Thursday, July 11, 2013

एक कहानी : " अजनबी, कौन हो तुम ...."

                          अभिनव करीब पंद्रह सालों बाद जोधपुर वापस लौट रहा था !
         बचपन और किशोरावस्था के बाद सेना की नौकरी  जोधपुर की गलियों से कब उसको शहर और फिर वहां के ट्रेनिंग केम्प से पुरे देश में कब ले गयी, उसको पता ही नहीं चला ! घर में पिता के बाद बड़ा होने के नाते सेना की नौकरी उसको मिली ! आज पंद्रह सालों के बाद अपने घर आना हो रहा था  ! ऐसा नहीं की सेना ने उसको छुट्टियाँ नहीं दी अपने घर जाने के लिए ! बस अपनी दूर दूर की पोस्टिंग्स के कारण आ ही नहीं सका !

             अब उसने सोच लिया है था की कहीं नहीं जाएगा अपनों को छोड़ कर ! यहीं रहेगा अपनी माँ , बहन और छोटे भाई जयंत के साथ , परिवार के साथ !

             ट्रेन ने एक लम्बी सीटी लगाई ! रफ़्तार कुछ धीमी हो गयी थी ट्रेन की ! अभिनव ने अपनी खिड़की से झुकते हुए बाहर झाँका ! वो ही रेलवे का फाटक दिखाई दिया ! जिसके किनारे खड़े ठेली वालों से चुरन , खीरे , समोसे , बाटी खाया करते थे अपने दोस्तों के साथ स्कूल से लौटते समय ! कितने कम पैसों में कितना सारा सामान मिलता था ! कोई चिंता नहीं ! किनारे पर आज भी वो जामुन का पेड़ हैं ! फाटक बाबु के लाख मना करने के बावजूद उनसे आँखे चुरा कर जामुन खा ही लिया करते थे ! कुछ कम डालियाँ रह गई हैं अब ! फाटक बाबु भी ढल चुके हैं ! फाटक से ट्रेन गुजर रही थी ! गाँव के सरकारी स्कूल में नई पीढ़ियों की कतारें वैसे ही लगी थीं   ! हाफ नेकर और हाफ कमीज़ में चप्पल में ही दौड़ आता था अभिनव स्कूल वही खाकी नेकर और नीली कमीज़ का रंग , वैसा ही है ! पुरे  भारत में इन्ही रंगों के सहारे देश की भावी पीढ़ी में उन्नति के रंग भरता है हमारा सरकारी तंत्र !
                     ट्रेन प्लेटफोर्म पर लग चुकी थी ! पूरा कम्पार्टमेंट लगभग ज़ल्दी उतरने की होड़ में दरवाज़े पर जमा हो चूका था ! अभिनव को कोई ज़ल्दी नहीं थी ! पद्रह सालों की  अपने शहर में लौटने की   आस ऐसी थी जैसे हलकी होती बारिश से  भीगती कच्चे घरों की दीवारों  में रिसता पानी !  नए जोधपुर के सारे नज़ारे आँखों में भर लेना चाहता था वो ! 

भैया : जयंत ने पुकारा !

अभिनव ने गहरी सांस लेते हुए जयंत को हाथ का इशारा किया !

जयंत ने अभिनव के पैर छुए और उसका सामान ले कर प्लेटफोर्म  उतर गया !

अभिनव : और जयंत कैसे हो ?

जयंत : एकदम फिट और खुश  भैय्या !

अभिनव ने जयंत का जवाब नहीं सुना ! उसका ध्यान तो एकाएक प्लेटफोर्म पर ही एक लैंप पोस्ट के सहारे से बैठे परिवार की तरफ चला गया था ! लगभग चार साल का एक बच्चा पास ही बैठे मिटटी के खिलोने वाले से मिटटी की सारंगी लेने की जिद कर रहा था और उसके माँ बाप न जाने उस दस रूपए की चीज़ के न लेन के लिए उसको मनाने में जुटे थे !
            वो खिलोने वाले के पास गया और एक सारंगी ले कर बच्चे की तरफ बढ़ा ये सोच कर की उसको चुप करा कर कुछ खुशियाँ दे सके ! माहौल बदल गया ! बच्चे ने सारंगी नहीं ली और पीछे की और सरकता हुआ अपनी माँ के आँचल में छुप सा गया ! ये सच है की समर्पण ख़रीदा नहीं जा सकता भले बाध्य कर दिया जाये किन्तु आनंद बाध्यता में नहीं निष्काम समर्पण में ही होता है !        अभिनव मूर्त रूप सा झुक हुआ अपने को असहाय महसूस कर रहा था ! एक छोटे बच्चे ने उसे कितना छोटा कर दिया था ! सैकड़ों रंगरूटों को नियंत्रण में रखने वाला आज अदभुद रूप से  असहाय था ! जयंत ये सब देख रहा था ! हाथो में दो कप चाय लिए !
                 माँ के इशारे पर बच्चे ने सारंगी धीरे से पकड़ ली ! अभिनव के लिए वो छोटे छोटे हाथ जैसे उसके मानस से सैकड़ों टन वजनी हो चुकी सारंगी का वज़न उतार रहे थे ! इस अनोखी घटना के बाद , हलकी मुस्कराहट के साथ अभिनव जयंत की तरफ बढ़ चला ! रेलवे की टी स्टाल के  पारंपरिक चीनी मिटटी के कप में चाय पी और स्टेशन से बहार की और चल दिया ! उसने ध्यान दिया की चाय वाले ने चलते समय जयंत को नमस्कार किया लेकिन उसकी तरफ कोई तव्वज्जो नहीं दी ! जयंत से उसने पैसे भी नहीं लिए !
               स्टेशन के बाहर खड़े एक ऑटो पर जयंत ने सामान रखा और अभिनव को इशारे से कहा बैठने के लिए ! पूरा ऑटो घर के लिए रिसर्व कर लिया था जयंत ने ताकि भाई को कोई परेशानी नहीं हो !  दोनों भाई घर की तरफ चल दिए !

            अभी कुछ दूर ही गए थे की सड़क के किनारे खड़े एक बाइक वाले ने हाथ दिखा कर ओटो को रोक लिया ! जयंत ने भी ओटो को रुकने की सहमति दी !

बाइक वाला : भैया जी , कल आपके घर गया था !

जयंत ने अपनी जेब से कुछ रूपये निकाले और बोला : काका ,आपको तो मालूम है बहन की शादी है तो यहाँ वहां जाता रहता हूँ ! लीजिये ये आपके पैसे जो टेंट मेंहदी वाले दिन अपने लगाया था उसके लिए और कुछ एडवांस भी रखिये शादी के दिन के लिए बाकि हिसाब बाद में होता रहेगा !

अभिनव ओटो के अन्दर से सब देख रहा था ! जयंत ने बाइक वाले से अभिनव का परिचय कराया तो उसने अभिनव को नमस्कार किया और आगे शाम को घर आने की बात कह कर आगे बढ़ गया !

जयंत : भैय्या , आप बैठिये मैं ज़रा पास के हलवाई से शाम के महिला संगीत के लिए दिए बताशों के आर्डर का पता करता हूँ ! अगर बन गए होंगे तो लेते चलेंगे नहीं तो शाम को  से ओटो का खर्चा होगा !

अभिनव बस मुस्कुरा दिया ! जयंत दस किलो बताशे ले आया ! ऑटो आगे बढ़ा ! कुछ दूरी पर एक फल वाले के सामने जयंत ने ओटो को रुकने का इशारा किया !

जयंत : भाई बस एक मिनट में आता हूँ !

अभिनव सब देख रहा था ! जयंत ने कुछ रुपये फल वाले को भी दिए और दो दिन बाद के लिए फलों का आर्डर दे कर कन्फर्म कर दिया ! ओटो फिर आगे बढ़ा ! एक ज्वेलर की दूकान पर रुका ! यहाँ पर जयंत ने अभिनव से अपने  आने को कहा ! वो बहन के लिए दिए गए गहनों के आर्डर को  अभिनव को दिखाना  चाहता था ! अभिनव दूकान के अन्दर गया ! दूकान में वो  सिर्फ देखता रहा ! जयंत ने सारे गहने एक एक कर के मंगवाए और अभिनव को दिखाए ! सब तैयार था लेकिन घर पर शादी वाले दिन ही जायेगा ऐसा  माँ ने कहा है ! इस सब के बीच वो अभिनव का परिचय दूकान के मालिक से करवाना भूल गया था ! 

जयंत : सेठ जी ये मेरे बड़े भाई हैं , अभिनव !

सेठ जी : अच्छा ! आप जोधपुर में कम रहते हैं ?

अभिनव : जी में सेना में था , इस लिए बहार ही रहा पर अब यहीं पर रहूँगा !

सेठ जी : अच्छी बात है !

जयंत : अब चलें भैया ?

अभिनव : हाँ चलो !

जयंत और अभिनव ओटो में बैठे ही थे की किसी ने पीछे से पुकारा :

भैय्या जी जरा सुनिए ! एक दूध वाले की आवाज़ थी !

जयंत ने ओटो को रुकने को कहा !

जयंत : हाँ भैया ?

दूध वाला : पनीर आपके घर छोड़ कर आया हूँ ! दूध को मना कर दिया माँ ने आज के लिए ! परसों के लिए कुछ पैसे दे देते तो ठीक रहता !

जयंत ने कुछ रुपे उसको भी निकाल कर दिए और पनीर , दूध और देसी घी की सही समय पर पहुच जाने की बात कही ! दूध वाला हामी भरता हुआ वहां से चला गया !

अभिनव ये सब देख कर हैरान और परेशान था !

अभी जयंत ने दसवीं भी नहीं पास कर करी है और पुरे घर को देख रहा है !

कितने सही तरह से पूरी जिम्मेदारी निभा रहा है बहन की शादी की !

पूरी तय्यारी कर रखी है इसने !

मैं तो सिर्फ पैसे भेजता रहा ताकि घर का खर्च चल सके !

खेती बाड़ी अपनी पढ़ाई और फिर ये सब कैसे कर लेता है ये सोलह साल का लड़का ! आश्चर्य है !  

          स्टेशन से घर की दुरी केवल पांच किलोमीटर की थी लेकिन शादी के सारे छोटे मोटे काम निबटाते हुए जैसे :

सुबह स्टेशन जाते ही दाल देता गया था पीसने के लिए ! वो ली वापसी में ! सब्जी वाले से सूखी सब्जियों की बोरियां ओटो में रख ली ! बताशे ! मसालों के छोटे छोटे पेकेट ! शादी के दिन के लिए खाने बनाने का राशन ! बारातियों के रुकने वाले होटल वाले से बातचीत ! बीच बीच में आते फ़ोन पर लोगो को विभिन्न निर्देश देता हुआ जयंत घर का सबसे बड़ा सदस्य लग रहा था !

अभिनव बड़ा था लेकिन उम्र से किसी को बड़ा नहीं बनाती !  

जयंत ने पूरी शादी का फंग्शन व्यवस्थित कर दिया था ! सब अपना अपना काम कर रहे थे ! 

ओटो घर के सामने रुक गया ! 

जयंत ने कुछ पास के लड़कों को पुकारा : चलो भाई छोटे लोगो मेरी मदद  करो  सामान उतारने में !

उसकी एक आवाज़ में गली में खेलते सब लड़कों ने ऑटो का सामान उतार दिया !

ओटो अपनी राह चला गया !

अभिनव चुपचाप खड़ा था अपने ही घर के सामने इस इंतज़ार में की कोई कहे की घर के भीतर आओ !

शादी के घरों में सब व्यस्त रहते हैं !

किसी को किसी की सुध नहीं रहती ! तभी जयंत का ध्यान अभिनव की तरफ गया !

जयंत : अरे भैया आप बाहर ही खड़े हैं ? अन्दर जाइये !

अभिनव :  भाई ले चलोगे तो चलों !

जयंत और अभिनव अन्दर गए !

अन्दर का वातावरण एकदम  वैसा ही
जैसा भारतीय शादी के घरों में होता है ! 

रंगबिरंगे कपड़ों में काम में व्यस्त लोग !
कुछ लोग  काम के ही व्यस्त !
मीठे और नमकीन की मिक्स खुशबु !

घर के आँगन में पारंपरिक टेंट और  मेहँदी तो कहीं महावर लगाती नाउन ! 

अरे अभिनव : बड़ी चाची ने  आवाज़ में कहा !

सब अपना अपना काम काम छोड़ कर अभिनव के पास आ गए ! जिनसे अभिनव बड़ा था उन्होंने उसके पाँव छुए और जहाँ ज़रूरी था उनके अभिनव ने पाँव छुए ! अगले पांच दस मिनट तो सब अभिनव के आस पास रहे फिर सब अपने अपने काम में लग गए ! 

माँ : अभिनव तू नहा कर तयार हो जा , फिर गुड्डी खाना लगा देगी फिर खा कर थोडा सो जाना ! 

अभिनव : जी माँ !

माँ : जयंत , वो भीतर के बड़े कमरे की चाभी देना , अभिनव उसमे ही सो जायेगा बाकि तो सब जगह शोर है !

जयंत : लो माँ !

अभिनव इतने लोगो के बीच अपने को अकेला ही पा रहा था ! सारा घर अपने अपने काम में था ! उसको नहाने के बाद सुला दिया गया ! फिर शाम को चाय नाश्ता दे कर आराम करने को कहा गया ! फिर रात में सब लेडीज़ संगीत में व्यस्त थे ! बड़ा होने के कारन वहां भी नहीं जा सका ! वहीँ जयंत पुरे काम भी कर रहा था ! लेडीज़ संगीत में भी  नाच किया उसने ! खाना भी सब के साथ खाया अभिनव की तरह एक कमरे में नहीं ! 

रात के करीब एक बजे अभिनव इसी उधेड़बुन में करवटें बदल रहा था की कुछ आवाज़ सुनाई दी ! वो उठा और गलियारे में निकला और देखा जयंत बाहर रखे टेबल कुर्सी पर कुछ लिख रहा था ! वो सीढ़ियों से होता हुआ उसके पास पंहुचा और उसके सर पर हाथ रेख कर बोला : क्या हो रहा है छोटे ?

जयंत : अरे भैया आप ? बस दिन भर का हिसाब लिख रहा था ! 

अभिनव : कुछ मुझे भी काम दो !

जयंत : भैया ये सब का के कारन ही तो हो रहा है ! आप अपना काम कर चुके अब मैं अपना काम सही से कर सकूं बस ये देखते रहिये और जहाँ गलती तो सुधार दीजिये !

अभिनव हल्का सा मुस्कुराया ! गलती तो तुम्हारे काम में  से भी नहीं मिलेगी !

जयंत : हा हा हा ! दसवी में अगर अच्छे नंबर नहीं आये तो आप क्या मुझे छोड़ेंगे ! अगले महीने ही एक्साम हैं !

अभिनव : हम्म !

जयंत : ठीक है भैया ! मैंने सारा हिसाब लिख दिया है ! माँ कह रही थी की आपको सब समझा दूं !

अभिनव : समझा दूं मतलब ?

जयंत : माँ ने कहा की आपको सब खर्चा बता दू और पैसे का हिसाब दे दूं !

अभिनव : मुझे कुछ नहीं समझना और हिसाब तू ही रख बस इतना बता दे की और कितना पैसा और चाहिए !

जयंत : नहीं भैया ! और कुछ नहीं चाहिए सब हो गया है ! बल्कि माँ के दिए पैसे हैं मेरे पास और कुछ अभी बैंक में हैं ! 

अभिनव : और मैंने जो पैसे भेजे थे गुड्डी की शादी के लिए ?

जयंत : वो तो वैसे के वैसे ही आपके अकाउंट में जमा करा दिए थे मैंने ! एक भी रुपया नहीं निकाला !

अभिनव : क्यों ?

जयंत : बस जब घर के पैसे पुरे पड़  गए तो ज़रुरत नहीं पड़ी !

               अभिनव सुबह से अपने मन में एक बात सोचे बैठा था ! सारा घर का खर्च वो उठा रहा है ! शादी में भी पूरा खर्च उसने भेजा  है,  फिर भी लोग उस से दूर दूर हैं ! उसकी बहन जिसकी शादी है वो दिन में सिर्फ एक बार उसके सामने आई वो भी माँ के कहने पर खाना देने ! घर के बड़े लोग कुछ भी बात नहीं छेड़ते उसके साथ ! हर काम में जयंत ! हाँ जयंत ने उसके साथ हमेशा बड़े भाई मान दिया ! 

               अभिनव जयंत को नीचे ही गद्दों पर सोता छोड़ कर अपने कमरे में सीढ़ियों के सहारे जाते हुए ये सब सोचने लगा ! सुबह के चार बज रहे थे ! गलियारे में एक कमरा वो भी था जिसमे बहन को दिया जाने वाला सामान रखा था !  सटे हुए दरवाज़े से अन्दर रखे चमचमाते बर्तन पर उसका ध्यान गया ! दरवाज़ा खोल कर अन्दर की लाईट  जला कर देखने लगा ! कपडे , फर्नीचर , बर्तन , फ़्रिज ,  मशीन , डबल बेड , लोहे की अलमारी , कूलर और सब से किनारे रखा ड्रेसिंग टेबल जिसके बड़े से शीशे में अभिनव ने अपने पुरे कद को देखा !

उसकी आँखे उसे खुद पूछ रहीं थीं " अजनबी, कौन हो तुम ? " आज से पहले तो कभी तुमको नहीं देखा !  स्वयं से किया गया ये सवाल अभिनव के पुरे दिन के अनुभव का उत्तर था !

माँ ने पुकारा : अभिनव उठा नहीं अभी ? जा जल्दी से चाचा जी के साथ जा कर बांस ले कर आ खेतों से !

जयंत : मां भैया को कहाँ भेज रही हो , एक कप चाय दो मैं बस उठ गया हूँ चल जाता हूँ उन्हें सोने दो !

माँ : नहीं , कल पूरा दिन आराम करने दिया ना ...अब तू कुछ और काम देख और वो कुछ और अकेले कर ही रहा है ना एक महीने से !

अभिनव : हाँ माँ बस अभी आया , गुड्डी चाय लाना मझे चाचा जी के साथ जाना है !

गुड्डी : जी भैया !

सब सामान्य , वातावरण जितना उलझन भरा होता है उतनी ही उसमे सम्भावना होती है सुलझाने की बस तरकीब आनी चाहिए उस सुल्झन वाले किनारे की डोर को पहचान कर खीचने की ! यहाँ माँ ने सब सुलझा दिया था , सब अपने थे कोई अब अजनबी नहीं !!
                                                                                                          
 :: मनीष सिंह ::