Thursday, February 2, 2012

जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!

" माथे-माथे सूरज बिंदिया , आँखों-आँखों उजियारा,
  दिन-घंटों की गठरी बांधे,चढ़ता आता अँधियारा !
  मुट्ठी-मुट्ठी कसती जातीं, कल होने की आशाएं ,
  जुगनु-तारे और ख़ामोशी,हैं सन्नाटों की भाषाएँ !!"

        + * + * +  *   शुभरात्री * + * + * +

Tuesday, January 31, 2012

यादें, अनुभव, टूटे सिक्के , सब कुछ था ,पर बिखरा-बिखरा !!

" चलिए उन गलियों मैं जाएँ, जिनसे अपना बचपन गुजरा,
  चलिए वो शाखें छु आयें , जिनके सहारे यौवन उतरा !!
  इनके उनके लाखों बंधन , जिनका होना, आवश्यकता थी,
  यादें, अनुभव, टूटे सिक्के , सब कुछ था ,पर  बिखरा-बिखरा !! "