Wednesday, January 9, 2013

........कच्ची सड़क की पक्की रोड पर ....अनवरत ,निरंतर

                    दिसम्बर महीने का दूसरा हफ्ता था वो साल 2012 का ....भारत के पूर्वी नवीनतम राज्य झारखण्ड के एक मशहूर औद्योगिक शहर " टाटानगर " से हम वापसी कर रहे थे ! सुबह के तकरीबन 6 बजे के आस पास रेल गाड़ी का समय था! एक ही रेल से और भी कई मेहमान वापस अपने अपने घरों को जाने को थे !! मामा जी ने सभी के लिए अलग अलग ऑटो का इन्तेजाम करवाया था ! 
                सवेरे के 4 बजे लगभग सभी लोग जाग गए , चाय , बिस्किट, नमकीन सब कर लिया गया ...अब शादी का घर है तो इन सब चीजों की कमी तो होती नहीं है ! धीरे धीरे सबने अपने अपने सामान समेट लिए ..सब ने स्वयं को तयार किया और सर्दी की सुबह चलने की लिए चेहेल कदमी करने लगे ....!! ऑटो की आवाज़ों  ने  देर रात को सोये नया बाज़ार को झकझोर कर उठा दिया ...!! सबने अपने अपने सामान बटोरे और पहुच  गए लोह पथ गामिनी स्थल ...!!
               कितना असहज हो जाता है ना उन्ही लोगो का कुछ देर साथ रहना रेलवे स्टेशन पर ....और ज्यादा तब मुश्किल होती है जब सब को एक ही गाड़ी में जाना हो और सीटें अलग अलग बोगी में ....रिश्ते भी अलग अलग ......सबकी अपनी अपनी पहचान अपने अपने शहर में , सबका अपना रुतबा उस मेह्मानावाज़ के यहाँ ...किन्तु टाटानगर के प्लेटफोर्म नंबर 3 पर सब जहाँ तहां बैठे कर गाड़ी का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं ..... मामा जी सब के लिए चाय का इंतज़ाम करने में लगे हैं ....सब अपने अपने में मगन ...ये सोचते हुए ...कोई कुछ पूछ ना ले ...कोई सम्मानित करने वाला सवाल नहीं ...कोई मतलब हल करने वाली सुचना ...जैसे मोबाइल नंबर ....!!
            खैर जैसे तेसे कर के 20 मिनट्स कटे ! पुरुषोत्तम एक्सप्रेस आई , हम सवार हुए और वो चलदी ....मामा जी ने सब को एक एक कर के धन्यवाद दिया और अपने यहाँ अगले कार्यक्रम में आने का निवेदन किया !! सब ने अपने अपने डब्बों से हाथ हिला कर अनुग्रह की स्वीकारोक्ति प्रदान करी ....!! 
               मिठाइयाँ मिली थीं ! खाना मैंने चलती ट्रेन में खाना परोसने वाली एक रेलवे की सेवा पर आदेशित किया और वो मुग़लसराए में आ भी गया !! इस बीच गया - हाँ जी वही स्थान जहाँ भगवान श्री महात्मा बुध को बरगद के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी से भारतीय नवयुवकों की टोली हमारे कोच में चढ़ गयी ... कहने को हमारा कोच तीसरे दर्जे का वातानुकूलित कोच था किन्तु सब नयी पीढ़ी के लोग आ गए उसमे ...जी हाँ को भेद भाव में विशवास नहीं रखते सब सामान हैं उनकी निगाह में !! अब सब लोगो की तो पूछिए मत क्या हालत होगयी इतनी भीड़ हो गयी की ए सी क्या सामान्य हवा भी मुश्किल थी ... !! सामान्यत वातानुकूलित कोच में सब कुलीन लोग चलते हैं ...जो किसी से बोलते नहीं ...इस लिए नहीं की वो गूंगे होते हैं ..इस लिए की कही किसी  के सामने असलियत खुल ना जाये ...बिना बोले क्लीन बने रहिये ...!! किन्तु आज वातावरण एसा नहीं था कुछ लोग चाहते थे की कोई उनको सुने ....बोलने के भूखे ...बस ....
              हमारी 6सीटों से बस एक आगे एक बड़ी ही कर्कश आवाज़ वाली एक कथित कुलीन अधेड़ उम्र की रही होंगी महिला बैठी थीं , संत , ,साधू  सद्भावनाओं की चलती  फिरती भोंपू लगी ठेली ...जिसको सुनकर सब चाहें की जल्दी से आगे निकले ...किन्तु यहाँ तो खेल बिलकुल अलग था ...बेचारे बच्चे जो किसी कारण से इस बोगी में सवार हुए थे और उनके साथ कुछ और लोग भी चढ़ गए थे ....कहीं नहीं जा सकते थे ...उनको तो सुनना ही था उस महिला को ...!! एक सरदार जी भी थे ...वो अफगानिस्तान से लौटे थे और वहां पर बोली जाने वाली भाषा की तरह से हिंदी और पंजाबी बोल रहे थे ..वो महिला , स्वित्ज़रलैंड , फ़िनलैंड , अफगानिस्तान और ना जाने कहाँ कहाँ घूम कर आइ थीं , सबसे बुरा उनको भारत ही लग रहा था फिर भी लगभग 6 घंटो से बोले जा रही थीं विषये कोई नहीं ...बस बोलने से मतलब ...ऊपर नीचे , आस , पास यहाँ वहां सब परेशान ....किसी को उनकी बात सुन्नानी ही या नहीं बस उनको बोलने से मतलब ...एक बेचारी लड़की बार बार अपनी ऊपर की सीट से नीचे उतर कर के सर पकड़ कर बैठ जाती ...फिर किन्कर्ताविमूद हो कर ऊपर चली जाती ...लेकिन ज़रा भी तरस नहीं आता उन महिला को उस पर और बस बोलते जाती ....!!
          जब गाड़ी ने मुग़ल सराय में एंट्री मारी तो मेरी सिस्टर ने अग्रेजी में जोर से कहा " विल यू आल नाव कीप क्वाइत प्लेज ? पता नहीं कितना बोलते हैं आप लोग ..आपको परवाह है की कोई सुन्ना भी चाहता है की नहीं !! अबे मैंने कमान अपने हाथो में लि ली ... सर में दर्द कर दिया भाई !  वो महिला बोली किस के सर में दर्द हो गया भगवान् के नाम लेने पर ...मैंने कहा मेरे और भगवान् दोनों के ...अब कृपा कर के चुप हो जाइये .. 7 घंटो से बोले जा रहे हो ...इंसान की जैसे जैसे उम्र होती जाये उसको गंभीर होना  चाहिए पर आप तो ...हे भगवान् ...!! वो बोली : हमने तो पहली बार सुना की बड़ो को कम बोलना चाहिए ...मैंने कहा ...आज सुन लिया ना .अब किरपा कर के चुप हो जाइये ..सर में दर्द हो गया ... और ये बेहेस कुछ 5 मिनट्स चली होगी ...और वो बोली ठीक है हम चुप हो जाते हैं ...तो मैंने कहा थैंक यू ....थैंक यू ...और कुछ 2 मिनिट्स बाद वो चुप हो गयी ...तब एसा लगा सब को जैसे " आपके सर पर कोई गिद्ध बैठा हो और वो बिना गन्दगी    जाये !"  या आपके ऊपर वाले की घर की पानी की मोटर लगातार आवाज़ करते करते बंद हो जाये , या फिर आप किसी डग्गामार बस में बैठे हो और अचानक आपको लगे की बस वाले को आप पर दया आ जाये ओर कहे की चलो आब आगे वो नयी वाली बस जाएगी ...या आप बड़ी देर से लघुशंका रोके बैठे हो और अचानक मौका मिल जाये .....इत्यादि इत्यादि ....
            दर असल हम सबने अपने अपने आस पास कच्ची पक्की दीवारें बना रखी हैं ...और सब को उनके टूट जाने का डर बना रहता है !! पहचान खो जाने का भी डर रहता है ...जबकि सचाई ये है की जब एक पहचान खोएगी तभी तो नहीं मिलेगी ...!!  हमें चलते रहना चाहिए ...कच्ची सड़क की पक्की रोड पर ...अनवरत , निरंतर  कुटुंब बढ़ता जायेगा !!