Friday, April 19, 2013

मिटटी का कुम्भ !!

जीवन की,


कमियों का अश्रु में

परिवर्तन सहायक,

हो सकता है,

सहानभूति का !

किन्तु ये,

प्रमाणिक सत्य है,

अग्रसर रहने,

उत्थान के लिए,

छोटे कदम,

एवं, निम्न सोपान,

की तारतम्यता,

आवश्यक हैं !

निरंतर, सतत,

मिटटी का कुम्भ

सर्वप्रथम सोखता है,

संचित रखने से पूर्व,

जीवन जल को !

Wednesday, April 17, 2013

वो असमंजस में है !!

वो असमंजस में है !
रिश्ते बनता हुआ,
नापता हुआ ,
तोलता हुआ,
भावनाओं को,
फायदे के,
तराजू पर,
स्कूल के,
कॉलेज के,
दफ्तर के,
सारे रिश्ते,
सिर्फ फायदे,
अवसर की,
बैसाखी पर
चलते हुए,
दूर तक नहीं,
जा सकेगा,
गया भी, तो
आत्मग्लानी,
के रिश्ते ,
साथ होंगे  ! 

Tuesday, April 16, 2013

गली का शीशम, कही नहीं जाता !!

   गली का शीशम,
कही नहीं जाता !

मोहल्ले का
साँझा तंदूर,
नेवाड़ की चारपाई,
रेत में दबे,
पानी के मटके,
इंटों का चबूतरा,
सब इसके नीचे,
जन्मे ,शेष हुए !
बूढी नानी का भय,
अब नहीं !

दोपहर भर,
खेलते फिरते है,
शीशम,
नहीं रोकता,
नई पीढ़ी को,
कथित प्रगति से !
हम दूर हो गये
स्वयं की
नीवों से !

गतिशीलता,
पुनः परिभाषित,
होना चाहती है !
छिछली,
नीवों के सहारे !
::: मनीष सिंह :::

Monday, April 15, 2013

अग्नि, अंतिम शुद्ध है !!

अग्नि,
अंतिम शुद्ध है !
संपर्क में आते,
कंटकों पाषाणों,
चल ,अचल,
निम्न, उच्च,
जीव, निर्जीव,
अतिशुद्ध,
हो जाते हैं !
अपनी पहचान,
खोते हुए !

संबंध कंटक
हो जाते  हैं,

संपर्क  दूरस्थ
की सम्भावना,
तलाशते  है,
पाषाण से व्यक्तित्व,
पिघल जाते हैं,
जब क्रोधाग्नि,
पनपती है ,
अशुद्ध से,
व्यवहार में ,
 हमारे !