आज बतियाने का मन तो है किन्तु विषयों में से किसी एक पर केन्द्रित नहीं हो पा रहा ......!! किसी भी चीज़ का आधिक्य भी जीवन को उलझन में डाल देता है ...आज एसा ही मुझे भी लग रहा है ....!
यद्यपि चयन करना कोई मुश्किल कार्य नहीं तथापि चयन के उपरान्त कितनी चर्चा हो सकेगी
उसपर ये चिंता का विषय है ! चलिए फिर भी चर्चा करते हैं ....संभवतः हम न्याय कर सकें ......!!
ये उन दिनों की बात है जब मेरी बहन जी कई तरह की परिक्छायें दे रही थी ...और अधिकतर उनके एजाम का दिन रविवार और स्थान दिल्ली में कही पर होता था ....अब घर पर में ही था तो उनको एजाम दिलवाने ले जाया करता था ! गाजियाबाद से हम मोटरसाइकल से मेट्रो स्टेशन तक जाते थे और फिर वहां से आगे मेट्रो से ! ये मेट्रो सेवा सही में आपके जीवन को आनंदित करने वाली सेवा है ...आप स्वयं को एक स्तारिये मानव मान सकते हैं उस में सफ़र कर के ...सामान्यतः सभी के पास तो मोटर गाडी होती नहीं वो भी वातानुकूलित ( ए सी ) किन्तु मेट्रो में आप अपना लम्बा सा सफ़र कुछ रूपए चूका कर आप तय कर सकते हैं , आनादित होते हुए !
उनका एजाम कुछ 9 या 10 से आरम्भ होता था सामान्यतः तो हम सुबह सुबह पहली मेट्रो पकड़ कर गन्तव तक पहुच जाते थे ....और वहां पर वो स्कूल देख कर उनका स्थान देख लेते थे ....उसके बाद एजाम शुरू होने के बीच के समय में कुछ नाश्ता करते थे !! अब जब एजाम शुरू हो जाता उसके बाद कुल 3 घंटों का समय होता मेरे पास की में इंतज़ार करून और जब ख़तम हो तो उनको ले कर घर वापस लौटूं !!
आज का विषय ये ही है की में उन तीन घन्टों में करता क्या था !!
अब देखिये ना ये तो तय हो गया की पूरी दिल्ली में सामान्यतः हर एक जगह मेट्रो है ...और हर सेण्टर लगभग मेट्रो के पास होता था। तो में मेट्रो की सेवा लेता था ...कैसे आइये ...सिलसिलेवार लिखता हूँ ....
1. चांदनी चौक - नई सड़क : मेट्रो पकड़ कर में आ जाता था चांदनी चौक और फिर वहीँ पर नई सड़क है , किताबों के लिए मशहूर , लेकिन में वहां कोई किताब पढ़ने के लिए नहीं जाता था ! दरअसल मेरे स्कूल के समय में मैं अपने दोस्तों के साथ यहाँ आया था और वहां पर एक बार कुलचे छोले खाए थे , बस उसी की तलाश में आता था ! वो एक अधेड़ उम्र का शःक्स , आज भी हैं अपने छोटे से व्यापारिक प्रतिष्ठान पर जो उसने अपनी साईकिल / ठेले पर सजा रखा था ले कर एक निश्चित सी जगह पर खड़ा रहता है , आप वहां जाकर छोले कुलचे का आनंद ले सकते हैं ! उसके बाद में वही कुछ दुरी पर है एक कंचे वाली बोतल में कोल्ड द्रिकं वाला , वो पीता था और फिर वापस उसी जगह जहाँ से बहन को लेना होता था !
2. मोती मस्जिद : अक्सर में यहाँ आज जाया करता था , लगभग 2 से 2.30 घंटे यहाँ बिताने के बाद , बाहर निकल कर कुछ खाता और मुझे याद है जब भी में मोती मस्जिद गया तब मैंने .... लच्छेदार फालुदे खाए , ठन्डे ठन्डे , कुल्फी खाई !!
3. गुरुद्वारा सीसगंज : कभी कभी गुरुद्वारा सीसगंज साहब जाया करता था ....! वहां पर बाहर ही हाथ पैर धोने और पानी पीने की जगह बनी हुई है ...सफ़ेद संगेमरमर लगा है ...अर्धगोलाकार एक मंच सा बना हुआ है और उस पर रंग बिरंगे गिलासों में एक से दो सेवादार पानी भर कर रखते जाते हैं और दूसरी तरफ कुछ सेवादार उन इतेमाल किये गए गिलासों को धो धो कर रखते जाते हैं ...कितना सामीप्य लगता है सब के बीच !
4. फूल बाज़ार : मैं घंटों इस फूल बाज़ार में घूमता रहता था ....ना आखें थकती और ना ही मन भरता ! विभिन्न फूलों की मिली जुली खुशबू ....शब्दों में नहीं बयां करी जा सकती !! उस से ही सामने लाजपत राय मार्केट हैं , वहीँ एक बड़ा सा पीपल का पेड़ है , उसी के पास एक छोले भठूरे वाला बैठता है , जब भी फूल बाज़ार गया तो छोले भठूरे ज़रूर खाए !!
5. पुराना किला / मटका पीर : अधितर मैं यहाँ ही जाया करता था , और वापसी के समय मटका पीर जाया करता था ! पुराना किला के बाहर ही कुछ शिकंजी वालों के दुकान हैं , बस वहां पर वो पीता था और कच्चा नारियल खाता था , आलू की चाट और खीरे खाया करता था !! मटका पीर पर भी माथा टेकने जाया करता था ...जो मथुरा रोड पर है ....इतनी चलती सड़क है , सड़क पर खड़े हो जाइए आपको अपनी ही आवाज़ मुश्किल से सुनाई देगी , किन्तु वही पर यदि आप मटका पीर की सीढियां चढिये आप अपने से मिलने लगते हैं , एकदम शांत वातावरण और बस आप और वो ...और कोई नहीं ...इबादत का माहौल जिसमे सब मेरा होता है ....!!
6. मजनू का टीला / चोर बाज़ार : कई बार यहाँ भी गया , बस घूमने , समय बिताने !
7. शाहदरा / दरियागंज : रविवार को यहाँ पर पुरानी किताबों का बाज़ार लगता है ...कई बार याहं पर आपको वो सब भी मिल सकता है जिसकी उम्मीद नहीं हो , पुराने से पुराना किसी किताब का अंक , पुराने से पुराने किसी अखबार के कुछ अवशेष इत्यादि !
8. फतेहपुरी : यहाँ तो जाया करता था बस सूखे मेवे देखने के लिए !
और मेरा सबसे पसंदीदा विषय पुराने सिक्कों का संकलन , चांदनी चौक पर आपको छोटे छोटे बसते लिए कुछ लोग दिखाई पद जायेंगे और आपकी मदद के लिए बैठे होते हैं ....आपके पास यदि कोई खोटा सिक्का हो , पुराना नोट हो, फटा नोट हो तो आप उनके बट्टे पर बदल सकते हैं !! पर सबसे उम्न्दा बात ये होती है की उनके पास कुछ पुराने और बहुत पुराने ज़माने के सिक्के होते है जिनको पाना बहुत बड़े बात होती है ...अधिक से अधिक दाम चूका कर उनको ले लेने का मान करता है ....में भी किया करता था ....!!
हाँ एक बात तो बताना रह ही गयी , में चांदनी चौक पर अक्सर पराठे वाली गली भी जाया करता था .... लेकिन अकेले वहां जा कर बैठ कर पराठे खाने और फिर साथ में कुल्ह्हड़ में लस्सी पीने का मजा नहीं है ...वहां यदि आपको अगर जाना हो तो अपने किसी घनिष्ठ मित्र को ज़रूर साथ ले जाइए .....कुछ चीजें अकेले आनंद नहीं देती हैं !! सफदरजंग अस्पताल के पास एक पराठे वाले भैया हैं , वो अंड्डा पराठा बनाते हैं , कई बार वो भी खाया ! वहीँ पास में खुली सड़क पर एक शख्स अपनी रिक्शा के साथ रहता है , उसको कई बार देखा , उसकी विशेषता ये है की वो कही भी पड़ी लावारिस लाश की अंतेष्टि करता है , बिना किसी की मदत के !
मीना बाज़ार भी देखता था किन्तु दिन के समय उसकी रौनक उतनी नहीं होती थी !!
आनंद लेने के लिए आपका आनंदित होना भी आवयशक है , विषय स्वयं परिष्कृत होते जाते हैं और सामीप्य आकार लेता है !!
नमस्कार !!