वैसे तो कई बार मायानगरी मुंबई आया हूँ ....और घूमा हूँ किन्तु इस बार कुछ बदलावों ने अपनी और मेरा ध्यान खीचा , जिनका रेखांकित किया जाना मेरे लिए ज़रूरी है !
ये कोई वर्ष 2003 के अंतिम महीनो की बात रही होगी ! एक अधिकारिक कार्य से मुझे मुंबई आना पड़ा , अपने एक वरिष्ट अधिकारी के साथ ! कुछ वेशेष होने जा रहा था हमारी कंपनी में , जिसके लिए एक विभाग के विभागाध्यक्ष के सहायक के रूप में मेरा चयन हुआ ! कोई सितम्बर महीने की बात होगी ...हाँ दिनांक 28 नवम्बर 2003 को में आया था ! फिर लगभग 1.5 वर्ष यहाँ रहा ...!
मुंबई की बस सेवा और उसका संचालन वाकई में तारीफ़-ए-काबिल है , मेरा अनुभव जो रहा है ! दिल्ली और वहां पर भी संख्या से मार्गों का नामांकन किया गया है और बसें चलती हैं ! जो विशेष देखा वो था :
1. बसों में कोई भी प्रेश्रर होर्न नहीं है ..... हाथ से दबा कर भोपू की तरह बजने वाला यन्त्र लगा है जिस से कोई भी ध्वनि प्रदूषण नहीं होता !
2. बसों को गंतव्य पर रोकने और चलने के लिए सहायक - कंडेक्टर दिल्ली की तरह सीटी नहीं बजता जो की एक दम बुरी तरह से आवाज़ करती है ...यदि आपके पास कोई नव जात बच्चा हो तो वो डर ही जाये !!....मुंबई में एक बहुत ही साधारण किन्तु महत्वपूरण प्रणाली लगी है ...कंडक्टर का संकेत ड्राईवर तक पहुचने ले लिए .....दर असल उन्होंने पीछे से दरवाज़े से ले कर के ड्राईवर के ठीक सर के लगभग ऊपर एक नायलोन की रस्सी करीने से बाँधी हुई है , जो कहीं भी किसी यात्री के सर को नहीं छूती और ड्राईवर के सर के पास एक घंटी बंधी है ....जब कंडक्टर कहीं से भी उस डोरी को खीचता है तो वो घंटी धीर से बज जाती है तन्न्न से ....हाँ रुकने और चलने के लिए घंटी के बजने और बजाने की अपनी अगल प्रणाली है जो ड्राइवर और सहायक / कंडक्टर के बीच ही नियत है !
3. यहाँ सब कंडक्टर अपनी उनिफ़ोर्म में मिलते हैं , और जगह भी होते होंगे मेरा अबुभाव यहाँ का ही है ....!!
4. कितनी भी भीड़ हो कंडक्टर हर यात्री के पास जाकर पहले एक पंचिंग करने वाले लोहे के यंत्र से तक तक की आवाज़ कर के उसकी टिकिट बनता था .... आपके लिए बड़े सलीके से जितने मूल्य की टिकट होनी चाहिए निकाल कर उसी यंत्र से पञ्च कर देता था ....और आपसे पासे ले लेता था ....आजकल एक बदलाव देखने को मिला .... वो कागज़ की तिअक्त नहीं होती , ना ही वो यंत्र होता है ....बस एक बत्तरी चालित मशीन है जिस से बटन दबाने पर टिकट निकलती है .... किन्तु आज भी कंडक्टर आपके पास ही जा कर टिकट निकलता है ...दिल्ली की दी टी सी की तरह नहीं की कंडक्टर पिचली सीट पर बैठा रहेगा और किसी ने किसी वजह से टिकट नहीं ली तो वो यात्री खुद ज़िम्मेदार ....!
5. एक और बात अलग है यहाँ की बसों में ....पिचले और अगले टायरों के ऊपर की सीट पर बैठने का मन करता है ...आराम दायक होती हैं ...दिल्ली जैसी नहीं की कुछ तेधिमेधि उभरी हुई की पूरा रास्ता आपका अपने को एड्जसत करने में ही कटे !!
आधुनिकता और प्रगति के लिहाज़ से मुंबई अग्रणी है किन्तु पर्यावरण और अपने यात्रियों का ख़याल करना इस शहर जो आता है , तेज़ गति में अपने शहर का धवनी प्रदुषण ना हो के लिए हाथ से मुअल चलने वाले भूपू हैं , और सीटी की जगह पर हाथ से बजने वाली डोरी की घंटी है ... हम सब ये कर सकते हैं बस ज़ज्बा और सहयोग की ज़रुरत होती है ...जो थोडा थोडा ही बहुत हो जाता है ...!!
ये कोई वर्ष 2003 के अंतिम महीनो की बात रही होगी ! एक अधिकारिक कार्य से मुझे मुंबई आना पड़ा , अपने एक वरिष्ट अधिकारी के साथ ! कुछ वेशेष होने जा रहा था हमारी कंपनी में , जिसके लिए एक विभाग के विभागाध्यक्ष के सहायक के रूप में मेरा चयन हुआ ! कोई सितम्बर महीने की बात होगी ...हाँ दिनांक 28 नवम्बर 2003 को में आया था ! फिर लगभग 1.5 वर्ष यहाँ रहा ...!
मुंबई की बस सेवा और उसका संचालन वाकई में तारीफ़-ए-काबिल है , मेरा अनुभव जो रहा है ! दिल्ली और वहां पर भी संख्या से मार्गों का नामांकन किया गया है और बसें चलती हैं ! जो विशेष देखा वो था :
1. बसों में कोई भी प्रेश्रर होर्न नहीं है ..... हाथ से दबा कर भोपू की तरह बजने वाला यन्त्र लगा है जिस से कोई भी ध्वनि प्रदूषण नहीं होता !
2. बसों को गंतव्य पर रोकने और चलने के लिए सहायक - कंडेक्टर दिल्ली की तरह सीटी नहीं बजता जो की एक दम बुरी तरह से आवाज़ करती है ...यदि आपके पास कोई नव जात बच्चा हो तो वो डर ही जाये !!....मुंबई में एक बहुत ही साधारण किन्तु महत्वपूरण प्रणाली लगी है ...कंडक्टर का संकेत ड्राईवर तक पहुचने ले लिए .....दर असल उन्होंने पीछे से दरवाज़े से ले कर के ड्राईवर के ठीक सर के लगभग ऊपर एक नायलोन की रस्सी करीने से बाँधी हुई है , जो कहीं भी किसी यात्री के सर को नहीं छूती और ड्राईवर के सर के पास एक घंटी बंधी है ....जब कंडक्टर कहीं से भी उस डोरी को खीचता है तो वो घंटी धीर से बज जाती है तन्न्न से ....हाँ रुकने और चलने के लिए घंटी के बजने और बजाने की अपनी अगल प्रणाली है जो ड्राइवर और सहायक / कंडक्टर के बीच ही नियत है !
3. यहाँ सब कंडक्टर अपनी उनिफ़ोर्म में मिलते हैं , और जगह भी होते होंगे मेरा अबुभाव यहाँ का ही है ....!!
4. कितनी भी भीड़ हो कंडक्टर हर यात्री के पास जाकर पहले एक पंचिंग करने वाले लोहे के यंत्र से तक तक की आवाज़ कर के उसकी टिकिट बनता था .... आपके लिए बड़े सलीके से जितने मूल्य की टिकट होनी चाहिए निकाल कर उसी यंत्र से पञ्च कर देता था ....और आपसे पासे ले लेता था ....आजकल एक बदलाव देखने को मिला .... वो कागज़ की तिअक्त नहीं होती , ना ही वो यंत्र होता है ....बस एक बत्तरी चालित मशीन है जिस से बटन दबाने पर टिकट निकलती है .... किन्तु आज भी कंडक्टर आपके पास ही जा कर टिकट निकलता है ...दिल्ली की दी टी सी की तरह नहीं की कंडक्टर पिचली सीट पर बैठा रहेगा और किसी ने किसी वजह से टिकट नहीं ली तो वो यात्री खुद ज़िम्मेदार ....!
5. एक और बात अलग है यहाँ की बसों में ....पिचले और अगले टायरों के ऊपर की सीट पर बैठने का मन करता है ...आराम दायक होती हैं ...दिल्ली जैसी नहीं की कुछ तेधिमेधि उभरी हुई की पूरा रास्ता आपका अपने को एड्जसत करने में ही कटे !!
आधुनिकता और प्रगति के लिहाज़ से मुंबई अग्रणी है किन्तु पर्यावरण और अपने यात्रियों का ख़याल करना इस शहर जो आता है , तेज़ गति में अपने शहर का धवनी प्रदुषण ना हो के लिए हाथ से मुअल चलने वाले भूपू हैं , और सीटी की जगह पर हाथ से बजने वाली डोरी की घंटी है ... हम सब ये कर सकते हैं बस ज़ज्बा और सहयोग की ज़रुरत होती है ...जो थोडा थोडा ही बहुत हो जाता है ...!!