Friday, November 18, 2011

........सबके होने की कोशिश करनी चाहिए !

अभी दो चार महीने पहले ही की बात है वो छोटा ही था ... हाँ अपने पिता की बात मानता था ....पर आज लगा वो शायद कुछ मनवाना चाहता है ....बड़ा हो गया है ... !

पिता को लगने लगा है की वो सिर्फ पैसे देने वाली मशीन थे और उनकी पत्नी पैसे दिलवाने वाला कार्ड ..... जब पैसे चैहिये होते थे ...माँ से सहारे से ...अपनी बात कह दी ...और माँ ने अर्रेंग्मेंट कर दिया ... और पिता को ये लगता था की बेटा मेरी इज्ज़त करता है इस लिए मुझ से सीधे सीधे अपनी बात नहीं करता ....किन्तु उनका के धोखा था ... !

अपने पिता को कभी वो दर्ज़ा दिया ही नहीं राहुल ने जो आम बच्चे अपने पिता को पिता होने का देते हैं .....

कभी कोई बात नहीं मानी जो बाप ने कही हो ...जो निर्णय अपने आप किये बस वो ही सही ...और उनको सही साबित करने के लिए चाहे किसी की भावनाए आहत होती हो तो भी परवाह नहीं की .... कभी सामाजिक रूप से जिम्मेदार नहीं बना ... और उसको बनाना भी नहीं चाहिए ... इसे राहुल किसी के नहीं हो सकते ....अपने भी नहीं ...खुद पर भी भरोसा नहीं होता इनको और बाप को भी उसकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह लगाने से नहीं चूकते ....

आज राहुल के पिता नहीं हैं ...अपने मन की आई बातें उन्होंने मुझ से करी ...मुझे दुःख होता है ! वो अपने को हमेशा से छोटा और मजबूर महसूस करते रहे ...उनकी महिस्थाती को क्सिसी ने नहीं समझा ... बाहर वालों को नहीं समझना था... घर मैं वो सम्मान चाहिए था जिस को वो उम्र भर ढूँढते रहे किन्तु सब ने उनको एक सदस्य समझा ....घर का बड़ा नहीं .... अफ्सोसो है ..अफोसोस...!

राहुल आज अपनी चाहतों के कारन कुछ मुकाम पर है ...लेकिन वो अकेला नहीं ...उस जैसे जाने कितने हैं ...पर सब के पिता को इज्ज़त मिली ...सम्मान मिला ... राहुल ने एसा नहीं किया ...इस लिए वो आज अकेला है !

पिता ने उसको इस dharti पर लेन की जो जिमीदारी निभानी थे निभाई ...किन्तु ...मिला कुछ नहीं ...ना वो सम्मान न ही संतुष्टि .... रेल स्टेशन पर सब आपसे बात करते हैं लेकिन ...सब से आप सब उम्मीद नहीं करते ....अपने ही अपने होने का एहसास करते हैं ...!  एसा ना होने पर आप अपनी परिभाषाओं मैं उलझे रहते हैं जब की समाज मैं कुछ और ही चलन मैं होता है ....! सबके होने की कोशिश करनी चाहिए ....सिर्फ अपने बारे मैं तो चार पैर और एक पूछ वाले सोचते हैं ....!




Monday, November 14, 2011

.............रिश्ते, बर्फ खिलोने से !! "

" कड़वी-खट्टी सी दुनिया ,
   मित्र,  शहद  चबोने से !
   अंगारों सी  उम्मीदें  ,
   रिश्ते, बर्फ खिलोनों से !! "


आते -  आते ,आती है
अनुबंधों   मैं   गर्माहट,
घुलते - घुलते, घुलती है,
वर्षों की सब कडवाहट !!
मन गुलाब सरीखे से ,
चाहें, ओस की बूंदों सी,
किन्तु स्वप्न नहीं आते
काँटों  भरे बिछोनो  पे !!

अंगारों सी उमीदें,
रिश्ते, बर्फ खिलोनो से !!


चुटकी- चुटकी , अपनापन ,
अंजुली- अंजुली , आशाएं !
डिबिया-डिबिया , धुप खिली,
कंकर पत्थर     गरिमाएं !!
प्रतिबंधों   के    उजले पथ,
क्षितिज  सरीखी   मंजिलें !   
मिलने  के  कुछ पर्व नहीं ,
ना  खालीपन    खोने में !

अंगारों सी उमीदें ,
रिश्ते, बर्फ खिलोनो से !!