आप शब्द बन गए मेरी भावनाओं के ,
सारा अंतर तरन्नुम में बजने लगा !
जिसको मरुथल ज़माने से कहते रहे ,
वो शहर आज दुल्हन सा सजने लगा !!
जून की धुप के पथ के राही थे हम ,
तुम चली स्नेह चन्दन लगाती हुई !
आस के घट भरे और सूखा किये ,
तुम चली घट पे धारा बहाती हुई !!
रिक्तियों की चुभन , तीष्ट होने लगी ,
तुम चली उष्ण बंधन सी छाती हुई !,
मन विलय के लिए अब तरल हो गया ,
हाँ के, ना के किनारों से बहने लगा ....!!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...................
मीत मिलते रहे जैसे सपनों के दल,
हर निशा मैं दिशाओं का अनुमान हो !
तुम मिली जसे खुलती हुई पुस्तकें ,
जिनमे उलझन से सुलझन का व्याख्यान हो !!
रोज बढ़ते अनुज , रोज़ घटा समय ,
जैसे बढती हुई बेल , अविराम हो ,
तुमने आकर विरल कर दिए सब सघन ,
मन का हिम भी सरलता से बहने लगा !!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...
- -- मनीष सिंह
सारा अंतर तरन्नुम में बजने लगा !
जिसको मरुथल ज़माने से कहते रहे ,
वो शहर आज दुल्हन सा सजने लगा !!
जून की धुप के पथ के राही थे हम ,
तुम चली स्नेह चन्दन लगाती हुई !
आस के घट भरे और सूखा किये ,
तुम चली घट पे धारा बहाती हुई !!
रिक्तियों की चुभन , तीष्ट होने लगी ,
तुम चली उष्ण बंधन सी छाती हुई !,
मन विलय के लिए अब तरल हो गया ,
हाँ के, ना के किनारों से बहने लगा ....!!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...................
मीत मिलते रहे जैसे सपनों के दल,
हर निशा मैं दिशाओं का अनुमान हो !
तुम मिली जसे खुलती हुई पुस्तकें ,
जिनमे उलझन से सुलझन का व्याख्यान हो !!
रोज बढ़ते अनुज , रोज़ घटा समय ,
जैसे बढती हुई बेल , अविराम हो ,
तुमने आकर विरल कर दिए सब सघन ,
मन का हिम भी सरलता से बहने लगा !!
सारा अंतर तरन्नुम सा बजने लगा ...
- -- मनीष सिंह