घोंसले खाली हैं !
टिकटघर,
डाकघर,
प्लेटफोर्म,
बारातघर,
क्लासरूम,
सिनेमा घर !
यहाँ ,
घोंसले खाली हैं!
आज भी,
रेलें दौड़ती हैं,
पत्र आते हैं,
डेस्क कुर्सियां,
भरी रहती हैं !
रोज़, छुट्टी तक !
किन्तु यहाँ ,
घोंसले खाली हैं !
नहीं चेहचहाते,
नन्हे बच्चे !
विकास से
विकसित दूरियां ,
अस्तित्व से,
प्रतिउत्तर की आस में,
रोज़ पूछती हैं,
क्यों खाली
हो रहे हैं,
घोंसलों सरीखे हम !!!!!