" उस दिन अदभुत खुश था मैं .....बस एक और यात्रा के बाद घर जो जाना था , पुरे पंद्रह दिनों से अपनी बहनों से दूर था !! "
"२००४ के शुरूआती दिन थे , अप्रैल का अंत और मई की शुरुआत के दिन थे , अधिकारिक काम से चेन्नई से कोलकत्ता गया था और फिर मुंबई होते हुए दिल्ली लौट रहा था , जेट एयरवेज़ की कोलकत्ता से मुंबई की शाम के ७.४५ की उड़ान थी ! बाँकुड़ा से हावड़ा आया , कुछ देर विक्टोरिया मेमोरिअल मैं तालाब के किनारे बैठा , चिनिया बादाम ( मूंगफली ) खाई, डाभ पिया और फिर दमदम की लिए निकल पड़ा , कोलकत्ता की मेट्रो के सहारे !! मोनोरम है सब देखना , टिकटिंग का अनोखा सिस्टम है , एक पतली सी टिकट मिलती है जो स्टेशन मैं प्रवेश करते समय वहां लगे अवरोधक के एक किनारे पर रखो और खट कर के वो अपने तरफ उसको खीच लेता है और दरवाजे की दूसरी निकल देता है ...और दरवाज़ा खुल जाता है आपको आगे जाने के लिए !! मेट्रो का सफ़र अच्छा रहा , एयर पोर्ट पर सब कुछ करने के बाद उड़नतश्तरी मैं बैठ गया , नाश्ता मिला , और फिर खाने की तयारी होने लगी, तभी ये लगा की हम बादलों के बीच से गुजर रहे हैं , बहार का नज़ारा और भी मनोरम सा लग रहा था , मैं खिड़की से बहार झाँकने लगा !!!
एसा लग रहा था की दो भूरी भूरी डबलरोटी के बीच मैं एक मक्खन की टिकिया रखी हो , और हम उसमे रखी फलों के तुकडे !! खैर खाना आया बस पहला कौर ही मुह मैं डाला था की , अचानक , बत्ती गुल और हमारा तैय्यारा , हवाई जहाज़ हिलने लगा , और बाहर खूब बिजली चमकने लगी ......तभी एक उद्घोषणा हुई " कृपया ध्यान दीजिये - " हम लखनऊ के ऊपर से गुजर रहे हैं और बहार के मुसम ख़राब है और संभवतः हमें आकस्मिक लैंडिंग करनी पद सकती है ...आप तयार रहिये ....और पूरा का पूरा ज़हाज़ हिल रहा था ये लग रहा था की शायद हम नहीं बचेंगे ....."
" पुरे पांच मिनट्स तक हम सब ने जो लोग भी ज़हाज़ मैं थे ना जाने किस किस को याद किया और किस किस से जिनसे भी हमने लड़ाई झगडा हुआ था सब से मुआफी मांग ली, और दोबारा एसा नहीं करने की कसम खा ली , खैर राम राम कर के सब मौत का तूफ़ान गुज़र गया और हम लखनऊ के ऊपर से निकल आये , और सुरक्षित थे .....मौत से सामना किया मैंने , बस गले नहीं लगाया उसने मुझे , कह कर चली गयी की आज तुम होश मैं थे .....फिर मिलेंगे !! "
जीवन मिल कर जी लीजिये , अकेला हो होना है ही ....!!
- आपका ही.......... मनीष