शालीनता और संस्कारीकता दो प्रथक प्रथक व्यवहार हैं ! दोनो को जोड़ कर नही देखा जाना चाहिए !! एक होता है और एक अपनाना पड़ता है !! जो होता है उसपर क्या कहिए किंतु अपनाए जाने वाले के पीछे के कारण , कई बार उसका अर्थ बदल देते हैं !! आप किस परिवार से आते है ये आहें नही किंतु आप कैसा परिवार बनाते हैं ......महत्वपूर्ण है !! आपसे जुड़ने वाले को यदि ये एहसाह हो गया की आप अपने हित साधने हेतु शालीन होने का ढोंग कर रहे है तो वो पल आपके संस्कार पर भी भारी पड़ सकता है ...... व्यावहारिक रहिए , हर वक़्त तिज़रत अछी नई होती भाई .....!!"
Thursday, July 21, 2011
जैसे सब के अपने अपने ईश्वर होते हौं ना उसी तरह से सब की अपनी अपनी बारिश !!
" आज बारिश थी !" जैसे सब के अपने अपने ईश्वर होते हौं ना उसी तरह से सब की अपनी अपनी बारिश !!
कोई सूखे खेत के लिए , कोई गर्मी से बचने के लिए , कोई अपने नये मकान की तराई के लिए ....कोई अपने कपड़ो को बचाने के किए , कोई अपने झोपडे मैं पानी ना आए इस की दुआ के साथ , कोई फाइव गार्डेन मैं भीगने के लिए और कोई एक दिन की दिहाड़ी मिलजाए के काम की तलाश मैं ...बारिश को आने पर निराशा से और कोई उसके आने को आशा से देखता है ....." सच हैं किसी के ना रहने पर ही उसकी महत्ता पता लगती है ....रहने पर तो सब अपने हित देखते हैं " वाह रे इंसान !! " जी हा मैं भी इंसान हू ...और आप भी तो !! चलिए अगली बार नये दृष्टिकोण से देखेंगे ! "
कोई सूखे खेत के लिए , कोई गर्मी से बचने के लिए , कोई अपने नये मकान की तराई के लिए ....कोई अपने कपड़ो को बचाने के किए , कोई अपने झोपडे मैं पानी ना आए इस की दुआ के साथ , कोई फाइव गार्डेन मैं भीगने के लिए और कोई एक दिन की दिहाड़ी मिलजाए के काम की तलाश मैं ...बारिश को आने पर निराशा से और कोई उसके आने को आशा से देखता है ....." सच हैं किसी के ना रहने पर ही उसकी महत्ता पता लगती है ....रहने पर तो सब अपने हित देखते हैं " वाह रे इंसान !! " जी हा मैं भी इंसान हू ...और आप भी तो !! चलिए अगली बार नये दृष्टिकोण से देखेंगे ! "
" हम कब हम हैं जब सब हमे माने .... "
" हम कब हम हैं जब सब हमे माने .... " हाँ आप कह सकते हैं की ज़रूरत क्या है किसी से एसा कहलवाने की ? " ज़रा सोचिए अगर एसा नही है तो हम ज्ञानी होने के बावज़ूद एग्ज़ॅम क्यों देते हैं ....और सर्टिफिकेट क्यों लेते हैं....बिना आपके पास सेरटिफीकटे के आपको कोई ज्ञानी मान लेता हैं ? "
हमारे सिर्फ़ हम होने और सबके हम होने मैं फ़र्क है....जीवन अकेले अपने दम पर ही नही चलता ....हमे लगता हैं की हम सब अपने दम पर कर रहे हैं किंतु ....हमरे साथ बहुत से हम होते हैं जो हमे सब का हम बनाते हैं ...अतः सब के बानिए क्यों की आप सब की वजह से हैं ....आप के गुजरने के बाद आप को सब याद रखेंगे क्योंकि सब ने आपको बनाया और आप सब के हम हैं......अकेले के नही......यदि आप मैं कुछ है तब ही ...."
हमारे सिर्फ़ हम होने और सबके हम होने मैं फ़र्क है....जीवन अकेले अपने दम पर ही नही चलता ....हमे लगता हैं की हम सब अपने दम पर कर रहे हैं किंतु ....हमरे साथ बहुत से हम होते हैं जो हमे सब का हम बनाते हैं ...अतः सब के बानिए क्यों की आप सब की वजह से हैं ....आप के गुजरने के बाद आप को सब याद रखेंगे क्योंकि सब ने आपको बनाया और आप सब के हम हैं......अकेले के नही......यदि आप मैं कुछ है तब ही ...."
नोच के लेने और सिर्फ़ पाने मैं अंतर है.... अंतर रखिए , आनंद रहेगा !!
योगेश का लिखा एक गीत है ....आनंद फिल्म का " कही दूर जब दिन ढल जाए..." इस गीत के आरंभ होने रे पहले एक ध्वनि सुनाई देती है .....बैलगाड़ी के पहियों की.... ...याद आया ? आज भी वो धुन ज़िंदा है हमारी यादों मैं जबकि हमारी खुद की आवाज़ आज कितनी बदल गयी है ....वैसे ही जैसे की हमारे कितने ही रिश्ते बने और ख़तम हो गये !! कुछ आखरी साँसे गिन रहे हैं .....कहीं पाताल पानी हो रहा है कुछ लोग अपनो को ज़िंदा रखने के लिए खुद की जान गावा बीते ! रिश्ते सिर्फ़ काम निकल लेने के लिए नही होते .. समर्पण के भी लिए होते हैं .....चलिए जाने दीजिए धीरे धीरे चलिए साथ साथ रहेंगे नही तो एकांकीपन तो सर्वथा साथ है ही ......!! नोच के लेने और सिर्फ़ पाने मैं अंतर है.... अंतर रखिए , आनंद रहेगा !!
" कुटिलता और कुशलता मैं अंतर "
" कुटिलता और कुशलता मैं अंतर "
" कुशलता से किया गया कार्य ..फलीभूत होता है...और कुटिलता के परिणाम सम्यक होते हैं , साथ साथ कुटिल व्यक्ति की सीमाएँ तय हो जाती हैं ....संपर्क सीमित हो जाते हैं और संवाद परेशान करने लगते हैं ! " आधुनिक बनिए ....आवश्यकता भर ही....... नही तो बारिश मैं कटान किसी नदी की जिस तरह दिशा बदल देता है उस तरह ..... वस्तु विहीन हो सकते हैं !!....कुटिलता प्रोटीन हो सकती है ....किंतु अधिकयी ...विनाश का कारण भी....!!
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