Wednesday, November 14, 2012

रिश्ते भी व्यापारिक कारणों से ही बनाते है , समर्पण के भाव ....से नहीं !!

                        व्यापारी और मौकापरस्त लोग रिश्ते भी व्यापारिक कारणों से ही बनाते है  , समर्पण के भाव ....से नहीं !! बल्कि समर्पित कभी हो ही नहीं सकते .....उन्हें स्वयं का शारीर भी अच्छे पहनने ओढ़ने के बाद ही अच्छा लगता है !! ..... इसे तरह के मानवों से बचना चाहिए ....किन्तु शर्त ये है की उनकी पहचान जल्दी हो सके .....जो की मश्किल काम है उन लोगो के लिए जो मौकापरस्त नहीं होते ...और व्यापारी भी नहीं !!

Tuesday, November 13, 2012

त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!!

                अब देखिये ना .आज दिवाली है ...अन्धकार से रौशनी की ओर जाने का पर्व ! अब अन्धकार किसी भी तरह से परिभाषित किया जा सकता है !!  वैचारिक , वाव्हारिक ,आलोचनातमक दृष्टिकोण इत्यादि इत्यादि ..... !

                अभी शाम के 9.30 बजे हैं और हमारे घर के सामने वाले पार्क को धुआं पूरी तरह से अपने आगोश में ले चुका है ! ठीक सामने वाले ब्लाक की रंगीन झालरें ठीक से नहीं दिखाई पद रहीं !! .... हर ब्लाक के सामने कोई ना कोई अपने अपने अंदाज़ से अपनी पहचान ज़यादा से ज़यादा पटाखे जला कर साबित करने में लगा है !! कितना अजीब है आज कल का माहौल , कल के बीते समय से बिलकुल अलग !! अभी कुछ दिनों पहले ही एक साथी हमें छोड़ कर इश्वर के पास चला गया , और साथ में चली गयीं उनकी यादें !! सब अपने अपने काम में मस्त / व्यस्त ! किसी को शयद याद भी ना आई हो ...और आई हो , तो आई हो ...दिवाली में क्या करियेगा !! दिवाली ही मनेगी !!

                 एक बार एक मित्र ने कहा था की <-> " रविवार से ज्यादा शनिवार को एन्जॉय करते हैं !" इस ख़ुशी में की कल छुट्टी है !! वैसे ही कल मुझे एहसास हो रहा था !!  रात के 10 बजे थे ...छोटी दिवाली के दिन , खाना खा कर के टहलने निकला था ...घर से पास के स्टेशन से होते हुए बसंत रोड पर निकल पड़ा ...वाह निकल गयी मुह से .... अमूमन 9:30 से 10:00 बजे सुनसान हो जाने वाली सड़क ....आज दिन के 10:00 की तरह से शबाब पर थी ...सभी दुकानें खुली थी और खरीदारी हो रही थी .... ! हाँ ये सड़क कुछ वर्षों पहले भी 9:00 और रात के 12:00 बजे गुलज़ार रहती थी ...जब " बसंत " सिनेमा हाल चला करता था .... मैंने भी उसमे एक आखिरी फिल्म देखि थी ...छोटे से अपने भाई अंकुर के साथ ...और फिल्म का नाम था " डर " !! आजकल उस जगह पर एक बहुत ही बड़ी कार बनाने वाली देसी कंपनी का शोरूम खुल गया है !! बड़े ही कुलीन लोग आते जाते हैं ...समय पर और समय पर वो बंद भी हो जाता है !! खैर हम तो सब दुकानों के खुले होने पर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे !! मैं आधे घंटे में वापस आ गया और सोचा की क्यों ना कल की की जानेवाली खरीदारी को आज ही निबटा दिया जाये !
                 हमें एक थैला लिया , और चल पड़े बाज़ार ...रात के 10:45 पर !! मोटरसाइकल पर अब मुझे चोपला मंदिर और मोडल टाउन दिखाई देने लगा था ....बसंत रोड तो पैदल बाज़ार की लिए है ...मोटरसायकल पर तो घंटाघर और बजरिया की मार्किट बनती है ना  ......!! बसंत रोड से होते हुए ... मालीवाड़ा ...डासना गेट और फिर रमते राम रोड से आनंद चिकन ...फिर गंज से होते हुए चोपला ...वाह ...रात के 11:15 हो रहे थे और चहल पहल इस तरह की जैसे 7 तारीख के बाद पड़ने वाले किसी रविवार को होती हो !!
               खील , मीठी खील , खिलोने , बताशे , फल मोमबत्ती  , मिटटी के दिए ...रूई , तरह तरह की झालर ... रंगीन कागजों पर "  हैप्पी दिवाली " लिखा हुआ , पटाखे और ना जाने क्या क्या ....!! एक तबका तो अपनी अपनी संगिनी को ले कर के देसी घी के बने पकवान चखने में मशगुल दिखाई पद रहा था ....कंधे से कंधे टकरा जाएँ इस कदर भीड़ !! आलू की टिक्की , पानी के बताशे ( गोलगप्पे ) की ठेलियों पर तो लोग लाइन लगा लगा कर खड़े इस तरह की ...जैसे आज नहीं खाया तो ये स्वाद फिर शायद अगले साल ही नसीब हो ....!! 
               भगवान् की मूर्तियाँ ...! मोलभाव कर के खरीदते लोग अपने अपने भगवान जी को !! कम से कम भाव दे कर ख़रीदा जा सके ...खरीद लो ...कल उन्ही से जितना ज़यादा से ज़यादा माँगा जा सके !  माँ लक्ष्मी धन की देवी हैं और उन्ही को मोल भाव कर खरीद कर उन्ही से सम्पन्नता की आशा .... ये हम सब करते हैं ! अरे भाई दूकान पर तो मूर्ति बिकती हैं ...और भगवान् तो उनको हम अपने घरों में लाने के बाद बनाते हैं , तो मोल भाव करने में क्या संकोच करना ....अब ये कोई पके पकाए मिलने वाले फ़ास्ट फ़ूड की बात थोड़े ही है .की मोल भाव की संभावनाए नहीं ... !!  कल्कत्त्ता , टेराकोटा और लखनऊ की मूर्तियाँ कुछ जायदा महंगी है ...और जो लोकल मेड हैं ...वो कुछ कम दाम में उपलब्ध हैं ....पर उनको लेने वालों की कमी है ....अब घर में मंदिर को अपने आगंतुक मित्रों को दिखाएँगे क्या //// लोकल , ना जी ... ना टेराकोटा ही लेंगे भले महगी हो ...साल भर का त्यौहार होता है !! 
                  मोमबत्तियां , खील , बताशे , रूई , दिए और बाती खरीदी , एक पान खाया ( सादा ) और एक किनारे मोटरसाइकल खड़ी कर के बाज़ार की चेहेल पहल देखने लगा !! 

1. दीयों के ढेर के बगल में अम्मा जी खटोले पर बैठी थीं , शायद रात में वहीँ सोएंगी , उन दीयों के साथ जो नहीं जलेंगे ....नहीं बिकेंगे !

2. गन्नों का ढेर और उनके बगल में रखा एक तखत जिसपर उनसे जूस निकलने की मशीन लगी थी ...गुमसुम .. अब सर्दियों में गन्ने का रस कौन पीता है ...आज अगर ना बीके तो कल के लिए सोचेगा वो ...

3. मोमबत्तियों के ढेर , पेकेट और लड़ियों के बीच बैठा जुनैद .....जो बिकेंगी वो बिकेंगी नहीं तो फिर उसी अनाथ आश्रम में वापिस कर आऊंगा जहाँ से लाया था !

4. अंग्रेजी , हिंदी में लिखे हप्पी दिवाली की जुमले रंगीन कागजों पर ....अब शायद अगले साल ही कोई ले ....अगर आज नहीं बिके तो ...सोचता हुआ वसीम / तरुण मोल भाव में मगन !!

                पान का बाकि बचा हिस्सा खाया और चल दिया हनुमान जी के दर्शन करता हुआ घर की तरफ !! रस्ते में पूजा और पूजन से सम्बंधित सामग्री मिलती हुई दिखाई पड़ी ...और गर्व हुआ अपने भारतीय होने पर ...हम चाहे कितने भी आधुनिक और मॉल कल्चर के करीब क्यों ना आ जाएँ ...जब अपने संस्कारों और अपनी परम्पराओं की बात होती है तो हम ज़रूर अपने उन सभी पारंपरिक आलेखों को साफ़ कर के अपना लेते हैं जो हमारे बुजुर्गों ने हमें दिए हैं  !  एक रात को ही सही , हम सही में पारंपरिक हो जाते हैं !! कोई समझौता नहीं इसमें !! पूजा की थाल , उसमे सेब , केले , मीठे खिलोने , खील , मिठाई , चांदी का एक सिक्का , चन्दन , अगरबत्ती  , रोली , धुप , फूल माला , मिटटी के दिए , रूई की बाती , सरसों का तेल ...सब वो ही बरसों पुराना ...हम जुटा लेते हैं जैसा की हमारे और उनके माँ पिता ने बताया था !
             1812, 1912 और अब  2012 क्या कुछ नहीं बदला होगा वर्षों में बस लाल किला , ताज महल    को छोड़ दीजिये और भारत भी !! यद्यपि सब बदलता रहता है ...तथापि परिवर्तन का सामीप्य अर्थपूर्ण होना चाहिए !! ... मैं जैसे जैसे अपने घर की ओर बढ़ रहा था बजार की रौनक कम हो रही थी ... और एक अजीब सी शांति मुझे घेरने लगी थी ....रस्ते के निशाचर घूर घूर के मुझे देखने लगे थे ....अपने घर पंहुचा और सब सामान देखा ...कल की पूजन की तयारी पूरी थी !!

              आज ही वो कल वाला कल था ...मैंने अनुभव किया की हम स्वस्थ परम्पराओं और त्योहारों की तैय्यारी को जितना एन्जॉय कर लेते हैं उतना असल में त्यौहार मानाने को नहीं ....!! सहमती हो तो एन्जॉय कीजियेगा ...मुझ से शेयर कर के !! हप्पी दिवाली !! मेरा भांजा ( वासु - मृगांक ) कहता है ...हप्पी दियाली .....( दिवाली नहीं कह पता अभी ...) भवनाये और अनुभव दोनों शब्दों के मोहताज़ नहीं हैं !! 

...किसी के मिटटी के दिए लाने हों , रूई की बाती लानी हो.....

          " दीपावली " जी हाँ रौशनी का त्यौहार ...किन्तु इस के आते ही पुरे मोहल्ले में " प्रतिभावान " लड़कों के कमी सी पद जाती है ...अचानक !!
          सामान्य दिनों में किसी भी कोने पर दो चार के झुण्ड में कभी भी देखा जा सकता है और मन में विचार लाया जा सकता है ..." दिन भी कुछ काम नहीं इनको , बस नुक्कड़ पर खड़े रहने के सिवा " , पता नहीं पढ़ते लिखते भी हैं की नहीं ...आते जाते नमस्ते करवा लो इन से ...अरे बढती जवानी के लड़के हो अपनी बुध्ही का इस्तेमाल करो ...लिकिन मजाल है को कोई तस से मस हो जाए ...!! पता नहीं दिन भर की विषय पर चर्चा करते हैं की ख़तम ही नहीं होती ? और अगर कभी कभी दूर भी जाते हैं तो ये कहते हुए की ...चल मिलते हैं ..." बताइये .....ये क्या बात हुई !! कपडे ब्रांडेड पहनेगे ...!! वैसे तो सब रहते सूटेड बूटेड हैं फिर भी इनको अपने घर में कोई निमंत्रण दे कर नहीं बुलाता !!
        लेकिन दिवाली के आते ही देखिये इनका जौहर !! क्या थॉमस अल्वा एडिसन , जेम्स वाट ने बिजली और रौशनी की ख़ोज में अपना कमाल दिखाया होगा ...उन महान लोगो से 100% ज्यादा महानतम काम में दख्श हो सकते हैं ये नुक्कड़ के लड़के !! कैसे ? लीजिये कुछ उदाहर्ण प्रस्तुत हैं :

       अब तीन दिन बाद धनतेरस होने की बात चल पड़ी थी मोहल्ले में ! गोस्वामी जी का बेटा इस साल शायद आ ना सकेगा दिवाली में ...अभी पिछले साल ही तो 12000वि रैंक आई थी उनके बेटे की ...ओ बी सी और उसके दादा जी के स्वतंत्रता सेनानी के कोटे से एक दोयम दर्जे के एन्जेनिरिंग कालेज में दाखिला मिल गया था ... कम्पुटर साइंस में !! मारे गर्व के फूले नहीं समाते थे दोनों ! वैसे दो बेटियां है बड़ी डबल एमे , और एक लड़के से छोटी बी एस सी कर रही है माइक्रो बैलोजी में लेकिन उनको तो अपने बेटे की दोयम उपलब्धि पर नाज़ था ...बड़ी बेटियों की शादी हो चुकी थी और छोटी अभी पढ़ रही थे ...गिन के तीन लोग घर में ....बेटे के जाने के बाद !!  गोस्वामी जी ज़रा शारीर से कैलाश पर्वत सामान थे ....तो चलना मुहाल था ...और पत्नी जी ..बस झाड़ू लगा लेती थी ...और बाकि घर का काम काम वाली करती है !! खाना पीना तो बिना किसी संकोच के छोटी बेटी करती थी !!
      अब धनतेरस आ रहा है ! सफाई करनी है ! और घर सजाना है ...! भीतर भीतर का सजाना हो बड़ी शुध्ही से सब ने मिल कर कर लिए लेकिन बाहर की लड़ियों और साज सज्जा का काम कौन करेगा .....?? बेटा तो कालेज में कुछ और ही सजाने में मगन है इस साल , पिता जी शरीर संभल रहे हैं ...!! फ़ोन कर के इलेक्ट्रिशियन को पुछा तो बोला " 1000 रूपय लगंगे और दो दिन बाद आऊंगा ! अरे कल धनतेरस है और वो दिवाली वाले दिन लाइट लगाएगा तो क्या तो लक्ष्मी जी आएँगी और क्या मोहल्ले में इज्ज़त रहेगी ? अब क्या किया जाए ?

    अब शुरू होती है मोहल्ले के सब से नाकारा लड़कों की !! आज क्या पता भगवान् धन्वन्तरी के आशीष से प्रतिभा उनमे से अचानक प्रफुल्लित होने लगती है !! और सबसे अजूबी बात की गोस्वामी जी जैसे ना जाने कितने मोहल्ले वाले लोगो को ये दिखने भी लगती है !! सा सम्मान अपने घरो में उन्ही लड़कों को आमंत्रित करते हैं इन शब्दों के साथ : " बेटा - ज़रा हमारी भी लड़ियाँ देख लेना ! रोहन के जाने के बाद हमें तो कुछ पता ही नहीं की की कैसे के होता है !! अब तुम खुद ही देख लेना और सजा देना अपने आप सब ठीक से .... वो अन्दर के दीवान के अन्दर रखी हैं .... अंजू मदद कर देगी ढूँढने में ...!! अब देखिये क्या कमाल की बात है ! जिन लड़कों के साये से भी पुरे साल अपने बच्चों को ये दंपत्ति दूर रखता है वो आज दिवाली के मौके पर अपने घर में आने का आमंत्रण देता है और अपनी बेटी के साथ हाथ बटाने की बात करता है !! कमल का टेलेंट जन्म ले लेता हैं इनमे !!  कोल्ड काफी , हॉट टी और बर्गर के साथ लाइटिंग का काम पूरा कर के ही हटाते हैं ये प्रतिभवान लड़के ! एक से काम ना निबटे और अगले घर की टी भी लेनी हो तो मिल जुल कर काम करते हैं ....कैसी भी उलझी लड़ियों का काम हो ...बास चुटकियों में सुलझा देते हैं भाई !! बड़े गुणी लड़के हैं !! रंग बिरंगी झालर , बाज़ार से लाते हैं ...पसंद ना आये तो बिटिया को उन्ही के 1995 के स्कूटर पर बैठकर ले जा कर पसंद करवा कर जिमेदारी से लगते हैं !! बिजली तो उस दिन जैसे कालिया नाग बन जाती अहि उस दिन ...बिलकुल सीढ़ी और आज्ञाकारी ! कैसी भी समस्या मिनटों में सोल्व ! फिर आशीर्वाद मिलता है तानो के साथ : बेटा तुम इतने समझदार और होशियार हो ...सारा दिन घुमते रहते हों थोडा पढ़ा लिखा करो ...!  अब इनसे पूछे कोई ये सब क्या ज़रुरत रहती है कहने की ?  खुद का बेटा चाहे अपने कालेज के घर को ना सजा  कर अपने टूशन टीचर के घर की लड़ियाँ ठीक कर रहा हो लेकिन , इनको तो हम में खोट दीखता है ना !!
             आधुनिकता और तेज़ चलती इस दुनिया में हम भारतियों के त्यौहार आज भी अपनी गरिमा और गति बनाये हुए हैं जो काल के चक्र के चलने के बावजूद अपनी धुरी से अलग नहीं होने देता ..... जैसे ये लड़के पुरे साल जी घर में सिर्फ अपनी नज़रों से दाखिल होते रहते हैं को त्योहारों के मौके पर सा शरीर निमंतरण दे कर बुलाये जाते हैं और जिम्मेदारी से अपना काम कर के फिर अगले बरस की प्रतीचा में लग जाते हैं ....और ये सिलसिला चलता रहता है ..अगली पीढ़ी के आने तक !!  किसी के मिटटी के दिए लाने हों , रूई की बाती लानी हो, खील , खिलोने , बताशे लाने हों , गणेश , लक्ष्मी की मूर्ति लानी हैं , गेंदे की फूल माला , आम के पत्ते , घर के दरवाजों पर तोरण सजाना हो ....या भी लड़ियों के ठीक किये जाने से ले कर उनको लगाने तक के सब काम कर सकने की प्रतिभा जिन लड़कों में है वो शिक्षित किस मायने में नहीं है , ये निर्णय कौन करेगा !! शायद वो लड़के स्वयं क्यों की स्वयं का मूल्यानकन .... प्रमाणिक और प्रत्यक्ष होता है !! साल भर के बाद एक बाद कार्य को करवाते समय गुणों का आंकलन ...अनुबंधित होता है !!
              आज मोहल्ले और गलियों की धमनियों में बहता अपनापन निजिता और सामाजिकता को जीवित रखे हुए है , इश्वर से प्रार्थना करते हैं की मोहल्लों की जीवन्तता ऐसे ही बनाये रखिये !!
   

Sunday, November 11, 2012

अंजुली-अंजुली धुप छुपाकर....

अंजुली-अंजुली धुप छुपाकर,
चुटकी - चुटकी रंग बांटूं !
पलकों - पलकों ख्वाब छुपाकर,
सतरंगी   आँचल बांटूं !!

खुशबू- खुशबू गलियां सारी ,
आँगन - आँगन उजियारा !
जुगनू का सा हो जाऊं और,
रौशनी   केवल   बांटूं !!

**** हैप्पी दिवाली ****