" झालमुरी"
दिल्ली से किसी भी पूर्व की तरफ जाने वाली रेलगाड़ी मैं सफ़र कीजिये ... बस रात निकलने के बाद आप अल्लाहबाद को पार कीजिये और एक अनोखी चीज़ की आवाज आने लगती है , और साथ मैं कच्चे सरसों के तेल की भी खुशबु का आनंद होने लगता है चम्मच और अलमुनियम के छोटे डब्बे पर थक थक की आवाज और साथ मैं झाल मुरी , झाल मुरी की आव्वाज लगते अपने उदर पर एक बड़ा सा गोलाकार , छोटे छोटे डब्बे बंधे एक बंधू आता दिखाई देगा ....जिस के सर पर अमूमन एक गमछा बंधा होता है ...जो ला लाल और सफ़ेद रंग का होता है !! और उसके सब छोटे छोटे डब्बों मैं विभिन्न प्रकार के रंगीन सामान भरे होते हैं .....
१. टमाटर
२.कच्चा कटा नारियल ,
३.चिनिया बादाम ( मूंगफली )
४.चनाचूर ( विभिन्न प्रकार की नमकीन )
५.कच्चा सरसों का तेल ,
६. कच्चा हरा धनिया ...कटा हुआ ,
७. प्याज कटा हुआ ,
८. नीम्बू,
९. आमचूर ,
१०, हरी मिर्च कटी हुई ,
११. आलू उबला हुआ और कटा हुआ ,
१२. शलगम - कभी कभी,
१३. कुछ कुते हुए मसाले,
१४. कुछ अखबार के तुकडे या फिर पुराणी कापियों के पेज ,
१५. एन डब्बा जिस मैं हर बार बनाने के लिए ....
सब सामान्य सी चीजें हैं ...किन्तु जब आप सफ़र कर रहे होते हैं और ये सब दिखाई दे तो बहुमूल्य होजाती है ....सब कैसे होता है ...बनाने वाला देख लेता है की कितना ठोंगा बनाना है ... और साइज़ के हिसाब से रेट भी फिक्स है ...५ रुपया , १० रुपया ....बस...
सब कुछ मिला कर ठोंगे मैं भर कर ऊपर से कुछ चिनियाबदाम और कचे नारियल से सजावट कर के जब बंधू देता है ना उसका कोई सानी नहीं ... कुछ दो चार मुम्न्ग्फाली के दाने और कुछ तुकडे कच्चे के नारियल इतने बेशकीमती हो जाते हैं की अन्दर अन्दर हम सोच रहे होते हैं की वो कुछ ज़यादा ही रख कर दे ...भले हम अपने घर पर उतना जितना उसने दिया है ...प्लेट मैं छोड़ देते हैं....
खैर ...आज उस झाल = तीखी , मुरी = चावल के दानो से बनी हवा भरी एक अनमोल चीज ....क्या आनंद आता है भाई ....कभी बंगाल जाने का मौका मिले तो ५ रूपये खर्च कर के इस का अनुभव ज़रूर लीजियेगा ....पांच सितारा या ७ सितार होटल के किसी भी महंगे व्यंजन की तुलना मैं अधिक मूल्यवान पाएंगे !!
जी हाँ ...झालमुरी ....वाह ..वाह ..वाह ...अब अगला " चनाचूर "