" अख़बारों की स्याही ने भी धुंधला आँचल ओढ़ लिया ,
सूरज ने भी अपनी किरणों की बांहों को सिकोड़ लिया !
हम तुम भी अब घर की राह पर धीरे धीरे बढ़ जाएँ ,
किरने सोयीं , पंछी सोये , सुख सपनों मैं खो जाएँ !!
----------------------- धीरे धीरे सो जाएँ !!
-- : मनीष