Friday, March 18, 2011

" आइये रंगों से मन बहलाएं ! "

                          " आइये रंगों से मन बहलाएं ! "
           बस अभी कुछ ही दिनों की बात ही उसको उंगली पकड़ कर टहलने ले जाया करता था ....ये क्या है , वो क्या है .. एसा क्यों है ...ये एसा क्यों नहीं है....और न जाने कितने ही तरह के बचपने के सवाल ....जिनका हर बार उत्तर मेरे पास नहीं होता था ....पर हर बार मेरा मन करता की वो ये सब मुझसे पूछे और मैं जिसका दे सकूं उत्तर दूं और बाकि के सवालों के उत्तर तलाशते हुए सो जाऊ और नए दिन की शुरुवात हो...!
           आज नया दिन है ...साल भर का त्यौहार है होली ....पर कुछ रंग नहीं हैं...कुछ हैं तो कुछ के बिना वो भी अपना वजूद तलश रहे हैं ...!
             मैं पीछे रह गया लगता हूँ ....हमेशा नहीं कभी कभी ..!! कुछ बहुत नजदीकी ही हमें इस का एहसास करते हैं....कमी हमारे मैं ही होती है की...हम समय पर नहीं समझ पाते और खुद को तकलीफ देते रहते हैं... खामख्वाह !!!!
              आप के पास दो ही चीज़ हो सकती हैं ...या तो किसी के पास रहने के अधिकार या किसी से पास से दूर होने का ...जो बीच मैं रहा उसकी तो बस परेशानी ही परेशानी होती है !
   अरे मैं ये सब क्या लिख रहा हूँ....परसों तो रंगों का त्यौहार है ...होली......उस पर बात होनी चाहिए ....और हम ये संब क्या बात करने लगे !!

              दुःख , तकलीफ , परेशानी , किसी दोस्त का दूर जाना , किसी का आपको धोखा देना...और ना जाने क्या क्या ...ये सब रंग हैं जिनसे होली खेलने का अपना मजा है !!
           
                                     हैप्पी होली , हैप्पी होली...हैप्पी होली.
                                                                                                   - मनीष

              

Monday, March 14, 2011

जापान, जी हाँ इस नाम से विकास की परिभाषा लिखी जाती है !

             जापान जी हाँ इस नाम से विकास की परिभाषा लिखी जाती है ....सामाजिक तानेबाने की सोच को नै दिशा मिलती है ....विश्व के सर्वाधिक बुजुर्गो के देश मैं आज हम प्राक्रतिक त्रासदी देख रहे हैं. हजारों जान चली गयी , सालों तक पूरा नहीं हो सकने वाला नुक्सान हुआ ! फिर भी हम अपने जापानी दोस्तों के हौसलों को सलाम करते हैं और उनके इस दुखदाई समय को सहन कर सकने और इस से उबर सकने के जज्बे को सलाम करते हैं .....इस समय मैं हम सब भारत वासी आपके साथ हैं ....जिस भी तरह की आवयश्कता होगी ...हम आपके साथ है.

               हे इश्वर हमें अपने दिए वचन पर कायम रहने और हमारे जापानी दोस्तों को इस त्रासदी को सहन करने की शक्ति दीजिये ..........हम विकास को जारी रखना चाहते हैं और अपने दिशा देने वालों की सम्पनता की कामना करते हैं. आमीन !
                                                                           हम सब भारतवासी आपके साथ हैं.

Sunday, March 13, 2011

जब कहीं हों, बस हम हों ....बदले नहीं !!

       हम जब कहीं हों बस हम हों ....बदले नहीं !

         " जी हाँ कई बार ये सुनने को मिलता है अपनों से की " आप अपने को बदल लीजिये नहीं तो लोग आप को इस तरह ही मुर्ख बनाते रहेंगे और आप धोखा खाते रहेंगे ...." असलियत मैं ये बात कुछ हद तक ठीक भी है...पर पूरी तरह से नहीं ....कम से कम मैं तो नहीं मानता ....! क्यों अरे भाई तजुर्बा है मुझे ...धोखा खाने का और बिना खुद को बदले अपनी नज़र मैं नहीं गिरने का !

                       लोग कुछ सम्बन्ध बनाते हैं कुछ समय के लिए बस कुछ फायदे के लिए ....और उनका मकसद पूरा हुआ और वो चले अपने रस्ते और हम वहीँ खड़े रह जाते हैं लेकिन वही रहने के लायक रहते हैं और वो लोग मुह चुराते हुए ....दर दर भटकते रहते हैं ....जगह तलाशते रहते हैं की कही जिसको उन्होंने धोखा दिया है उससे सामना नहीं हो जाये ....आँख नहीं मिला सकेंगे ना इसलिए.

                  हम अपनी नज़र मैं नहीं गिरते ....क्योँ की हम नहीं बदलते ....अरे कोई कितनी बार धोखा देगा ...? कितनी बड़ी है ये ज़िन्दगी....? और ये दुनिए कितनी बड़ी हैं....कभी ना कभी तो मिलना होगा ही ना उस शक्श से .....उस वक़्त मैं नज़र मिला सकूंगा ....और वो ...नज़र चुराएगा !!

    आज मैं एक अवार्ड प्रोग्राम देख रहा था ....उसमे वे सामाजिक कार्यकता को पुरूस्कार दिया गया और उसने अपने शब्द कुछ इस तरह कहे "   मैं ये जानती हूँ की एक रोटी से पूरी दुनिया ka पेट नहीं भर सकता , मैं ये भी जानती हूँ की एक ढाल से हज़र्रों तलवारों से नहीं बचा जा सकता ...और मैं ये भी जानती हूँ एक को सहारा देने से पूरी दुनिया के बे सहारों को सहारा नहीं मिलेगा ....लिकिन मैं अपना काम करती रहूंगी क्योंकि मेरा ये विशवास है की जब दुनिया मैं सताने वालों और बचने वालों की गिनती होगी तो मेरा नाम ...बचने वालों मैं होगा !"

          मैं खुद दो से चार बार कुछ लोगों ka शिकार हो चूका हूँ...उनका नाम नहीं लिखूंगा ....क्यों की उनको हीरो थोड़े बनाना है...! पर मैं ये zaroor जनता हूँ की मैं, मैं था और मैं ही रहूँगा !! wo muh aur apni nazar chupate phir rahe hain....bechare 11

 आप अपने ऑफिस मैं कई बार बहुत कुछ करते हैं....जो सामाजिक दृष्टिकोण से ठीक नहीं पर करना होता है....और ऑफिस से निकले और सब भूल जाते हैं ....और एसा ही करना चाहिए !

                                  जो अपनी नज़र मैं गिर जाता है उसको किसी भी तरह प्रयास नहीं उठा सकता ....उसका कोई नहीं होता ...क्योँ की जब कोई खुद ka नहीं हुआ ....अपने संस्कारों का नहीं हुआ ...उसका कौन होगा ....इसे लोग अपने माँ , पिता को भी अप्सब्द सुनवाते हैनं..जो उचित नहीं है ! अपने संसकारों की भी जड़ों को हिला देते हैं ....और जब एक बार किसी बड़े पेड़ की जड़ ढीली पद जाये तो फिर उसके पुराने पत्ते झड़ने तो निश्ची हैं....और नए पत्ते आने मैं भुत वक़्त लगता है....नए पत्ते आ भी जाएँ तो उनके बड़े बड़े होने ka कोई भरोसा नहीं और वो छोटापन औने आने वाली पीढ़ी मैं भी जाता है .....!!
               सोचिये इस प्रकार के लोग ....सिर्फ अपने लिए ही परेशानी का कारण नहीं बनते बल्कि पुरे समाज के लिए कमजोर बीज bone ka काम करते हैं. और वो लोग जो बदलते नहीं ....वो मस्तक उंचा कर के चलते हैं ....और उनकी naee पीढ़ी संस्कारों की होती हैं....जो समाज को बैलेंस कर के चलती है ....क्यों की सिर्फ एक तरफ झुका पलड़ा टूट भी सकता है....

                 इसलिए ....हम हैं जो कहीं  भी हम ही रहते हैं .....बैलेंस करने से साथ साथ बदलते नहीं ....अपनी नज़रों मैं झुकते नहीं !!
                                                            नमस्ते , आपका अपना ही - मनीष सिंह