Friday, August 3, 2012

...उस डोरी को खीचता है तो वो घंटी धीर से बज जाती है तन्न्न से ....

               वैसे तो कई बार मायानगरी मुंबई आया हूँ ....और घूमा हूँ किन्तु इस बार कुछ बदलावों ने अपनी और मेरा ध्यान खीचा , जिनका रेखांकित किया जाना मेरे लिए ज़रूरी है !
               ये कोई वर्ष 2003 के अंतिम महीनो की बात रही होगी ! एक अधिकारिक कार्य से मुझे मुंबई आना पड़ा , अपने एक वरिष्ट अधिकारी के साथ ! कुछ वेशेष होने जा रहा था हमारी कंपनी में , जिसके लिए एक विभाग के विभागाध्यक्ष के सहायक के रूप में मेरा चयन हुआ ! कोई सितम्बर महीने की बात होगी ...हाँ दिनांक 28 नवम्बर 2003 को में आया था ! फिर लगभग 1.5 वर्ष यहाँ रहा ...! 
                मुंबई की बस सेवा और उसका संचालन वाकई में तारीफ़-ए-काबिल है , मेरा अनुभव जो रहा है ! दिल्ली और वहां पर भी संख्या से मार्गों का नामांकन किया गया है और बसें चलती हैं ! जो विशेष देखा वो था :

1. बसों में कोई भी प्रेश्रर होर्न नहीं है ..... हाथ से दबा कर भोपू की तरह बजने वाला यन्त्र लगा है जिस से कोई भी ध्वनि प्रदूषण नहीं होता !

2. बसों को गंतव्य पर रोकने और चलने के लिए सहायक - कंडेक्टर दिल्ली की तरह सीटी नहीं बजता जो की एक दम बुरी तरह से आवाज़ करती है ...यदि आपके पास कोई नव जात बच्चा हो तो वो डर ही जाये !!....मुंबई में एक बहुत ही साधारण किन्तु महत्वपूरण प्रणाली लगी है ...कंडक्टर का संकेत ड्राईवर तक पहुचने ले लिए .....दर असल उन्होंने पीछे से दरवाज़े से ले कर के ड्राईवर के ठीक सर के लगभग ऊपर एक नायलोन की रस्सी करीने से बाँधी हुई है , जो कहीं भी किसी यात्री के सर को नहीं छूती और ड्राईवर के सर के पास एक घंटी बंधी है ....जब कंडक्टर कहीं से भी उस डोरी को खीचता है तो वो घंटी धीर से बज जाती है तन्न्न से ....हाँ रुकने और चलने के लिए घंटी के बजने और बजाने की अपनी अगल प्रणाली है जो ड्राइवर और सहायक / कंडक्टर के बीच ही नियत है !

3. यहाँ सब कंडक्टर अपनी  उनिफ़ोर्म में मिलते हैं , और जगह भी होते होंगे मेरा अबुभाव यहाँ का ही है ....!!

4. कितनी भी भीड़ हो कंडक्टर हर यात्री के पास जाकर पहले एक पंचिंग करने वाले लोहे के  यंत्र से तक तक की आवाज़ कर के उसकी टिकिट बनता था .... आपके लिए बड़े सलीके से जितने मूल्य की टिकट होनी चाहिए निकाल कर उसी यंत्र से पञ्च कर देता था ....और आपसे पासे ले लेता था ....आजकल एक बदलाव देखने को मिला .... वो कागज़ की तिअक्त नहीं होती , ना ही वो यंत्र होता है ....बस एक बत्तरी चालित मशीन है जिस से बटन दबाने पर टिकट निकलती है .... किन्तु आज भी कंडक्टर आपके पास ही जा कर टिकट निकलता है ...दिल्ली की दी टी सी की तरह नहीं की कंडक्टर पिचली सीट पर बैठा रहेगा और किसी ने किसी वजह से टिकट नहीं ली तो वो यात्री खुद ज़िम्मेदार ....!

5. एक और बात अलग है यहाँ की बसों में ....पिचले और अगले टायरों के ऊपर की सीट पर बैठने का मन करता है ...आराम दायक होती हैं ...दिल्ली जैसी नहीं की कुछ तेधिमेधि उभरी हुई की पूरा रास्ता आपका अपने को एड्जसत करने में ही कटे !!

    आधुनिकता और प्रगति के लिहाज़ से मुंबई अग्रणी है किन्तु पर्यावरण और अपने यात्रियों का ख़याल करना इस शहर जो आता है , तेज़ गति में अपने शहर का धवनी प्रदुषण ना हो के लिए हाथ से मुअल चलने वाले भूपू हैं , और सीटी की जगह पर हाथ से बजने वाली डोरी की घंटी है ... हम सब ये कर सकते हैं बस ज़ज्बा और सहयोग की ज़रुरत होती है ...जो थोडा थोडा ही बहुत हो जाता है ...!!

Monday, July 30, 2012

..जुड़ाव निष्काम होना चाहिए हमेशा प्रतिउत्तर में कुछ पाने का जुड़ाव व्यर्थ है !!

             कल फिर से अपने जाने पहचाने सफ़र पर निकला था ...हजरत निज़म्मुदीन से मुंबई ...अधिकारिक सफ़र रहता है ये अमूमन ...हाँ एक साल पहले ये ही साफ एक पारिवारिक कार्यकर्म में शरीक होने के लिए था जब मेरी दीदी के बड़े बेटे की शादी थी !!
           खैर , देखते हैं इस बार क्या कुछ क्या हुआ ! बी सिक्स ( बी 6 ) में बर्थ संख्या 23 थी मेरी , मनपसंद सीट , साइड लोवर !! 4 : 55 शाम को खुलती है और सवेरे लगभग 9:15 तक बोरीवली ! क्या शहंशाही सफ़र होता है ...एसा मन को लगता है , भाई राजधानी एक्स्प्रेक्स में जो किया है !! भारतीय रेल के विषय में क्या लिखूं ...अगर में आज 10 साल सफ़र कर के राजधानी में उसके बारे में कुछ तारीफ करूंगा तो केंद्रीय मंत्री जी श्री जयराम रमेश की बात झूठी हो जाएगी ना ..उन्होंने कल या परसों ही कहा था : " भारतीय रेल सबसे बड़ा खुला टायलेट ( शोचालय ) है ! " सही है !! ट्रेन प्लेटफोर्म पर कड़ी होने पर इसका प्रयोग ना करने का निवेदन करते विभिन्न प्रकार के बोर्ड लगे दिखेंगे , लेकिन देखते सब हैं किन्तु इसको मानता कौन है ....सवारी तो बाद में चढती है किन्तु उनके पहले बहुत से समाज सेवी आपके प्रयोग में ले से पूर्व ही उनका प्रयोग कर के देख लेते हैं कही आपको कोई तकलीफ ना हो , प्रयोग में !!
            एक अन्तराष्ट्रीय क्लब है , नाम नहीं लिख सकता संभव है उनके संविधान में इस के नाम के किसी भी प्रयोग पर हम पर शायद कुछ कानूनी कार्यवाही हो जाये .... चलिए इस क्लब के एक विशेष और महत्वपूर्ण कार्यकर्म पर नज़र डालते हैं !! , मेरी सीट पर एक सोबर सी महिला आकर बैठी ...उनका 24  नंबर था बर्थ का , साइड अप्पर !! हमें ने एक दुसरे को एक हलकी सी मुस्कान से देखा , अब जिन दो लोगों को लगभग 16 घंटे साथ में जाना हो वो कम से कम एक दुसरे को मूक नहीं हैं, तो समझायेंगे !! 
           थोड़ी देर में एक आवाज़ आई , चाय काफी ? मैंने चाये की  किट ली और उन्होंने काफी !! बस थोड़ी देर में वो गरम पानी का मग दे गया ...ये निर्देश देते हुए " एक में दो बन जायेंगे " !! में तो चुप रहा ...किन्तु दूसरी तरफ बीते एक सूरत के साडी व्यापारी श्री पोपट लाल जी ने कहा : ...क्यों भी रेलवे के पास भी पानी की कमी हो गयी है क्या ?? नाही साब आप बोले तो अलग अलग मग दे देता हूँ .... !! सब ने मन कर दिया !! एक ही में काफी पानी रहता है ...! तब पोपट जी ने राजधानी का मुझ से ज्यादा सफ़र किया था ...वो बताने लगे ...अब देखना 20 साल से चला आ रहा ही मेनू बोलेगा और खिलायेगा ....और हुआ भी वही ...बाद में लिखता हूँ !
             में अपनी चाय बनाने लगा !! मने गरम पानी लिया , और चय के दोनों पैक ( डीप वाले ) काग़ज़ के गिलास में दाल लिए ...और जब दूध का पाउडर डालने लगा तो मुझे एहसास हुआ की मैंने गलती कर दी है ...तभी उन सोबर महिला ने कहा की आपने पहले दूध मिलाना चाहिए था ...उन्होंने अपना गिलास मेरे आगे बाधा दिया ...किन्तु मेने वो नहीं लिया और मनेज़ कर लिया ...!! उसके बाद श्री पोपट जी की बात सुनने लगे , 20 साल से एक ही मीनू है : वेज में : पनीर की सब्जी , अरहर की दाल, सलाद , दही , पराठा - 2 नग , चावल , अचार , नमक ( मांगने पर ) और बाद में एक आइसक्रीम !! नॉन वेज़ में : पराठे ( 2 नग ) , चिकन कर्री , चावल , ,रायता  अचार , दही सलाद और आइसक्रीम !! हाँ एक एक नीम्बू का टुकड़ा भी पानी के एक बोतल तो दे ही चुके होते 7 बजे के लगभग टमाटर का सूप भी !!  नाश्ते में , पोहा या , उपमा , ब्रेड ऑमलेट , ब्रेड वेज़ कटलेट , एक एक मांगो फ्रूटी और टी बस !! जी बिलकुल ये ही होता है ...मुझे या किसी भी सह यात्री की कही भी पोपट भाई को कुछ भी सहायता नहीं करनी पड़ी की आप कुछ भूल रहे हैं ....सब कुछ सही कहा था ....उन्होंने ! हम सब मंद मंद मुस्कुरा रहे थे ....या हम सब की मूक सहमति थी ....किन्तु किंकर्तव्यविमूढ़ता के साथ !! 
              हम सब आठ लोगों के साथ एक और था जिसके लिए ये सब एकदम नया और अनोखा सा था !! नाम : माउले , नागरिकता - ब्राज़ील , उम्र - लगभग 15 वर्ष ! वो उन महिला के साथ ही था , वो उसको अपने साथ दिल्ली और आगरा घुमाने के गयी थी वापी से और हमारे साथ अगस्त क्रांति राजधानी में वापस लौट रही थीं !! मुझसे रहा नहीं गया और शायद वो भी उत्सुक थी कुछ विशेष बताने के लिए ...बस उन्होंने जो बताया ...वो अनोखी सोच को प्रायोगिक कर के आनंद लेने की चरम सीमा के सामान है ....जो श्रध्हा के साथ संतुष्टि देता है .... !!
                दर असल उस कल्ब में जिसकी वो महिला सदस्य हैं में एक कार्यकर्म चलता है ...जिसके अंतर्गत 12 से 15 वर्ष के युवाओं को अपने और दुसरे देश को समझाने के लिए यूथ आदान प्रद्दन किया जाता है , जिसमे दो परिवार एक दुसरे परिवार के युवाओं को एक दुसरे के देश में किसी प्रतिष्ठित परिवार में भेझाते हैं !! जिसका चयन एक विशेष चयन समिति करती है ...जो युवा के पसंद और ना पसंद के हिसाब से नियत करती है की किस को कहाँ जाना है !! उसी के अंतर्गत वो युवा जिसका नाम मोरिलो है आया था ....सुन्दर सा किन्तु गंभीर बच्चा , जिसका की वो महिला बिलकुल अपने बच्चे सा ध्यान रख रही थी !! उसके भोजन चयन पर भी उन्होंने राय दी की उसको वेज़ आर्डर करना चाहिए क्यों की उसको भारतीय मसाले नहीं पसदं किन्तु उसके नॉन वेज़ आर्डर किया ....!! ये उन्होंने मुझे बताया !!  इनके यहाँ से इनका नेफ्यू मोरिलो के घर गया था ...एक सुखद अनुभव ले कर आया !! और ये भी यहाँ से सुखद एवं जीवन पर्यंत याद रखने वाला अनुभव ले कर के जाए ....क्यों की वहां पर ये परिवार जो भारत में इसका ,ध्यान  पसंद ना पसंद , संस्कार का ध्यान रख रहा है दरअसल पुरे भारत का प्रतिनिधित्व ..करेगा ..और एक भी चूक ...भारत की चूक होगी ....जैसे ओलम्पिक में हम अ बी सा नहीं ....भारतीय हैं ....और किसी एक का भी प्रदर्शन भारत का प्रदर्शन होता है खराब या अच्छा !! उसे - मोरिलो को सॉकर देखना अच्छा लगता है किन्तु टेनिस ज्यादा पसंद है , मेने पुछा तो उसने ये ही कहा ....और मुझ से पुछा तो मैंने बताया की मुझे क्रिकेट पसंद है ...वो हल्का सा मुस्कुराया और उस अपनी भारतीय माँ की  तरफ देखा ....तो उन्होंने उसको मुस्कुराते हुए बोला ....हियर इन इंडिया मोस्ट ऑफ़ थे पीपल्स लिखे क्रिकेट !! रात हो गयी।.. हम सब अपनी अपने सीट पर सोने चले गए ...और सवेरे वो वापी उतर गए ....एक सफ़र में क्या क्या समझ बूझ लिया ....सब दुनिया क्या क्या कर रही है , जीवन चलते रहना चाहिए ....अगर कुछ विशेष करते हुए चलेगा तो मानसिक एवं हृदियक संतुष्टि मिलती है , किन्तु ये भी सत्य है की कुछ भी विशेष करने के लिए आपको जुड़ना होता है ...और जुड़ाव निष्काम होना चाहिए हमेशा प्रतिउत्तर में कुछ  पाने  का जुड़ाव व्यर्थ है , स्वयं के लिए !!