एक समय था !
ये ही कुछ १५ सालों पहली ही बात रही होगी मैं अपने एक मित्र के साथ उसके घर पर था ! उसके एक रिश्तेदार भी उसके घर मिलने को आये हुए थे ! सब कुछ सामान्य था बस एक बात के ! मेरी और मेरे दोस्त की निगाह उन बुजुर्ग रिश्तेदार पर चली जाती थी , दरअसल उन बुज़ुर्ग ने अपने कानो मैं इयर फोन लगा रखा था और उसकी तार उनकी जेब मैं एक मशीन से जुडी हुई थी !!
हाँ जी वो बहरे थे और वो मशीन बहार से आने वाली आवाजों को कुछ बढ़ा कर के उस तार के ज़रिये उनको कान तक पहुचता था और वो सुन सकते थे !!
अरे साहब हम एक बार नाक कान गले वाले हस्पताल गए , वहां तो ना जाने कितने लोग ये ही मशीन लगाये घूम रहे थे !! उस दिन के बाद जिस के कानो मैं ये मशीन देखि तो अपने आप पर फक्र महसूस होता - हम और हमारे कान एक दम दुरुस्त हैं ! उनकी और कुछ हे दृष्टि से देखते थे की देखो इनको कम सुनाई देता है ........!!
एक आज का समय है !!
सफेद , काले और ना जाने कितने ही तरह के इयर फ़ोन लगाये बच्चे घुमते रहते हैं ! इयर फ़ोन तो स्टेटस सिम्बल बन गया है ....जिसका जीतन अच्छा फ़ोन उतने और उससे भी अच्छा इयर फ़ोन तो होना ही चाहिए ......! बस मैं , टेम्पू मैं , रेलगाड़ी मैं , प्लेट फॉर्म पर, हस्पताल मैं , नदी के किनारे , पहाड़ पर चढ़ते हुए , दिवाली मानते हुए , राखी बंधवाते हुए , खाना खाते हुए , क्लास रूम मैं ( टीचर से नज़र चुराकर ) , शमशान मैं , शनिवार से अगले शुकर्वार तक , किसी भी तरह की अक्तिविटी करेती हुए ....बच्चे , किशोर, जवान , युवा , अधेड़ , बुजुर्ग सब इयर फ़ोन का इत्स्तेमाल करते हुए दिख जायेंगे !! ना ना ना ....ये सब बहरे नहीं हैं !! सब अपने को बड़ा और अलग दिखने की होड़ मैं हैं....महंगे मोबाईल के इयर फ़ोन के सहारे .....!!
फर्क है कल और आज की मशीन मैं .....वो बाहर से आपको जोड़ती थीं , आवाज़ बढ़ा कर आपको सुनाती थीं , और आज की मशीन आप और हम को बाहरी दुनिया से अलग कर देती हैं ...... अपने आस पास का , अपने अपनों का , अपने और दुसरो का कुछ सुनाई नहीं देता !! कभी कभी तो टूटन का पता भी नहीं चलता .....ये इयर फ़ोन बस तन्हाई को और बढाते हैं ......अंतर्मन भी सांस नहीं ले पता , भावनाओं के आभाव मैं !!
ये ही कुछ १५ सालों पहली ही बात रही होगी मैं अपने एक मित्र के साथ उसके घर पर था ! उसके एक रिश्तेदार भी उसके घर मिलने को आये हुए थे ! सब कुछ सामान्य था बस एक बात के ! मेरी और मेरे दोस्त की निगाह उन बुजुर्ग रिश्तेदार पर चली जाती थी , दरअसल उन बुज़ुर्ग ने अपने कानो मैं इयर फोन लगा रखा था और उसकी तार उनकी जेब मैं एक मशीन से जुडी हुई थी !!
हाँ जी वो बहरे थे और वो मशीन बहार से आने वाली आवाजों को कुछ बढ़ा कर के उस तार के ज़रिये उनको कान तक पहुचता था और वो सुन सकते थे !!
अरे साहब हम एक बार नाक कान गले वाले हस्पताल गए , वहां तो ना जाने कितने लोग ये ही मशीन लगाये घूम रहे थे !! उस दिन के बाद जिस के कानो मैं ये मशीन देखि तो अपने आप पर फक्र महसूस होता - हम और हमारे कान एक दम दुरुस्त हैं ! उनकी और कुछ हे दृष्टि से देखते थे की देखो इनको कम सुनाई देता है ........!!
एक आज का समय है !!
सफेद , काले और ना जाने कितने ही तरह के इयर फ़ोन लगाये बच्चे घुमते रहते हैं ! इयर फ़ोन तो स्टेटस सिम्बल बन गया है ....जिसका जीतन अच्छा फ़ोन उतने और उससे भी अच्छा इयर फ़ोन तो होना ही चाहिए ......! बस मैं , टेम्पू मैं , रेलगाड़ी मैं , प्लेट फॉर्म पर, हस्पताल मैं , नदी के किनारे , पहाड़ पर चढ़ते हुए , दिवाली मानते हुए , राखी बंधवाते हुए , खाना खाते हुए , क्लास रूम मैं ( टीचर से नज़र चुराकर ) , शमशान मैं , शनिवार से अगले शुकर्वार तक , किसी भी तरह की अक्तिविटी करेती हुए ....बच्चे , किशोर, जवान , युवा , अधेड़ , बुजुर्ग सब इयर फ़ोन का इत्स्तेमाल करते हुए दिख जायेंगे !! ना ना ना ....ये सब बहरे नहीं हैं !! सब अपने को बड़ा और अलग दिखने की होड़ मैं हैं....महंगे मोबाईल के इयर फ़ोन के सहारे .....!!
फर्क है कल और आज की मशीन मैं .....वो बाहर से आपको जोड़ती थीं , आवाज़ बढ़ा कर आपको सुनाती थीं , और आज की मशीन आप और हम को बाहरी दुनिया से अलग कर देती हैं ...... अपने आस पास का , अपने अपनों का , अपने और दुसरो का कुछ सुनाई नहीं देता !! कभी कभी तो टूटन का पता भी नहीं चलता .....ये इयर फ़ोन बस तन्हाई को और बढाते हैं ......अंतर्मन भी सांस नहीं ले पता , भावनाओं के आभाव मैं !!