटने से बाज़ नहीं आएगा !! ये ख़ुशी की बात होगी की आपका सहारा कुछ मुकाम हासिल कर रहा है ... वो सब किन्तु बदतमीज़ी और ठसक से नहीं होना चाहिए जिसमे से एहसानफ़रामोशी की बू आती हो !!