Friday, May 3, 2013
Wednesday, May 1, 2013
एक कहानी : रोहन और चिट्ठी !!
दोपहर से ही कभी हलकी फुलकी बारिश हो रही थी !
उसका मन पशोपेश में था ! कहीं बारिश के कारण डाकिया अंकल आज अपना आना टाल ना दें ! कभी कभी ऐसा हो जाता था ! तेज़ धूप हो , बारिश हो , हवाएँ तेज़ हों तो कभी कभी डाकिया अंकल की वो अपनत्व लिए पुकार सुनाई नहीं देती थी ! कहीं आज ऐसा ही ना हो जाये , लेकिन मन कहता था की आज बारिश तो कुछ खास नहीं हो रही , उनको आना चाहिए क्या मौसम खराब होगा तो किसी के घर चिट्ठी नहीं पहुचेगी ? उनका काम है ये ! तनख्वाह तो समय पर मिलती है ,उसके लिए मौसम का मिजाज़ कहाँ मायने रखता है !! आज शाम के ४ बजने को हैं , अमूमन आ जाते है वो इस समय तक ...आज का ना आना कुछ समझ नहीं आ रहा ....!
रोहन करीब ४ सालों पहले अपने एक रिश्तेदार के घर गर्मी की छुट्टियों में घूमने गया था ! अकेला ! वो ले गए थे उसको यहाँ आ कर ! ये उसके दूर के रिश्तेदार का ही घर है ! जहाँ वो आजकल रहता है ! माँ पिता और किसी नाते रिश्तेदारों के बारे में कभी किसी ने नहीं बताया ! हाँ ये ज़रूर बताया की वो इसके रिश्तेदार हैं ...सगे नहीं !
४ सालों पहले जिन रिश्तेदार के घर गया था वो दक्षिण भारत के केरल राज्य के एक कम आबादी वाले गाँव में रहते हैं ! हर तरफ प्रकृति ने गाँव को दोनों हाथों से संवारा है ! हर ओर हरियाली ! फलों , मसलों , सूखे मेवों जैसी समृधि दिखाई पड़ती है !
१२ साल का था वो जब वहां गया था ! आठवीं के एग्जाम दे कर , रिसल्ट अभी आना बाकि था ! दिल्ली से एअर्नकुलम एक्स्प्रेक्स में बैठा और दो दिन से ज्यादा का लम्बा सफ़र कर के वहां पंहुचा ! रास्ता जैसे उम्र हो गया और कम्पार्टमेंट के लोग परिवार ! एक अच्छी सी थी उस कम्पार्टमेंट में अपने परिवार के साथ ! उसका बड़ा भाई , माँ , पिता सब साथ ही थे ! रोहन अकेला था , रिश्तेदार जिनके साथ वो जा रहा था वो अगले कम्पार्टमेंट में थे ! टिकट आर ऐ सी था इस लिए इधर उधर बर्थ मिली थी ! बीच बीच में आ कर वो देख जाते थे , मिल जाते थे ! बाकि समय वो अपने परिवार के साथ रहते थे ! गुंजन नाम था उसका !
"क्या मैं खिड़की के पास बैठ सकती हूँ ? " खिड़की से बाहर देखते सोचते हुए रोहन से गुंजन ने पुछा !
रोहन : हाँ , क्या ?
गुंजन : मैं पूछ रही हूँ की क्या मैं तुम्हारी सीट पर बैठ सकती हूँ कुछ देर ?
रोहन : अरे, इसमें पूछने की क्या बात है , हाँ आओ , बैठो ना !
गुंजन : माँ , मैं उस सीट पर जा रही हूँ !
संभल कर , हाथ बहार नहीं निकलना और ट्रेन की चलने के दूसरी दिशा में बैठो ! गुंजन के भाई ने आदेशात्मक रूप से कहा !
रोहन : हाँ , हाँ भैया , मैं उधर हो जाता हूँ !
रोहन सोचने लगा - अपने कितना ख्याल करते हैं ना ! उसके भैया ने उसको इस सीट पर इस लिए बैठने को कहा होगा ताकि उसके चहरे पर गर्म हवा और धुल मिटटी ना लगे !
गुंजन : किस क्लास में पढ़ते हो तुम ?
रोहन : बस 8th के एक्साम दे कर आया हूँ ! और तुम ?
गुंजन : मैं भी !
रोहन : तुम कहाँ जा रही हो ?
गुंजन : अपने ताऊ जी के घर , गर्मी की छुट्टियों में , और तुम ?
रोहन : मैं भी ?
गुंजन : एर्नाकुलम में तुम्हारे भी ताऊ जी रहते हैं ?
रोहन : नहीं !
गुंजन : तो फिर तुमने मैं भी क्यों कहा ? और कौन रहता है तुम्हारा वहां ?
रोहन : दूर के चाचा चाची हैं !
गुंजन : अच्छा तो तुम चची के घर और मैं ताऊ के घर जा रहे हैं !! वाह!
रोहन हल्का सा मुस्कुरा दिया !
इस बीच गुंजन की माँ ने संतरे निकले और गुंजन और रोहन दोनों की और एक एक बाधा दिए ...खाओ , कहते हुए !
रोहन - के साथ ऐसा पहली बार हो रहा था ! खाने किए लिए कहा जा रहा हो , किसी अपने से अजनबी के द्वारा !
गुंजन ने फिर चुप्पी तोड़ी : दिल्ली में कहाँ रहते हो तुम ?
रोहन : सकपका गया ! कुछ नहीं बोला , जैसे सवाल सूना ही ना हो !
गुंजन ने रोहन का हाथ हिलाते हुए पुछा : ओ हीरो , तुमसे पूछ रही हूँ ?
रोहन : हाँ क्या ?
गुंजन : दिल्ली में कहाँ रहते हो ?
रोहन : मैं , मैं ...
गुंजन : अरे .....?
रोहन : मैं , रोहिणी मे रहता हूँ !
गुंजन : रोहिणी ? किस ब्लाक में ?
रोहन : वहां एक अनाथ आश्रम है , उसी में !
गुंजन : अच्छा वो जी के गेट पर एक मोटे से भैया का टेलीफोन बूथ है ?
रोहन : तुमको पता है वो अनाथ आश्रम ?
गुंजन : हाँ , हमारे स्कूल के बस उसके ही सामने से जाती है !
रोहन : ओह !
गुंजन : बस थोड़ी दूरी पर तो हमारी कोठी है !
रोहन : अच्छा !
गुंजन अपने माँ पापा से बात करने लगी : पापा माँ , ये रोहन है ,अपने घर के पास वाले अनाथाश्रम में ही रहता है !
माँ - अच्छा , लो एक संतरा और लो और रोहन को भी दो !!
गुंजन के भाई ने रोहन से पुछा : कब से हो वहां ?
रोहन : शायद जन्म से !
भैया : ओह !
गुंजन : अच्छा ठीक है अब से स्कूल के बाद तुम मेरे घर आ जाया करना , हम साथ में खेलेंगे !
रोहन : हल्का सा मुस्कुराया !
गुंजन : आओगे ना ?
रोहन : अरे अभी तो केरल की यात्रा कर लो पहले ...!
गुंजन : हा हा हा ....! सही कहा !
पूरा दिन निकल गया ! बाहर की रौशनी हलकी पड़ने लगी ! कम्पार्टमेंट की रौशनी तेज़ हो गयीं ! पंखे और तेज़ चलने लगे ! तभी रोहन के रिश्तेदार ने आ कर रोहन को एक जनता खाने का पेकेट दिया साथ में एक पेकेट पानी का भी ! जिसमे कुछ पूड़ियाँ , सूखी सब्जी , अचार था !! रात के आठ बज रहे थे ! रोहन का ध्यान बार बार गुंजन की तरफ जाता था जो अपने भैया की गोद में सर रख कर दो रही थी ! रोहन ने भी खाना नहीं खाया ! साथ में ही खा लूँगा गुंजन के, ये सोच कर !
हलके गुलाबी रंग की ड्रेस पेहेन रखी थे उसने , उस दिन ! बिलकुल सुन्दर सी गुडिया सी लग रही थे !
सपने खुली आँखों से भी देखे जा सकते हैं ,जो रोहन देख रहा था ! ट्रेन एर्नाकुलम जा रही थी और रोहन दिल्ली पहुच चूका था ! स्कूल के छुट्टी की घंटी के बाद सीधा गुंजन के घर , पार्क में , गलियों में घूमता हुआ अपने अनाथाश्रम के कमरा नंबर ३०५ के पलंग पर उल्टा सो रहा था , कल फिर से छुट्टी की घंटी के इंतज़ार में ! अचकन किसी ने लगभग झकझोरते हुए पुछा रोहन खाना क्यों नहीं खाया ? अभी खा लूँगा रोहन बोला ! ठीक है बिना खाए मत सोना !
ट्रेन ने कोई बिना स्टॉप का स्टेशन क्रोस किया ! गुंजन की माँ ने गुंजन के सर पर हाथ फेरते हुए उसको उठाया ! बेटा ,उठो कुछ खा लो ! गुंजन अनमने ढंग से उठी और अपनी स्लीपर ढूँढने लगी ! उसकी स्लीपर तो मेरी सीट के नीचे है रोहन ने धयान किया और , लगभग झुकते हुए उसकी स्लीपर अपनी सीट से निकाल कर उसके पैरों की और बढ़ा दी ! गुंजन की माँ ने कहा , रोहन बेटा ज़रा साथ में चले जाना गुंजन के वाशरूम तक ! रोहन के लिए जैसे कितना सम्मान व्यक्त किया हो किसी ने ! थोड़ी देर में दोनों वापस आये ! रोहन का खाने का पेकेट वैसा ही पड़ा था ! माँ ने दो खाने की लगा रखी थी! एक रोहन की और एक गुंजन की और दोनों ही रोहन की सीट पर रखी थीं ! गुंजन ने अपनी थाली उठाई और उसमे से दो पूड़ियाँ जल्दी से पुरे अधिकार से रोहन की थाली में रख दी , मुस्कुराते हुए !
रोहन बोल : अच्छा जी , और ये जो पेकेट है वो कौन खायेगा ?
गुंजन : क्या है इसमें ?
रोहन : खाना !
गुंजन : अच्छा , पेकेट खोलो तो !
रोहन ने पेकेट खोला : गुंजन ने लगभग उछलते हुए वो पेकेट रोहन से ले लिए और खाने लगी !
गुंजन की माँ : अच्छा आलू की भुजिया और पूड़ी होगी अचार के साथ ?
रोहन : हाँ जी !
माँ : बस तो अब वो कुछ भी नहीं छोड़ने वाली , तुम भर पेट खा लेना ...अपनी भी और उसकी थाली भी ! गुंजन को भुजिया पसंद है , रोज़ टिफिन में भुजिया ही ले जाती है !
रोहन : जी अच्छा !
रात के ११ बज रहे थे ! माँ ने गुंजन का बिस्तर लगा दिया था ! गुंजन को उसके बड़े भैया ने रोहन की सीट पर से गोद में उठा कर उसकी सीट पर लिटाया ! वो रोहन की सीट पर ही सो गयी थी ! रोहन पूरी रात जागते हुए , बैठे हुए काट लेना चाहता था गुंजन के लिए ! किन्तु ये व्यवहारिक नहीं था , संभव भी नहीं ! रात बीती सब सो कर उठ गए , गुंजन भी ! रोहन सोया ही नहीं ! सोचता रहा पूरी रात क्या परिवार इतना ज़रूरी है बच्चों के लिए !! काश मेरे लिए भी कोई इतना परेशान होता ! सुबह की चाय बिकने लगी ! उपमा , वडा , इडली, डोसा बिरयानी सब ! गुंजन के परिवार ने चाय ली , चाय वाले ने खुद रोहन को भी दी एक ही परिवार की तरह ! रोहन एक दिन पुरानी रिश्तेदारी में था अब ! गुंजन ने लगभग धक्का देते हुए रोहन की सीट पर कब्ज़ा कर लिया ! स्पर्श विस्तृत परिभाषाये लिए हुए था ! दिन भर सब एक दुसरे से बात करते रहे , गुंजन और रोहन की बातों को कल जिस तरह उसके भैया मोनिटर कर रहे थे, आज वो चीज़ नहीं थी ! सब अपनों का सा था !
अंततः ,एर्नाकुलम आ गया ! सब उतर गए ! रोहन का पता तो सब के पास था - दिल्ली रोहिणी का अनाथाश्रम ! गुंजन का पता नहीं था ! बस सफ़र ख़तम , रिश्ते ख़तम जुड़ने से पहले ! एक दुसरे को अनमने ढंग से विदा देते हुए गुंजन और रोहन दूर हो रहे थे !
रोहन अपने रिश्तेदार के घर १० दिन बिता कर वापस दिल्ली लौट गया था ! वापसी में खालीपन था ! पूरा रास्ता अकेलापन ! जिस भी स्टेशन पर ट्रेन रूकती उतर कर देखता की कहीं इसी ट्रेन से तो वो भी कहीं ना जा रही हो !! सपने आखों के खुले होने पर नहीं देखने चाहिए , ज्यादा तकलीफ होती है , पूरा न होने पर ! दिल्ली रेलवे स्टेशन उतर के बस से खुद ही आश्रम पहूचा ! फिर से वो ही ज़िन्दगी चलेगी अपनी रफ़्तार से !!
बिस्तर पर लेता ही था की रोहन रोहन की आवाज़ लगता चौकीदार उसके पास आया और बोला : मनेज़र जी बोल रहे हैं तुमको !
रोहन : क्यों क्या बात हुई ?
चौकीदार : पता नहीं !
रोहन : कुछ तो पता होगा भाई ?
चौकीदार : हाँ , कल कुछ लोग आये थे ,बच्चा गोद लेने के लिए ! उनकों १२ साल का बच्चा चाहिए था , शायद से तुम्हारा नाम सुझाया था मनेज़र जी ने ! हो सकता है वो ही बात करने किए लिए बुला रहे हों !
रोहन का मन खराब हो गया ! अगर यहाँ से भी चला गया तो गुंजन से मिलने की आशा भी ख़तम हो जाएगी !! फिर भी वो अनमने ढंग से वहां गया !
रोहन : जी सर , आपने बुलाया ?
मनेज़र : हाँ रोहन , आओ बैठो !
रोहन : मैं ठीक हूं सर !
मनेज़र : रोहन कल कुछ लोग आये थे ! उनको बच्चा गोद लेना था , तुम्हारी ही उम्र का ! मैंने तुम्हारा नाम सुझा दिया लेकिन ये भी कहा है की अगर वो लड़का यानि की तुम अगर नहीं चाहोगे तो नहीं दे सकेंगे ! आज शाम को आ रहे हैं वो , तयार रहना कोई ज़बरदस्ती नहीं है मन करे तो जाना नहीं तो हम हैं ही !
रोहन : जी सर !
क्या करू ? क्या ना करू ? अच्छे भविष्य के लिए खुद को गोद दे देना ही ठीक है पर ......!
शाम के चार बजे और मनेज़र जी का सन्देश ले कर चौकीदार फिर आया रोहन के पास : चलो वो लोग आ गए है ! अछे घर के लगते हैं ! एक छोटी लड़की भी है उनके साथ तुम्हारे ही उम्र की !
रोहन सोचने लगा वो ही सब जो इस समय आप लोग सोच रहे हैं !!
वो मनेज़र के कमरे की तरफ लपका हाफ पेंट में ही ! सपने सच भी होते हैं ! गुंजन अपने माँ , पिता और भैया के साथ खड़ी थी , रोहन को देखते साथ उस से लिपट गयी और उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ अपनी कर में ले चली ! चार बीत गए इस बात को ! आज सोलह साल का है वो !
पूना के राष्ट्रिय नाट्य विद्यालय में पढ़ने चली गई है आजकल गुंजन ! हर हफ्ते चिट्ठी लिखती है रोहन को ! जो हर दसवें दिन रोहन को मिल जाती है ! आज दसवां दिन था और हलकी बारिश ने इंतज़ार ज्यादा लम्बा कर दिया था ! डाकिया अंकल नहीं आये थे शाम के ५ बजे तक भी !
उधेड़बुन में था की अचानक गली के कोने पर उनकी आवाज़ सुनाई दी !
गेट की तरफ दौड़ा!
लेकिन अंकल के पास चिट्ठी नहीं थी आज !
रोहन : क्यों ?
बेटा ये मैं कैसे बता सकता हूँ : डाकिया अंकल बोले !
ठीक है ,कल ज़रूर ले कर आना ! एक सोलह बरस का लड़का अपने रूंधे हुए गले से अंकल से ये कह रहा है ! ये बात अपने आप में ना जाने कितने प्रश्नों के उत्तर और उनके आगे के प्रश्न लिए हुए है जो शाब्दिक विवरण नहीं चाहती !
अकेलापन आश्रम में भी था ! भविष्य यहाँ बनता किन्तु साथ जो चाहिए था वो नहीं है ! सपने भी क्या सीमाओं में देखे जाने चाहिए ? नया प्रश्न रोहन हो परेशान कर रहा था ! धीरे से डाकिया अंकल बोले - एक चिट्ठी नीचे रहगे थी देखता हूँ किस की है - अरे, रोहन तुम्हारी ही है ! रोहन ने चिट्ठी ली और दौड़ पड़ा अपने स्टडी रूम की तरफ ! माँ सब देख रही थी ! डाकिया अंकल से बोली भाई साब अन्दर आ जाइए एक कप चाय पीते हैं ,आज ठडक बहुत है और आप खुशिया लाये हैं मेरे रोहन की ! इस स्नेह निमंत्रण को डाकिया अंकल मना नहीं कर सके !
समय ,रिश्ते बुनता है !!
---:: मनीष सिंह ::---
Tuesday, April 30, 2013
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