Wednesday, May 9, 2012

..........इठलाता विस्थापित मन !!

***** सुप्रभातम *****


गंगा की लहरों के संग-संग,
रंग ओढे , सुगन्धित वन !
अलसाई किरणों के आँचल,
इठलाता विस्थापित मन !!

फूलों फूलों, फिर तलाशते,
भंवरे जीवन की बूँदें !
कलियों कलियों स्पर्शों से,
आनंदित होता , यौवन !!

Monday, May 7, 2012

....ये हमारी ज़िन्दगी भी तो पिक्चर की तरह है

" उन दिनों मैं टाटानगर मैं रहा करता था , अपने नाना जी नानी जी के पास ये कुछ १९८६ - १९८७ के आस पास की बात होगी ! बस कुछ नहीं , तब अगर कोई सिनेमा घर मैं नई पिक्चर लगती थी तो उसकी जानकारी गली मुहल्लों मैं कुछ इस तरह से दी जाती थी ...."


१. एक साईकिल रिक्शा !

२.   ३ गुना ५ के दो बोर्ड , आगे पीछे कुछ मुख्य द्रश्य उसी पिक्चर के रंगीन उकेर कर बाँध कर रखे हुए , पोस्टर जी हाँ !

३. रिक्शा के हेंडल पर एक लाउडस्पीकर और रिक्शा के पीछे एक लाउडस्पीकर .

४. बीच मैं एक बेटरी !

५. एक अम्प्लिफायर और कभी कभी माइक भी....

६. और अनाउन्समेंट :

" सुनिए सुनिए सुनिए , बहुएं , बेटियों , भाइयों , माताओं के साथ देखि जा सकने वाली एक बिलकुल नई पिक्चर लगी है , आपके नजदीकी ही सिनेमाघर मैं , कानो के भने वाला संगीत , सुन्दर रंग , आर दी बर्मन का संगीत , हेलन का नाच और साथ मैं डाकूओं से लोहा लेते हीरो को देखिये , शुरू के दिनों के छूट के दाम मैं , टिकट के दाम शुरू हैं :

अ . इस्पेसल - १० रूपया ,

ब . कुर्सी - ५ रुपया ,

स . बालकोनी - २० रुपया ....

आइये और देखिये नया खेला !!

इतिहास सा लगता है सब , ना ना लगता नहीं हो ही गया है !!

         बस आज की रात भी कल इतिहास होगी और हम किसी और बीते हुए पल , घटनाओं की यादों मैं आखे मसलते रहेंगे और दिन निलकल आएगा और फिर सांझ होगी , और फिर रात फिर दिन ....समय चलता रहेगा ....ये हमारी ज़िन्दगी भी तो पिक्चर की तरह है ...जनम होने पर थाल पीट पीट कर पुरे मोहल्ले मैं बताया जाता है एक नया किरदार आया है अपना रोल अदा करने ...जैसे सब आते और जाते रहते हैं ....जीवन चलता रहता है ....चलते रहिये ....मिलना और मिलना कीजिये बिछड़ना तो है है सब को .....  aapka apna hai ....