Thursday, March 14, 2013

" रात " देर से हुई !!

" रात " देर से हुई !

लैंप पोस्ट के नीचे,
देर तक पढता रहा,
किशोर अनवरत !

जीवन को ;
समानता से,
उम्मीद में,
प्रगति की राह पर,
ले चलने को !

आज सुबह,
आँख न खुली,
देर से सोया,
कल , "रात"
देर से हुई !!

पास की " मिल "
का हूटर,
रात के होने और,
सुबह के आने का,
द्वारपालक जो है !

Wednesday, March 13, 2013

एक कहानी : ट्रेन की वो अनोखी महक - वैभवी !!

           दिसम्बर महीने की कोहरे वाली सर्द सुबह के ३ बजे घर से निकला ! चाचा जी के छोटे बेटे ने गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया ! उसको हाथ हिला कर बाए कहता हुआ मैं जल्दी जल्दी टिकिट खिड़की की तरफ बढ़ा !!

        नई दिल्ली के लिए सुपर फास्ट पुरुषोत्तम एक्सप्रेस का एक टिकिट लिया और प्लेटफार्म पर पहुच गया !! ट्रेन अभी आई नहीं थी ! बहुत ज्यादा लोग नहीं थे , या फिर सर्द हवाओं से बचने के लिए इधर उधर किनारों पर खड़े होंगे !! एक कप चाय पी ! ट्रेन के साथ नई दिल्ली स्टेशन पर पहुच गया !
              पंजाब मेल से मुंबई जाना  था ! सबेरे कुछ ५ बजे के आस पास चलती है नई दिल्ली से !
ट्रेन आई सब हमसफ़र एक एक कर के अपने अपने कम्पार्टमेंट में चढ़ गए ! मेरे एच आर मेनेजेर ने मुझे मेरे पसंद की बर्थ दी थी , थर्ड ऐ सी में साईड लोवर ! सबो ने अपना अपना सामान रख कर सुनिश्चित किया की सामान सुरक्चित है ! किसी ने छोटी चेन लगाईं , छोटा पीतल का ताला बंद किया ! किसी के पास ताला नहीं था तो अपनी ब्रीफकेस का सामने का पोर्शन पीछे की तरफ कर के राहत की सांस ली ! मैं ये सब देख रहा था ....मुझे इस तरह सामान की सुरक्षा की चिंता कभी नहीं रही भारतीय रेल में ! आज तक मेरा कोई सामान चोरी भी नहीं गया !!
            हम कुल आठ लोग थे अगले लगभग २४ घंटो के साथी ! एक मैं , मेरे सामने १६ - १८ साल का एक लड़का , कुछ कम बोलता था ...या फिर अभी उम्र के हिसाब से तजुर्बा कम था ! दूसरी तरफ एक मराठी परिवार पति पत्नी और उनकी एक चंचल से छोटी सी बिटिया वैभवी !!
                                 एक ओर एक बुजुर्ग दम्पति और एक उनका नौकर था !!
उनके  बेटे विदेश में रहतेहै और उनको तीर्थ यात्रा करवाने के लिए उन्होंने ही एक नौकर का प्रबंध कर दिया था , माता पिता को वो नौकर ही चार धाम घुमा रहा था !! इस समय वो नासिक की यात्रा पर निकले थे मुंबई में अपनी बेटी के घर होते हुए !! 

                       ट्रेन चल दी !!
        चाय की चुस्कियां लेते हुए मैंने अपने पाँव पसार लिए ! सफ़ेद चादर ओढ़ ली और बड़े से शीशे से बाहर का नज़ारा देखने लगा ! मेरे हाथ में "विपाशा " का कहानी विशेषांक था ! मुझे कब नींद आ गयी मुझे नहीं याद जब दोपहर के खाने का आर्डर लेने के लिए रेल कर्मचारी आया तो मेरी नीद टूटी !  रेल का खाना .... अब क्या कहूं ...सर्व विदित है !! सब एक बड़े परिवार की तरह ...सब को एक सामान सा खाना ! एक समय में सब को खाना वाह अपने कालेज के हॉस्टल के दिन याद हो आये !
       दिन भर वो मराठी परिवार अनमना सा रहा ! किन्तु शाम को वैभवी ने सब कुछ पलट दिया !
एक दुसरे से अलग अलग बैठे लोग " वैभवी " के उछलते कूदते बचपन के साथ एक भावनात्मक बंधन में बंधने लगे ! हर कोई उसके शब्दों और कृत पर ध्यान रखता ! विपुल ( १८ का लड़का ) और मेरे साथ ज्यादा घुल मिल गयी थी वो ! हमारे साथ ही आकर बैठी रही रात के खाना खाने तक ! बड़े से शीशे से ज्यादा साफ़ और दूर तक का द्रश्य जो दिखाई देता था !! सुबह ५ बजे से रात के १० कब बज गए पता ही नहीं चला .... कितने ही स्टेशनों पर गाड़ी रुकी और चली , किन्तु हमारा सफ़र तो वैभवी के साथ कट रहा था !

       वैभवी के पिता ने उसको पुकारा ....

बेटा चलो अब सो जाओ , अंकल और भैया भी अब सोयेंगे !

वैभवी - अभी थोड़ी देर और बाबा !

पिता - नहीं रात बहुत हो गयी ...तुम थक भी गयी होंगी !

वैभवी - अच्छा आती हूँ !

पिता - बस चलो आओ !

वैभवी - बाय भैया ,बया  अंकल ! गुड नाईट !

मैंने और विपुल ने एक साथ कहा - बाय डॉल  , गुड नाईट !

वो अपने पिता के पास चली गयी !

पिता - किस सीट पर सोवोगी ?

वैभवी ने अपने पिता के इस प्रश्न के जवाब एक प्रश्न से दिया , जो इस कहानी और यात्रा का सार है !!

वैभवी ने अपने पिता से पुछा - " बाबा , ये ट्रेन किधर से किधर जा रही है " ?

पिता - मतलब ?

वैभवी - मतलब , मैं ट्रेन की चलने की दिशा के विपरीत ( उसने अंग्रेजी में ओपोजित कहा था )
दिशा की बर्थ पर सोना चाहती हूँ !

पिता - पर , ऐसा क्यों ?

वैभवी - क्यों की , अगर रात में मैं गहरी नीद में सो गयी तो ट्रेन के झटके से नीचे ना गिर जाऊं !!

उसके इस तर्क पर हम सब स्त्भ्ध थे !

दुसरे लोग भी हैरान और सोचने  को मजबूर : एक ६ से ८ साल का बच्चा - अपने जागते हुए तो गंभीर है ही उसे अपने सोने के बाद भी  ! इस देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में हैं !

            हम लोग कहाँ इतना सोचते हैं ! ट्रेन में बना परिवार , कुछ घंटो का ही सही किन्तु कितना अपना और सहज होता है ....बंधन होते हुए भी बंधन रहित ! रेल सब को बांधे रखती है , भावों में , विचारों में , संस्कृति में , बचपन से बुजुर्ग होने तक !

          मुंबई  में सब अपने अपने गंतव्य पर जाने को तैयार ! किसी ने टैक्सी ली , किसी ने ऑटो किसी ने बस और किसी ने लोकल ट्रेन ....सब बिखर , बिछड़ गए ...शारीरिक रूप से किन्तु "वैभवी" और उसके चंचल शब्दों ने आज भी सब को जोड़े रखा है !
         ट्रेन की वो अनोखी महक जो बस भारतीय रेल में ही मिलती है - अपनत्व और स्नेहिल घनिष्टता की ! !
                            
                                                                       <><> मनीष कुमार सिंह <><>
        





Tuesday, March 12, 2013

... सम्बन्ध महकते हैं !

    सम्बन्ध महकते हैं !

जब ,समर्पण
पूर्ण हो,
निःस्वार्थ हो,
अविरल,
अ-अनुबंधित,
एवं, निःशब्द भी !

जैसे चन्दन - जल,
वाष्पित होते ही,
रह जाता है,
अपरिभाषित,
अतुलनीय,
वातावरण
   महकता सा !!

<><) Manish Singh (><>



Monday, March 11, 2013

सुनते हैं, होली आती है !!

सुनते हैं, होली आती है !

लकड़ी की आंच,
बर्तनों की कालिख,
कुंठा और प्रतिशोध,
की लाली , आँखों में,
कमजोर शरीर,
पीलापन लिए,
दिहाड़ी की आस,
    बे रंग पानी के लिए !

इतने रंगों की,
दुनिया, रोज़ है !
सडक के किनारे
के जीवन में,
होली के रंग ;
बच्चे का गिलास,
दूध से और पेट
नहीं भरते ,
मजबूर, मजदूर का !!
सुनते हैं, होली आती है !
तो आये !