Wednesday, July 25, 2012

...कितना भालो लगता है ना....अपना छोटा नैनो.... !

               वो कई दिनों के बाद मिलने वाली ख़ुशी थी .... ! उस दिन अचानक ही बारिश हुई थी ....लगातार हो रही थी ....हमारे इलाके में !!  हम उत्तरप्रदेश में रहते हैं ! सरकार नहीं है ....हाँ सरकार के बनाने से पूर्व भी बारिश हुई थी ...जैसे की होती है ...वादों की ...अब ये मत पूछिए की पुरे हुए कितने ! ये भी कोई सवाल है ? वादे क्या पुरे करने के लिए किये जाते हैं ?? ना ना वो तो सरकार बनाने के लिए किये जाते हैं ...खैर छोडिये हम कहाँ इस बिना नीति के विषय पर दिमाग लगाने लगे .... आइये कुछ बाते बताते हैं उस दिन बारिश के दिन हुए एक गंभीर एहसास के बारे में ........!!
               हाँ , दफ्तर में सब बातें कर रहे थे आज राम जी बरसेंगे , आज तो धरती की प्यास बुझेगी , आज तो सारा वातावरण सुहावना हो जायेगा ....और कितना जिस की सीमा सोचने की और शब्दावली थी सब ने कुछ ना कुछ  कहाँ शायद ही होने वाली बारिश के बारे में ,,,, !
               शाम के छे बजे , हम ने कमर कसी , सब से पारम्परिक विदा ली , और चल पड़े अपनी फटफटिया की तरफ ! कुछ साफ़ किये और किक मार कर चल पड़े ...रस्ते में घोष बाबु को लिया ...एक पान खाने की इक्चा जताई किन्तु घोष बाबु ने हमें मना कर दिया ...लगभग डाँटते हुए !!
               कुछ आगे बढे ....हमारे कारखाने से मेरे घर की दुरी कुल 40 किलोमीटर है ...हमें 5 किलोमीटर की दूरी तय करी तभी हमें कुछ पानी की बूंदों का एह्साह हुआ ...हमें जल्दी से रस्ते के एक बस स्टैंड पर रुके , और अपना अपना रेनकोट ( बरसाती ) पहनी और फिर चल पड़े अपने गंतव्य पर ....झमाझम बारिश , खुली खुली सड़कें , कम ट्रेफिक , और जगह जगह पानी ....और में और घोष बाबु चले जा रहे थे ....कपडे तो भीगने का सवाल नहीं ...रैन कोट जो पहना था ...दर किस बात का !!.......अचानक ही घोष बाबु ने कुछ एसा कहा की मुझे अपने ऊपर गर्व होने लगा , एसा लगने लगा की कहाँ हम कहीं कम हैं ...बस ज़रुरत है तो बस सोच बदलने की .... चलिए बताते हैं घोष दा ने क्या कहा .... बारिश में भीगते हुए बाइक पर सफ़र करना अपने पा में ही अनोखा अनुभव है ....और उस में घोष जी ( अपनी बंगला टोन में ) .... "" कितना भालो लगता है ना ....अपना छोटा नैनो  .... !""  मैंने पलट का पुछा छोटा नेनो ....मतलब ? अरे ये बाईक अपना छोटा नेनो तो है .... छोटा ...जिसमे बारिश भी नहीं लगता ( रैन कोट जो पहना है ) कम फियुल लगता है ....सो ये नेनो नहीं है किन्तु छोटा नेनो है ...बिना छत के .... !
                   हम लोग कितना धोखे में रखते हैं ना खुद को ... पर ये ज़रूरी भी है नहीं तो अगर जीवन सिर्फ यथार्थ की ही सीढियां चढ़ता जाये तो ....साँसे जल्दी फूल जाएँगी और साथ छूठ जायगा .....इस लिए अपनी " मोटरसाइकिल को छोटा नैनों  " मान कर चलिए.....ख़ुशी मिलेगी जब तक " औदी " नहीं ले लेते !!