Wednesday, November 13, 2013

एक कहानी : " अखबार, लोगे बाबू !! "

         " शलभ " कोलकत्ता के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हवाई अड्डे से बहार आ कर अपने लिए भेजी गयी टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था कि तभी ड्राईवर का फ़ोन उसके मेहेंगे मोबाइल पर आया और उसने आधे घंटे का बाद आने कि बात बड़े परेशानी से कही कि ट्रेफिक में फंस गया है ! 
           ये बात जैसे " शलभ " के लिए जैसे मन कि मुराद  पूरी होने जैसी थी ! वो तो चाहता था कि बरसों बाद अपने शहर आया था तो कुछ समय मन भर इसे देख ले कि कितना बदल गया है कोलकत्ता और उसकी वो गालियां जहाँ वो " अमृत बाजार पत्रिका " और " दैनिक आज " अखबार को सड़कों पर दौड़ दौड़ कर बेचा करता था टैक्सी वालों , रिक्शा वालों , साईकिल वालों , ठेलों वालों , मछली वालों , डबल रोटी वालों, चाय वालों , कार वालों , बस में , ट्राम में , मेट्रो स्टेशन के बाहर , रेलवे स्टेशन पर , हावड़ा ब्रिज के इस पार से उस पार मिनी बस में , हुगली नदी कि लहरों में नाव पर " झाल मुढ़ी " खाते हुए , कुल्हड़ में दो घूँट चाय को सुड़कते हुए हाफ पैंट और नीली हाफ कमीज़ में ! 
             कोलकत्ता कि पहचान " पीले और काले " रंग कि एक टैक्सी को शलभ  ने प्रीपैड काउंटर से बुक किया और होटल का पता बताते हुए चलने को कहा ! एयरपोर्ट से सिर्फ १० मिनट कि दूरी पर ही था होटल ! टैक्सी ड्राईवर ने  मायूस हो कर शलभ को देखा और अटेची ले कर डिक्की में डाली ! तब तक शलभ टैक्सी में बैठ चुका  था ! लेपटॉप का बैग अपने साथ ले कर !

टैक्सी डाइवर : कोथाय थिके एशेछैन अपनी ? ( आप कहाँ से आये हैं ? ). 

शलभ : काठमांडू !

टैक्सी डाइवर : ठीक आछे ! कोलकाताये कि काज ? ( कलकत्ता में क्या काम है ?) 

शलभ : एक बड़ा ठेका मिलने वाला है अनाथालयों में कपडे सप्लाई का , उसकी हो मीटिंग है सरकारी अधिकारिओं के साथ कल !

टैक्सी ड्राईवर : आप क्या करते हैं ?

शलभ : नेपाल में गारमेंट कि एक बड़ी विदेशी कंपनी में बड़ा अधिकारी हूँ !

टैक्सी ड्राईवर : सही है !

टैक्सी छोटी बड़ी गलियों से होती हुई गुज़र रही थी ! शलभ ५ साल के बच्चे कि तरह एकटक  अपनी ठुड्डी को टैक्सी कि खिड़की पर टिकाये बाहर  सब देखता जाता था और कुछ सोचता जाता था ! 

             विक्टोरिया मेमोरियल के सामने से गुजरते हुए हाफ पेंट में घुमते बड़े , छोटे लोग मॉर्निंग वाक करते दिखे ! उनके साथ उसने खुद को दौड़ता पाया बायें हाथ पर अखबार लिए ! ले लीजिये बाबू आज कि सबसे पहली खबर है मेरे पास ! साथ में २ पन्नो का एक मेगजीन भी है " फोकट " का ! किसी को दो रूपये किसी को डेढ़ रूपये का, पचास पैसे उधार कर के सब अखबार २ घंटे में बेच डलता था " शलभ " ! फिर काका कि दूकान पर कुल्हड़ कि चाय और फेन खाता था ! वापसी में एक रुपए कि जलेबी और दही ! बस हो गया नाश्ता ! पास का स्कूल और स्कूल में  मास्टर जी कि डाँट ! अनाथाश्रम में ही रहता था ! वहीँ हावड़ा ब्रिज के उस कोने पर तो था वो घर जहाँ तो आठ साल रहा ! कौन लाया उसको आज तक कोई बता नहीं सका ! जब आया था तो घोषाल दा थे और अब वो नहीं हैं ! उनके समय में ही एक मारवाड़ी परिवार जो नेपाल में कपड़ो का व्यापार करता था ने उसको गोद ले लिया था ! 

" अखबार लोगे बाबू ? "

किसी ने जैसे अचानक चलती हुई ब्लेक एण्ड वाइट पिक्चर के सामने रंगीन शीशा रख दिया हो ! 

एक १० साल का लड़का शलभ के कंधे पर हाथ रख कर पूछ रहा था : अखबार लोगे बाबू ?

शलभ ने अपनी आँखों कि गंगा - जमुना को रुमाल रुपी शिवजटा में सँभालते हुए उस लड़के से पुछा : कितना अखबार बेच लिया अब तक ?

लड़का : १० रुपया का !

शलभ : कितना का लिया है सब ?

लड़का : १०० रुपया का !

शलभ : कितना कमा लेगा ?

लड़का : पता नहीं,  लेकिन मेरे स्कूल का फीस और खाने का पैसा जुट जाता है, बाबू !

शलभ के तन में जैसे सिहरन सी दौड़ गयी !

              ये ही तो उसके भी गणित थे उस समय , जब वो अखबार बेचता था ! आँखों कि नदियां उफान पर थीं ! सब बाँध तोड़ कर बाहर आना चाहती थी ! उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला और सड़क के किनारे उस लड़के के कन्धों पर हाथ रखता हुआ बैठ गया ! टैक्सी ड्राईवर भी उतर कर आती जाती गाड़ियों को देखने लगा !

शलभ  ने अपने सिगारदान से महंगा सिगार निकाल कर लाइटर से सुलगाया और अखबारवाले लड़के से  बांगला पुछा : तुमार नाम कि ? ( तुम्हारा नाम क्या है ? ) .

लड़काअनिरुद्ध। 

शलभ : अच्छा अनिरुद्ध ये सब अखबार तू मुझे बेच दो और ये लो १५० रूपए !! 

अनिरुद्ध : जी अच्छा ,  अखबार आपकी गाड़ी कि डिक्की में रख देता हूँ !

और उसने वैसा ही किया ! फिर से उसके पास आ कर बैठ गया !!

शलभ सिगार के कश लेता जाता था और अनिरुद्ध से बतियाता जाता था !

शलभ को कुछ देर बाद ये महसूस हुआ कि अनिरद्ध उसकी बातों को ठीक से सुन नहीं रहा है , तो उसने अनिरुद्ध कि तरफ देखते हुए पुछा : कि रे कि होलो ? ( क्या हुआ ? ).

अनिरुद्ध ने परेशानी भरे अंदाज़ में जवाब दिया : मुझे जाना होगा दादा !

शलभ : क्यों, तुम तो ये अखबार २ घंटों में बेचते हो , और १०० रुपया कमाते हो जो कि तुम आज ५० रुपया ज़यादा कमा ही चुके हो फिर किस बार कि जल्दी है ! अभी तो डेढ़ घंटा है तुम्हारे स्कूल को खुलने में !

अनिरुद्ध : दादा , सब अखबार तो आपने ले लिए हैं और आज  मदर टेरेसा के अनाथाश्रम में अगर मैं आज अखबार नहीं दूंगा तो वहाँ कि सिस्टर बच्चो को खबर कैसे सुनाएंगी ,असेंबली में ?

आज बेनेर्जी बाबू कि पान कि दूकान पर अखबार नहीं गया तो वहाँ के लोग कैसे अपना बीड़ी सिगरेट लेंगे !

वो मेट्रो वाले ड्राईवर दादा आज परेशान हो जाएंगे ! 

घोष जी कि दूकान पर आज चाय कैसे बिकेगी !

सरकार अंकल आज अपनी बाउड्री से बाहर ही खड़े रेह जाएंगे , नाश्ता भी नहीं लेंगे !

शलभ सब सुनता जा रहा था !

मानो पूरा कोलकत्ता अनिरुद्ध के ही चलते रहने पर चलता हो ! ठीक पंद्रह साल पहले ऐसे ही ये कोलकत्ता शलभ के चलने पर चलता था !

शलभ ने अनिरुद्ध कि भावनाओं का सम्मान करते हुआ , सब अखबार उसको वापस किये और ५० रूपये और दिए ये कहते हुए कि तुमने मुझे कुछ भी भूलने नहीं दिया अनिरुद्ध - धन्यवाद !.

टैक्सी आगे बढ़ गयी !

              काली मंदिर के सामने से गुजरी तो शलभ ने प्रणाम किया और फिर खो गया अपने बचपन में ! पास के मेट्रो स्टेशन से मेट्रो ले कर पूरा महीना दसवीं के एग्जाम दिए थे ! जोमेट्री बॉक्स नहीं था तो मंदिर के पास कि जानी बाबू से रिक्वेस्ट कि थी और उन्होंने उसे बिना सवाल किये जोमेट्री बॉक्स और एक फाउंटेन पेन स्याही भर कर दिया था अपने आशीर्वाद के साथ कि सफल हो जाओ !  रिज़ल्ट  के दिन शाम को जब घोषाल बाबू जी अनाथाश्रम कि देख रेख करते थे , ने उसको और उसके दो साथियों को पास होने कि ख़ुशी में ५० - ५० रूपये दिए थे ! शलभ दौड़ता हुआ काली मंदिर आया था ! माँ को प्रणाम कर के जानी बाबू को जोमेट्री  बॉक्स के पैसे चुकाए थे ! १५ साल पहले ही पूरी कहानी उसके सामने से गुजर रही थी !!

टैक्सी ने हार्न बजाया ! शलभ का ध्यान टूटा ! सामने से सर पर मछली लिये एक मछली वाली जा रही थी ! ताज़ा ताज़ा मछली कहाँ मिलती है कोलकत्ता के सिवाय !

             टैक्सी धीरे धीरे होटल के पास पहुच रही थी ! टैक्सी से लगभग सट कर ट्राम चल रही थे ! पैदल कितना रेस लगता था शलभ ट्राम से अपने बचपन में ! अखबार हाथों में लिए पूरा का पूरा इलाका नाप लेता था ! वो दिन याद जब वो ट्राम में एक मारवाड़ी परिवार जो कोलकत्ता घूमने आया था को हिंदी अखबार बेच रहा था उस से उनकी धोती कि तारीफ़ निकल गयी ये कहते हुए :

         साब , आपकी धोती में जो डिजाइन है अगर उसमे लाल रंग का एक धागा और पड़  गया होता तो ये सुनेहरा रंग और खिल जाता सफ़ेद रंग कि धोती पर ! बस उन्होंने मुझे कानून गोद ले लिए और अपने साथ नेपाल ले गए ! देस विदेस में पढ़ कर अपना काम कर रह था , कपडे कि ट्रेडिंग का ,  पर काम सीखने कि ठानी और बड़ी कंपनी में आज बड़े पद पर है ! उसी  के सिलसिले में कोलकत्ता आया है ! अपने शहर  कोलकत्ता जो  आज भी अपने आँचल में कई शलभ , कई अनिरुद्ध लिए चलता है !
        हावड़ा ब्रिज आज भी अपनी छाती पर सैकड़ों गाड़ियों का बोझ ले कर खड़ा है ! हुगली ने जाने कितना पानी सागर में मिला दिया ! इन पंद्रह सालो में !

सुदीप्तो : दादा , होटल आ गया !

शलभ ने बिना टैक्सी से उतरे सुदीप्तो से वापस विक्टोरिया मेमोरियल चलने को कहा !

सुदीप्तो : क्यों दादा ? अभी तो वहीँ से आये हैं !

शलभ : सुदीप्तो मैं एक चीज़ भूल आया वहाँ कि सड़कों पर ! जल्दी चलो नहीं तो कोई और ले जाएगा !

सुदीप्तो हल्का सा मुस्कुराया और टैक्सी ले कर चल दिया वापस उसी रास्ते पर जिस से आया था !

दोनों कि निगाहें इधर उधर कुछ तलाश कर रही थीं और वो था कि दीखता ही नहीं था ! ( आप भी समझ गए ना कि क्या तलाशना है ? ).

आधा घंटा बीत गया ! वो नहीं दिखा ! सुदीप्तो और शलभ जैसे एक सुई तलाश रहे थे कोलकत्ता कि भीड़ में !

टैक्सी रेड लाइट पर रुकी , किसी ने शलभ के हाथ पर छूते हुए पुछा : अखबार लोगे बाबू ?

शलभ  ने गहरी सांस भरी और बहने दिया गंगा जमुना को !

दरवाज़ा खोल कर अनिरुद्ध को टैक्सी के अंदर बैठा लिया और चल दिया उसके अनाथाश्रम क़ानूनी कारवाही ख़तम करने के लिए !

तभी उसके फ़ोन कि घंटी बजी !

दूसरी तरफ से : तुम अभी होटल नहीं पहुचे शलभ,  मेनेजर का फ़ोन आया मेरे पास था !

शलभ : बाबा , अपने लिए एक भाई तलाश रहा था !

बाबा : मिला ?

शलभ : हाँ , बिलकुल मेरे जैसा है !

                                                                                        : By Manish Singh