" मुट्ठी मैं कुछ कांच के टूकडे ,
आँखों मैं महलों के खवाब,
नदियों के संग दुनिया देखें,
ऐसे थे कुछ हम और आप !
आज की खातिर बीत गया गया कल ,
कल की खातिर आज सजाएँ , धीर धीरे सो जाएँ !!
- मनीष सिंह