Thursday, May 9, 2013

" पलाश " के फूल !

मुस्कुराते हुए,
लहराते हुए,
खिलखिलाते हुए,
रहते हैं,
सुबह की खुश्बु,
भोर की ठंडक,
दोपहर की धुप,
से बाबस्ता,
रोज़ दीखते हैं !
" पलाश " के फूल,
हमारे आपके,
मन की तरह,
सब सहते हुए
समर्पित से !

Tuesday, May 7, 2013

एक कहानी : रिश्ते अर्थ चाहते हैं !!

            " माँ " के हाथो के आलू मेथी के गरमा गरम कुरकुरे पराठे जिन पर चम्मच भर सफेद मक्खन, एक टुकड़ा गुड, बथुवे का रायता, आम का खट्टा मीठा आचार और रविवार की सुबह !! साथ में टी वी पर रंगोली पर नए पुराने गाने , अदभुद समय था वो !

                                                    आज मन कुछ उदास था , उसका !
              रविवार होने पर वो वैसे तो सबसे पहले उठ कर हर एक के कमरे की बेल बजा कर सब को उठा देता था , आज उसने  बिस्तर ही नहीं छोड़ा था सुबह के आठ बजे तक !  सब हॉस्टल के दोस्त एक एक कर  के उठे और धीरे धीरे शील के कमरे की तरफ आने लगे , ये देखने की आज है कहाँ पूरे  हॉस्टल का दोस्त !!
                सूरज पूरी तरह  निकल चुका था ! दरवाज़ा अन्दर से खुला था , अन्दर की ओर खुलता था हलके से आवाज़ लगाते हुए वरुण ने पुकारा : शील , आज कहाँ है भाई , उठा नहीं अभी तक ? उठ ? पुरे दरवाज़ा खुल जाने पर भी शील ने कोई ज़वाब नहीं दिया ! हाँ वो उठ कर अपने स्टडी टेबल पर बैठा ज़रूर था हाथों में एक पुराने फोटो का एल्बम ले कर , शांत , कुछ सोचता हुआ !!
            वरुण और सन्देश ने एक दुसरे को आश्चर्य से देखा !

अरे क्या हुआ हीरो ? आज बड़ा सेंटी बन कर बैठा है ? : वरुण ने कहा !

कुछ नहीं यार , बस ऐसे ही आज मन नहीं है ? शील बोला !

वरुण : क्यों क्या हुआ ?

शील कुछ नहीं बोला !

सन्देश : यार कुछ हुआ भी ? क्या लड़कियों की तरह कर रहा है ?

शील : एसा नहीं है ,बस आज माँ की याद आ गई !

वरुण और सन्देश भी अब थोडा गंभीर हो गये !

तभी हॉस्टल के वार्डन की तरफ से

एक सुचना आई ,नाश्ता तैयार है चलिए खा लीजिये, १० बजे के बाद नहीं  मिलेगा !  

चल चल अब देर मत कर यार नहीं तो आज का दिन भूखा रहना पड़ेगा ! : वरुण ने चिंता जताई !

सन्देश ने कहा : भाई पता नहीं आज क्या मिलेगा खाने में !!

शील : ये फोटो देखो ?

वरुण ने कहा : भाई बाद ने देख लेना फोटो पहले नाश्ता कर लेते हैं !

शील : चल आज मेस का नाश्ता मत खाओ , मेरी तरफ से केन्टीन में !

वरुण / सन्देश :  अरे क्या बात है भाई , बता तो सही आज है क्या ?

शील : बोला ना, आज मन कुछ ठीक नहीं , तुम ये फोटो तो देखो ज़रा ! उसने एक पुरानी फोटो
दोनों की ओर बढ़ाते  हुए कहा !

वरुण ने अहिस्ता से फोटो अपने हाथों में ली और अचानक से उसके चहरे के भाव भी लगभग शील जैसे हो गए !!

सन्देश के साथ भी ऐसा ही हुआ जब फोटो उसके हाथों में आई !

कमरे में अचानक चुप्पी छा गयी !

तीनो एक   दुसरे को दया , करुणा , और लगभग छलक जाने वाली आँखों से देखने लगे !

अभी दो साल पहले ही की तो बात थी ! तीनो शील के घर गए थे ! छुट्टियों में !  वो तीनो नए नए दोस्त बने थे और ये दोस्ती जो कालेज दिनों में होती है अपनी जड़ें जल्दी जमा लेती हैं ...स्वाबलंबी जो होना होता है अच्छी नौकरी के साथ इत्यादि इत्यादि !!

हल्की गुलाबी ठण्ड थी उस सुबह जब वो सो कर उठे !

देर रात ट्रेन लेट हो जाने से २ बजे पहुचे थे घर ! माँ ने रात में कहवा बना कर दिया था !

ठिठुरते हुए सो रहे थे तो माँ ने रात में तीनो को कम्बल ओढाया था और माथा चूमा था !!

        घर के अन्दर के छोटे से  पार्क में सुन्दर गुलदावदी और डहेलिया  खिले हुए थे ! बीच में सफ़ेद रंग की बांस की चार कुर्सियां और एक बांस का ही एक गोल टेबल रखा था ! चारो में वहीँ बैठ कर नाश्ता किया था ! शील की मम्मी के हाथो की बने आलू मेथी के पराठे और साथं में रायता , आम का खट्टा मीठा अचार ! किसी को याद नहीं की कितने पराठे खाए होंगे ! पेट भर कर खाया था बस ये याद है ! नाश्ते के बाद शील के पापा ने हम सब की एक ग्रुप फोटो खेची थी , माँ के साथ ! माँ को शील रसोई से ज़बरदस्ती खीच लाया था ! हाथों से लगा आटा भी साफ़ नहीं कर सकीं थे वो ! आँचल कमर में कसा हुआ था ! हलके कच्चे पीले रंग की साड़ी और माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी ! कितनी अच्छी माँ , जैसी सब माँ होती हैं ! वरुण उनके सामने टेबल हटा कर बैठा था और शील दाएं और सन्देश बाएँ बैठा था ! शील के हाथो में एक पराठे का टुकड़ा था जिस से टपकता हुआ मक्खन वरुण की सफ़ेद टी शर्ट पर गिर गया था , जिसे माँ ने ही साफ़ किया था ! खुश थे सब ! चार दिन के बाद हॉस्टल लौट आये थे ! और उसी दिन शाम को  भूकंप की खबर आई ! माँ पिता जी नहीं रहे , घर भी नहीं रहा , सब ख़तम !
       एक महीने बाद फिर से हॉस्टल की पढाई शुरू हो गयी थी  ! शील के मामा जी ने सब इंतज़ाम कर दिया था ! 
       कल माँ की बरसी थी ! पुराने एल्बम से ये फोटो अचानक गिर गयी और मुझे सब याद हो आया दोस्त - शील ने कमरे में पसरी ख़ामोशी को तोड़ने की कोशिश करी !

वरुण और सन्देश - ने गहरी सांस ली !

शील का हाथ खीचते हुए वरुण बोला : चल जल्दी से शॉर्ट्स डाल कहीं ले चलना है  तुझे !

शील : पर कहाँ ?

वरुण : तू आ तो सही !

भाई तो जा और २ घंटो के लिए पास बनवा कर ले आ तब तक वार्डन से - वरुण ने सन्देश से कहा !

सन्देश : ठीक है , तुम मुझे मैं गेट पर मिलो , मैं वहीँ मिलूँगा !

       तीनो पास के एक मंदिर में गए ! भगवान् को प्रणाम किया ! फिर गए मंदिर के पीछे बने अनाथाश्रम में ,जहाँ वैसे तो खाना दान करने के लिए एडवांस में बुकिंग करी जाती है पर कुछ बांटना हो तो कोई मंजूरी की ज़रुरत नहीं !  खूब सारे फल , १० किलो जलेबी , बर्फी और शाम के लिए पूड़ी सब्जी का कह दिया वहां के हलवाई से , जो अभी फल और जलेबी बाँट दी और शाम को बाकि सामान बाँट देगा ! माँ और पिता जी के नाम से !

शील ये सब देख रहा था ! उसने वरुण और सन्देश से पुछा !

इतने पैसे कहाँ से लाया भाई ?

वरुण : माँ ने ही दिए थे !

शील : कब ?

वरुण  : चलते समय ! वो मैंने खर्च नहीं किये ! उसी दिन एक गुल्लक खरीदी और उसमे दाल दिए और आज इतने सारे हो गए माँ के कारण दो सालों में और अब माँ के नाम से ही दान कर रहा हूँ !
                शील और सन्देश : कुछ नहीं बोल सके बस वरुण को देखते रहे , ना जाने कितने सम्मान , ना जाने कितने आदर भरे शब्द दोनों की आँखों से बिना ध्वनि के बह रहे थे   और वरुण चिपचिपाते जलेबी के टुकड़ों को परोसता हुआ रिश्तों के बंधन मजबूत कर रहा था !

                                  रिश्ते  अर्थ चाहते हैं - केवल शब्दार्थ नहीं !!